आरक्षण का भूत इस बार हरियाणा में फौज बुला लाया

संपादकीय
20 फरवरी 2016     
हरियाणा में अचानक भड़क उठा जाट आंदोलन देश के कई और राज्यों के लिए भी एक खतरा हो सकता है क्योंकि यह समाज संगठित भी है, ताकतवर भी है, और दिल्ली के इर्द-गिर्द कई राज्यों में इसका तगड़ा राजनीतिक ध्रुवीकरण भी है। कई राजनीतिक दलों में जाट नेताओं का बड़ा वजन है, और कोई भी राजनीतिक दल इस समाज की नाराजगी को अनदेखा नहीं कर सकता। अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक जिस जाट आरक्षण की मांग को पूरी तरह से खारिज कर चुका है, उसके लिए अचानक हरियाणा में इतना उग्र आंदोलन हरियाणा और केन्द्र दोनों जगह सरकार चला रही भाजपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक असुविधा की बात हो गई है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि हरियाणा से लगे हुए पंजाब में अभी चुनाव होने जा रहे हैं, और जाट आरक्षण का मुद्दा उत्तरप्रदेश के एक हिस्से पर भी असर डाल सकता है जहां कि चुनाव सामने खड़े हैं। 
जाट समाज को ओबीसी के भीतर अगर देखें, तो यह बहुत कमजोर तबका नहीं लगता, और आरक्षण की जो भावना है, उसके तहत इसे नौकरी के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं दिखती है। बल्कि हम बार-बार आरक्षित तबकों के भीतर से जिन मलाईदार तबकों को हटाने की बात करते हैं, उनमें जाट शायद पिछड़ा वर्ग के बाकी लोगों के मुकाबले सबसे ऊपर आएंगे, और यह पूरा मुद्दा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए कम दिखता है, राजनीतिक आरक्षण का अधिक दिखता है। आज जिस तरह पंचायतों से लेकर म्युनिसिपल तक ओबीसी आरक्षण मौजूद है, और आगे चलकर विधानसभाओं या संसद तक जिसकी संभावना दिखती है, उस ओबीसी आरक्षण के लिए यह आंदोलन अधिक दिख रहा है। और यह राजनीतिक बवाल समय-समय पर सत्ता से बाहर रहने वाले राजनीतिक दल उठाते रहते हैं, आज परेशानी झेलना सत्तारूढ़ भाजपा की मजबूरी है। 
हमारा यह मानना है कि आरक्षण की आज की बहुत सी मांग वैसे भी कमजोर हो गई रहती अगर आरक्षित तबकों के भीतर से मलाईदार तबकों को बाहर कर दिया जाता, और एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देना बंद हो जाता। लेकिन आरक्षण से मदद देने की भावना अलग धरी रह गई, और सरकार से लेकर संसद तक फैसले लेने वाले ताकतवर ओहदों पर कायम आरक्षित तबके के लोग इसलिए कभी मलाईदार तबके को अलग नहीं कर पाए क्योंकि वे खुद इस फायदे से बाहर हो जाएंगे। इसलिए नेताओं से लेकर अफसरों तक, और सांसदों से लेकर विधायकों तक, आरक्षित तबकों के मलाईदार लोग आरक्षण के फायदे पर एक किस्म से एकाधिकार बनाकर चलते हैं, और उनके तबकों के भीतर जो कमजोर हैं वे मलाई की सतह तक भी नहीं पहुंच पाते। 
आरक्षण का आंदोलन देश के दूसरे कुछ राज्यों में भी इससे अधिक हिंसक हो चुका है और राजस्थान में तो महीनों तक राज्य से होकर रेलगाडिय़ों का आना-जाना बंद रहा है। हरियाणा आज देश के सबसे बड़े औद्योगिक केन्द्रों में से एक है, और वहां आज कई जिलों में फौज पहुंच रही है, कई जिलों में कफ्र्यू है, और यह आंदोलन लंबा खींचने पर राज्य की अर्थव्यवस्था को भी चौपट करेगा। ओबीसी तबके के भीतर जाट लोगों को आरक्षण देने का एक मतलब यह भी होगा कि किसी और जाति का आरक्षण घटाना, और ऐसी किसी बात को सोचने पर भी वे दूसरी जातियां भी सड़कों पर होंगी। ऐसे विवादों को अदालत से ही निपटने देना चाहिए और सरकार को, राजनीतिक दलों को इन मुद्दों पर राजनीति बंद करना चाहिए। 

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