अमरीका में पार्टियों के भीतर लोकतंत्र एक दिलचस्प मॉडल

संपादकीय
06 फरवरी 2016
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी अभी वहां की दोनों बड़ी पार्टियों के भीतर उम्मीदवार बनने के स्तर पर शुरू हुई है। अमरीकी राजनीतिक व्यवस्था के मुताबिक अपनी पार्टी के भीतर भी उम्मीदवार बनने के उत्साही लोगों को पूरा देश घूम-घूमकर पार्टी के कार्यक्रमों में सदस्यों के बीच यह साबित करना पड़ता है कि वे सबसे अच्छे उम्मीदवार क्यों साबित होंगे? इस तरह अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव दो किस्तों में होता है, पहले पार्टी के भीतर समर्थन पाना, और फिर पार्टी का उम्मीदवार अगर बन गए, तो देश के मतदाताओं का समर्थन पाना। भारत में संसदीय व्यवस्था है जहां जनता सांसद चुनती हैं, और फिर सांसद प्रधानमंत्री चुनते हैं। अमरीका में राष्ट्रपति का चुनाव सीधा होता है, जैसा कि भारत में म्युनिसिपलों के मेयर का चुनाव होता है। 
अभी वहां डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर दो नामी-गिरामी नेताओं के बीच पार्टी का प्रत्याशी बनने का मुकाबला जोरों पर है, जो कि चर्चा में बना हुआ है, और इस पार्टी के समर्थक भी इन दोनों के नामों के बीच बंटे हुए हैं। यह बंटवारा कुछ इस तरह का है कि इन दोनों में से हिलेरी क्लिंटन के पक्ष में पार्टी के अधिक लोग हैं, लेकिन दूसरे नेता बर्नी सैंडर्स के बारे में अमरीका के सर्वे का नतीजा यह है कि वे रिपब्लिकन पार्टी के बड़बोले और घोर साम्प्रदायिक, नस्लवादी नेता डोनाल्ड ट्रम्प को हिलेरी के मुकाबले दुगुने वोटों से हरा सकते हैं। अब यह बड़ा दिलचस्प समीकरण है कि पार्टी के भीतर तो हिलेरी का समर्थन अधिक है, लेकिन देश के मतदाताओं के बीच हिलेरी के मुकाबले बर्नी का समर्थन दोगुना दिख रहा है। अमरीकी चुनावी राजनीति पर चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भारत में अगर चुनाव के पहले किसी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी छांटकर उसका ऐलान किया भी जाता है, तो उसे छांटने के पीछे किसी तरह की कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं होती, पार्टी के भीतर प्रत्याशी के नाम पर देश भर में कोई चर्चा होती हो, ऐसा भी नहीं होता, और कई बार तो यह होता है कि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार सामने रखे बिना ही चुनाव भी निपट जाता है। 
अमरीकी चुनाव प्रणाली और भारतीय चुनाव प्रणाली में से कौन सी बेहतर है, और भारत जैसे देश के लिए इनमें से कौन सी अधिक असरदार है, यह बहस बीच-बीच में कुछ लोग छेड़ते हैं, और जब नरेन्द्र मोदी जैसे नेता किसी पार्टी के पास हों, तो वह पल भर के लिए यह भी सोच सकती है कि राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली अगर होती तो नरेन्द्र मोदी अपने किसी भी प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले दो-तीन गुना वोट पा सकते थे। लेकिन भारत की व्यवस्था बिल्कुल अलग है, और यहां का संविधान बनाने वाले लोगों ने कुछ तो ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था के तहत रहते हुए उसी व्यवस्था की नकल करना या उस पर चलना बेहतर समझा था, और कुछ शायद यह भी समझा गया हो कि अमरीका और भारत की व्यवस्था में, यहां के समाज में, और मतदाताओं की सोच-समझ में बड़ा फर्क है, और यहां संसदीय व्यवस्था बेहतर है, बजाय राष्ट्रपति-शासन प्रणाली के। 
लेकिन आज अमरीका में चल रहे मुकाबले की जिस बात पर हम लिखना चाहते हैं वह एक दिलचस्प बहस है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के ये दो उम्मीदवार अगर राष्ट्रपति बनते हैं, तो किसके बनने से देश में अधिक उदार नीतियां आएंगी, और किसके बनने पर देश अधिक कट्टर बनेगा? आज वहां कुछ समझदार लोग इस अधिक उदार पार्टी, डेमोक्रेटिक पार्टी, के इन दो नामों की अब तक घोषित निजी पसंद-नापसंद के आधार पर उनकी तुलना रिपब्लिकन पार्टी की नीतियों से कर रहे हैं, जो कि एक अधिक कट्टर और दकियानूसी पार्टी मानी जाती है। इन दो डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों की रीति-नीति के बीच इतना बड़ा फर्क है, और इनकी पार्टी की घोषित नीतियों के तहत ही निजी पसंद-नापसंद में इतना बड़ा फासला रहने की गुंजाइश अमरीकी राजनीति के लचीलेपन को बताती है। फिर पार्टियों के भीतर के इतने बड़े लोकतांत्रिक नजरिए को देखना भी हिन्दुस्तानियों के लिए बहुत दिलचस्पी का हो सकता है कि किस तरह पार्टी के दो प्रमुख उम्मीदवार सार्वजनिक मंच पर, टीवी कैमरों के सामने एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं, एक-दूसरे की आलोचना कर रहे हैं, एक-दूसरे की कमियां गिना रहे हैं, और राष्ट्रपति बनने पर किससे क्या खतरा हो सकता है यह भी गिना रहे हैं। लोगों को याद होगा कि बराक ओबामा जब पहली बार राष्ट्रपति बने, तो उनके और हिलेरी क्लिंटन के बीच उम्मीदवारी के लिए पार्टी के भीतर ही कड़ा मुकाबला हुआ। फिर ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर हिलेरी क्लिंटन उनकी विदेश मंत्री बनीं, और अब वे सरकार में न रहकर, राष्ट्रपति पद की अगली उम्मीदवार बनने के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर कोशिश कर रही हैं। 
कुल मिलाकर हम इस मुद्दे पर हम चर्चा इसलिए छेड़ रहे हैं कि पार्टी के भीतर किस तरह का लोकतंत्र हो सकता है, होना चाहिए, इसका एक अलग किस्म का मॉडल अमरीका में है, और उससे कुछ सीखना हो, या न सीखना हो, उसे दिलचस्पी से देखा तो जा ही सकता है। 

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