हुनर और उद्यमशीलता बनें भारत की बेहतरी के दो रास्ते

संपादकीय
29 फरवरी 2016

केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली के पेश किए हुए बजट का विशेषज्ञ-जानकारों का विश्लेषण कुछ देर में आना शुरू होगा, लेकिन बजट की दो बातों पर हम यहां लिखना चाहते हैं। एक तो यह कि देश में आज कौशल विकास, या हुनर को बेहतर बनाने को लेकर जो सोच चल रही है, उसके लिए देश भर में 15 सौ ट्रेनिंग सेंटर खोलने की बात कही गई है। हालांकि इसके लिए रकम बहुत कम रखी गई है और ऐसे हर केन्द्र को कुल एक-एक करोड़ रूपए ही मिलने जा रहे हैं, लेकिन राज्य सरकारों की मदद से, उन्हें शामिल करके यह योजना लोगों की जिंदगी में लागत के मुकाबले बहुत अधिक फायदे का फर्क ला सकती है। दूसरी योजना स्टार्टअप नाम से पिछले दिनों लागू की गई है जिसके तहत नए उद्यमशील लोगों को बढ़ावा देकर उन्हें रोजगार देने वाला बनाने की महत्वाकांक्षी बात कही गई है। आज लोग रोजगार मांगते हैं, जो कि सरकार के पास हैं नहीं। दूसरी तरफ अगर नए हुनर सीखकर, नए कामकाज शुरू करने वाले लोग अपने अलावा दो-चार और लोगों को भी काम दे सकेंगे, तो उससे देश की तस्वीर एकदम बदल सकती है। केन्द्र सरकार ने ऐसे नए उद्यमियों के लिए 10 लाख रूपए तक के कर्ज को बिना किसी संपत्ति को गिरवी रखे देना शुरू भी कर दिया है, और हो सकता है कि इसके अच्छे नतीजे सामने आएं। 
हम इन दो बातों पर जोर इसलिए दे रहे हैं कि भारत में आबादी की कोई कमी नहीं है, और मामूली पढ़े-लिखे नौजवानों से लेकर खासे पढ़े-लिखे लोगों तक आबादी काफी है, और इस आबादी को अगर आर्थिक उत्पादक बनाया जा सके, तो आज जो देश पर बोझ लग रहे हैं, वे कल देश की दौलत भी हो सकते हैं। बाकी दुनिया के मुकाबले भारत में मानव-श्रम इतना सस्ता है, और यहां पर काम की स्थितियां मौसम की वजह से तकरीबन साल भर अच्छी बनी रहती हैं, इसलिए यह दुनिया की सेवा करने वाला एक कामयाब देश बन सकता है। इसके लिए यहां के लोगों के हुनर को बेहतर बनाने की जरूरत है, और इसके साथ-साथ नई उद्यमशीलता को बढ़ावा देने की भी। केन्द्र सरकार नारों के रूप में तो ये दोनों योजनाएं बढ़ा रही है, लेकिन जब तक राज्यों का योगदान और उनकी सक्रिय हिस्सेदारी इसमें नहीं रहेगी, इनकी कामयाबी मुश्किल ही रहेगी। लेकिन हमको इन दो बातों में जो एक सकारात्मक बात दिखती है, वह यह कि सरकारी नौकरियों के मुकाबले लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने, अपने आपके दम पर कमाऊ बनने का रास्ता अगर सरकार दिखाना चाहती है, तो वह सरकारी नौकरी के मुकाबले बहुत ही अच्छी बात है। 
हम भारत की आबादी को बोझ मानने से हमेशा ही इंकार करते आए हैं, और हमारा यह मानना है कि दुनिया के जिन देशों में भी जाकर हिन्दुस्तानी कामगार काम करते हैं, वे देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कमाई को घर भी भेजते हैं। ऐसे में इस देश की नौजवान पीढ़ी को अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार की जरूरतों के मुताबिक बेहतर हुनर, और बेहतर अंतरराष्ट्रीय समझ वाला बनाया जाए, तो दुनिया के विकसित देशों में कामगारों की मारामारी बहुत अधिक है। विकसित देशों में लोग अब हफ्ते में पांच दिन के बजाय चार दिन काम करने लगे हैं, और वहां पर बहुत से कामकाज के लिए गरीब देशों से गए हुए लोगों की रोजगार की संभावनाएं इसी अनुपात में बढ़ती चल रही हैं। फिर जापान जैसे देशों में आबादी बूढ़ी होती चल रही है, और नए जन्म घटते जा रहे हैं। ऐसे देशों में भी बुजुर्ग आबादी का ख्याल रखने के लिए कई तरह के कामकाज की गुंजाइश रहेगी। भारत सरकार को और यहां की राज्य सरकारों को भी अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं को देखते हुए अपनी नौजवान पीढ़ी को हुनर के अलावा अलग-अलग देशों की भाषाओं और संस्कृति को सिखाने का काम भी करना चाहिए। भारत की आबादी यहां के लिए एक बड़ी कमाई का जरिया बन सकती है। इस बजट से परे भी राज्यों को अपने आने वाले बजट में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए, और सरकारी नौकरियों की तरफ से लोगों का ध्यान हटाना भी चाहिए। जो प्रदेश अपने लोगों के हुनर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जरूरतों के मुताबिक बेहतर बनाते चलेंगे, वे केरल या आंध्र की तरह अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारते भी चलेंगे। 

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