देवी और राक्षस को लेकर शुरू बहस एक अच्छी शुरुआत, पौराणिक इतिहास में करवट

संपादकीय
27 फरवरी 2016  
 
देश में भारतीय हिन्दू पौराणिक कथाओं को लेकर एक नई बहस छिड़ी है जो कि देश के दलितों की एक अलग मान्यता को पहली बार राष्ट्रीय बहस का ऐसा मुद्दा बना पा रही है। यह सिलसिला जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में महिषासुर को लेकर शुरू हुआ, और सनातनी हिन्दू संस्कृति मानने वाले लोगों ने इस राक्षस या असुर की पूजा करने वालों को हिन्दू देवी दुर्गा का विरोधी करार दिया। दूसरी तरफ आज भाजपा के सांसद, और एक वक्त इस पार्टी के बाहर रहते हुए देश के एक प्रमुख दलित-आंदोलनकारी उदित राज ने इस विवाद पर कहा है कि वे बाबा साहब आंबेडकर की सोच को मानते हैं जो कि यह लिखते आए हैं कि जिनको असुर या राक्षस कहा जाता था, वे दरअसल भारत के दलित थे, और इसी सोच के तहत उदित राज सहित बहुत से दलित-आंदोलनकारी, दक्षिण भारत के बहुत से इलाके उन राक्षसों या असुरों को अपना नायक मानते हैं, जिनको सनातनी हिन्दू संस्कृति राक्षस मानकर जलाती है, या मारती है। 
देश में पौराणिक कथाओं को लेकर, धार्मिक मान्यताओं को लेकर शुरू हुई यह बहस इस हिसाब से बहुत अच्छी है कि भारत का धार्मिक इतिहास उन जातियों के लोगों का ही लिखा हुआ है जो कि ताकतवर रही हैं, जो कि राज करने वाली रही हैं, और जैसा कि दुनिया में हर कही इतिहास विजेताओं के नजरिए से लिखा जाता है, भारत में भी इतिहास दलितों और आदिवासियों के खिलाफ ही लिखा गया है। कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने, और कुछ दलित इतिहासकारों ने जरूर सनातनी सोच से परे भारत का इतिहास लिखा है, और सवर्ण हिन्दू सोच की आक्रामकता से कुचले हुए दलित-आदिवासियों का नजरिया भी सामने रखा है। लेकिन सदियों से देश की सोच सवर्ण तबकों के हिसाब से लिखे गए इतिहासतले ऐसी कुचली हुई है कि आज सनातनी सोच से परे की कोई बात की जाती है तो वह हिन्दू धर्मविरोधी करार दे दी जाती है। कहने के लिए हिन्दू जब अपनी आबादी को अधिक दिखाना चाहते हैं, तो वे आदिवासियों और दलितों को अपने में गिन लेते हैं, लेकिन जब आदिवासियों और दलितों को हक देने की बात आती है, तो इनको जाति व्यवस्था में पैरों में जगह दी जाती है, पैरों के भी नीचे जगह दी जाती है। 
आज चाहे जेएनयू से कई तरह के राजनीतिक संदर्भों से यह बहस उठी है, लेकिन यह पूरे देश के दलित-आदिवासी तबकों के हित में इसलिए है कि भारत की पौराणिक कहानियों का इतिहास एक नए नजरिए को भी सुन रहा है, और इन तबकों के नायक, इनके शहीद, इनके पूजा और आस्था के केन्द्र अब केवल राक्षस या असुर कहकर मारे नहीं जा सकते। आस्था का बहस में फिर से आना उन लोगों के हक के लिए अच्छा है जिनकी कोई जगह इतिहास लेखन में नहीं रही है। भारत में धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं और आस्था को लेकर यह नया नजरिया कई लोगों की जमी-जमाई मान्यताओं को परेशान जरूर करेगा, लेकिन जब भी दबा-कुचला तबका अपने हक मांगता है, तो दबाने और कुचलने वाले तबकों को परेशानी तो होती ही है। और फिर आज भारत में छिड़ी हुई यह बहस महज धार्मिक और सांस्कृतिक नहीं रहने जा रही, यह एक नए राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी शुरू कर चुकी है, और जिन लोगों ने इसे छेड़ा है, उनको महज आबादी के आंकड़ों को देख लेने की जरूरत है कि देश में दलित-आदिवासी आबादी कितनी है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें