जिंदगी मौत से बहुत अधिक बड़ी होती है

संपादकीय
9 फरवरी 2016

भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित जमीन की हिफाजत करने के लिए दोनों देशों के हजारों सैनिकों को सियाचीन जैसे बर्फीले इलाके में बारहों महीने चौकसी करनी पड़ती है, और कभी सरहद के इस तरफ के सैनिक मारे जाते हैं, और कभी सरहद के उस तरफ के। और ये एक-दूसरे की गोलियों से नहीं मरते, मौसम की मार से मरते हैं। दोनों देशों के बीच तनाव का एक नतीजा यह भी होता है कि अंधाधुंध फौजी फिजूलखर्ची के अलावा जिंदगियां खत्म होती हैं, और जिसकी कोई भरपाई अपने-अपने देश की गरीब जनता पर टैक्स लगाकर, या उसके हक के पैसे खर्च करके भी भारत और पाकिस्तान की सरकारें नहीं कर सकतीं। 
लेकिन लिखने का मुद्दा आज यह है कि एक बर्फीले तूफान से घिरकर, बर्फ से दबकर जो हिन्दुस्तानी फौजी वहां दफन हो गए थे, उनके बारे में फौज ने भी औपचारिक रूप से यह घोषणा कर दी थी कि उनमें से किसी के भी जिंदा बचने के आसार अब नहीं हैं, और उनकी तलाश अब सिर्फ लाशों के रूप में की जा रही थी। बर्फ में दबने के छह दिन बाद, छब्बीस फीट बर्फ के नीचे से दबा हुआ एक हिन्दुस्तानी फौजी आज जब जिंदा पाया गया, तो यह मौत को शिकस्त देकर जीतने वाला फौजी निकला, और उसे दिल्ली तक तो जिंदा पहुंचाया ही गया है। यह पूरी कहानी अपनी तस्वीरों के साथ रौंगटे खड़े कर देती है कि किस तरह जब मौत तय मान ली जाती है, तब भी जिंदगी मानो कब्र से निकलकर चलते हुए आकर खड़ी हो जाती है। छब्बीस फीट बर्फ के नीचे से छह दिनों बाद, बिना किसी ऑक्सीजन की मदद के किस तरह यह फौजी वहां बचा होगा, यह सोचने की बात है। और यह भी देखने की बात है कि यह फौजी दक्षिण भारत के कर्नाटक का है, और एक गर्म इलाके से जाकर वह दुनिया के सबसे सर्द इलाकों में से एक में ड्यूटी कर रहा था, और एक दक्षिण भारतीय किस तरह ऐसी बर्फ के नीचे से निकलकर आया है। 
इस मुद्दे पर लिखने की एक वजह यह है कि जिंदगी में लोगों को कई बार कई तरह के हादसे झेलने पड़ते हैं, जो कि ऐसी निराशा पैदा करते हैं कि अब कुछ भी नहीं बचा है, सब कुछ खत्म हो गया है, अब जीकर क्या करेंगे। ऐसी ही नौबत में रोजाना बहुत से लोग आत्महत्या करते हैं। लेकिन इस बचकर निकले हुए बहादुर फौजी को देखें तो लगता है कि जिंदगी में अनुपम खेर के शो के बाहर भी कुछ भी हो सकता है। इसलिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या उनकी हालत छब्बीस फीट बर्फ के नीचे दबे हुए छठवें दिन से भी अधिक बुरी है? और अगर उनकी हालत इतनी खराब नहीं है, तो उनको यह हौसला रखना चाहिए कि शायद जिंदगी की संभावना उनको तलाश करते हुए उनकी मुसीबतों के नीचे भी पहुंच जाएगी, और बचने का कोई एक रास्ता निकल आएगा। हमको लगता है कि इस तरह के करिश्मों की कहानियां लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है, ताकि लोग हौसला छोडऩे के पहले, जिंदगी खत्म करने के पहले यह सोचें कि कैसी-कैसी नौबतों से जिंदगी मौत को धकेलकर बाहर निकल आती है। जहां हजारों किलोमीटर बर्फ ही बर्फ हो, जहां बर्फ की चादर कई मंजिलों की इमारत जितनी मोटी हो, वहां पर भी लोग न सिर्फ ड्यूटी करके जिंदा लौट आते हैं, बल्कि इस तरह दफन होने पर भी जिंदगी वहां से निकलकर लौट आती है। हर किसी को अपनी-अपनी मुसीबत के वक्त इस घटना के बारे में, इस करिश्मे के बारे में सोचना चाहिए। और जिन लोगों के आसपास लोग उम्मीद और हौसला छोड़ रहे हों, उन लोगों को भी निराश-हताश लोगों को ऐसी कुछ कहानियां बतानी चाहिए। जिंदगी मौत से बहुत अधिक बड़ी होती है। 

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