महंगी स्मार्ट सिटी के मुकाबले रुर्बन योजना अधिक काम की

संपादकीय
21 फरवरी 2016     
ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं देने के लिए केन्द्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज छत्तीसगढ़ की एक जनसभा में शुरू की। पूरे देश में लागू होने वाली इस योजना को इस राज्य में अचानक आकर यहां से इसकी शुरुआत करना इस राज्य के लिए भी महत्वपूर्ण है, और यह योजना अपने आपमें कई नई संभावनाएं लेकर आई है। दो लाईनों में अगर इस सोच को कहें, तो ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे-छोटे गांवों के समूह बनाकर उनके बीच में एक साथ सुविधाओं को विकसित करना, बड़ा महत्वपूर्ण हो सकता है। लोगों को याद होगा कि एनडीए के समय राष्ट्रपति रहे डॉ. अब्दुल कलाम ने भी पुरा नाम से ऐसी ही सोच को आगे लाने की कोशिश की थी जिसमें गांवों को शहरों जैसी सुविधा दी जा सके, लेकिन इस बार की यह सोच योजना के साथ आई है, और यह शहरों को अनायास बोझ से बचा भी सकती है, और शहरीकरण के बजाय इससे एक विकेंद्रीकरण भी हो सकता है। यह मामला राजनीतिक नहीं है, और शहरी-ग्रामीण विकास से जुड़ा हुआ है। और यह योजना इतनी सरल और सहज भी है कि हमारी तरह के तकनीकी-जानकारी के बिना इस बारे में सोचने वाले लोगों को भी यह आसानी से समझ आ रही है। 
गांधी के समय से यह बात चलती आ रही है कि भारत की जिंदगी गांवों में बसती है। और ग्रामीण विकास हुए बिना देश का विकास नहीं हो सकता। लेकिन गांवों की हालत लगातार खराब होती जा रही है, और लोग शहरों पर आश्रित रहने को बेबस होते जा रहे हैं क्योंकि शिक्षक या चिकित्सक जैसे बुनियादी कर्मचारी भी गांव जाकर रहना नहीं चाहते, और जिस किसी ग्रामीण परिवार की जरा सी भी क्षमता हो जाती है, उस परिवार के लोग शहर में बसने की तैयारी करने लगते हैं। दूसरी बात यह है कि चुनावी राजनीति के चलते हर गांव में स्कूल, हर कस्बे में कॉलेज, और इसी तरह से ऐसा सरकारी ढांचा खड़ा कर दिया जाता है जिसका अस्तित्व सरकार पर भारी पडऩे लगता है, और जितने बड़े ढांचे की जरूरत भी नहीं रहती है। ऐसे में अगर कुछ गांवों का समूह बनाकर सुविधाओं को वहां मुहैया कराया जाएगा, तो ऐसी सुविधाओं की उपयोगिता भी होगी, और उनकी आत्मनिर्भरता भी होगी। सरकारी सुविधाएं आखिरकार जनता के पैसों से ही आती हैं, और उन्हें स्थानीय जनता को संतुष्ट करने के नाम पर खोल तो दिया जाता है, लेकिन वहां कुर्सियां खाली पड़ी रहती हैं, आलमारियां खाली पड़ी रहती हैं। इसलिए कुछ गांवों को मिलाकर अगर विकास किया जाएगा, तो हो सकता है कि ऐसे विकसित ग्राम समूहों में कुछ शहरी सुविधाएं रहने से लोग वहां जाकर रहने और काम करने को तैयार हो जाएंगे। आज तो हालत यह है कि गांवों में कोई डॉक्टर जाने तैयार नहीं होते, शिक्षक किसी स्थानीय बेरोजगार को अपना काम ठेके पर दे देते हैं, और बहुत से कर्मचारी शहरों से गांव आना-जाना करते हैं। दूसरी तरफ शहरों पर जो बोझ आबादी बढऩे से बढ़ता है, उसे भी गांव और शहर के बीच अगर कहीं रोका जा सकता है, तो उससे सबके लिए सहूलियत बढ़ सकती है। लेकिन यह योजना किसी पुल, किसी इमारत या किसी बांध जैसी नहीं रहेगी, इसके लिए सरकारों से लेकर स्थानीय संस्थाओं तक लोगों को बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी, और जगह-जगह स्थानीय जरूरतों के हिसाब से योजना भी बनानी पड़ेगी। यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि केन्द्र सरकार की यह महत्वकांक्षी योजना किस राज्य में किस जगह कितनी सफल हो पाती है। हमारा मानना है कि केन्द्र सरकार की स्मार्ट सिटी जैसी एक निहायत महंगी और अतिशहरी सोच वाली योजनाओं के मुकाबले यह रुर्बन योजना अधिक कारगर और काम की हो सकती है। स्मार्ट सिटी तो शहरी चकाचौंध के मॉडल बनाने की सोच है, जो कि बाकी देश की हालत के मुकाबले बहुत ही विरोधाभासी है, और चाहे जिस वजह से हुआ हो, अगर छत्तीसगढ़ पर ऐसी महंगी स्मार्ट सिटी का बोझ नहीं पड़ा है, तो वह इस राज्य के लिए अच्छी बात है। इस राज्य को ऐसे रुर्बन केन्द्रों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, और यह काम अधिक चुनौती का भी रहेगा। 

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