पे्रम के पर्व पर पहरे

संंपादकीय
14 फरवरी 2016
एक और वेलेंटाइन डे आकर चले गया। दुनिया के अधिकतर देशों में पे्रम के पर्व के रूप में मनाया जाने वाला यह दिन पश्चिम की ईसाई सभ्यता से निकला है, और इसलिए भारत में एक तबका इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ मानने लगा है। और इस दिन को बहुत से हिंदू संगठन, धर्मांध संगठन, नफरतजीवी संगठन अपने अस्तित्व को दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं और सड़कों पर हिंसा से लेकर फतवे जारी करने तक अपने नाम को छपवाने लगे हैं।  कुछ बरस पहले  छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सरकार ने सरकारी स्तर पर इस दिन को मां-बाप की पूजा का दिन बना दिया था, और सरकार के एक आदेश के तहत प्रदेश की सभी स्कूलों में बच्चों के मां-बाप को आमंत्रित कर, उनके बच्चों से उनकी पूजा करवाई जा रही  थी। बच्चे अपने मां-बाप का सम्मान करें, इसके लिए साल में किसी एक दिन को  तय करने की जरूरत नहीं है। यह तो इस देश की संस्कृति और सभ्यता का रोजाना का एक हिस्सा होना चाहिए।
इंसानों की जिंदगी में कई किस्म के रिश्तों की जरूरत होती है, और जब ऐसे सारे रिश्ते अपने-अपने किस्म से स्वस्थ रहते हैं, तब जाकर लोगों का विकास ठीक से होता है। न तो पे्रमी-पे्रमिका मां-बाप की जगह भर सकते, न भाई-बहन पति-पत्नी की जगह भर सकते, न ही दोस्त घरवालों की जगह भर सकते, और न ही घरवाले दोस्त की जगह भर सकते। इसलिए किसी एक को किसी दूसरे का विकल्प बना देना एक बहुत ही असामाजिक बात तो है ही, यह इंसानी मिजाज के भी खिलाफ है, और ऐसे थोपे गए विकल्प से नौजवान पीढ़ी के मन में बुजुर्गों के लिए, समाज के लिए, और सरकार के लिए एक भड़ास भरती चलती है। आज जब छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचे संगीनों के साए में दोस्तों को वहां घुसने से रोक रहे हैं, तो इससे पुलिस और प्रशासन के लिए भी नौजवानों के मन में भारी हिकारत पैदा होती है। और गरीब-मध्यमवर्ग के लड़के-लड़कियां, जो कि महंगे रेस्त्रां नहीं जा सकते, वे आखिर ऐसे दिन एक-दूसरे से मिलने के लिए कहां जाएंगे?
इसलिए कृष्ण जैसे पे्रम के प्रतीक वाले इस देश में पे्रम के नाम पर जब एक दहशत पैदा होती है, और लोगों को मिलने नहीं दिया जाता है, तो ऐसे लोग सुनसान जगहों पर जाने को बेबस होते हैं, और वहां पर जुर्म का शिकार भी होते हैं। छत्तीसगढ़ में इस बात पर हमको हैरानी होती है कि शिव सेना और उसके जैसे दूसरे धर्मांध संगठन खुलकर फतवा जारी करते हैं कि अगर लड़के-लड़कियां किसी सार्वजनिक जगह पर साथ मिले तो उन्हें राखी बंधवाई जाएगी। ऐसे फतवों के बाद भी जब पुलिस और प्रशासन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते, तो ऐसे लोगों का हौसला बाकी गुंडागर्दी के लिए भी बढ़ता है।
हमने पहले भी ऐसे मौकों पर लिखा था कि समझदारी की बात यही है कि समाज अपने नजरिए को हकीकत को मानने वाला बनाए। आज जब इस देश की संस्कृति में जवान लड़के-लड़कियों का मिलना रोका नहीं जा सकता, वे जब साथ-साथ पढ़ रहे हैं, काम कर रहे हैं, मोबाइल और मोबाइक के जमाने में उनका घूमना-फिरना एक आम बात हो गई है, तो उनकी आज के जमाने की जरूरतों को एक कानूनी और सुरक्षित तरीके से पूरा करने की जरूरत है। इसके बिना समाज में बलात्कार, आसपास के लोगों का दूसरे किस्म का देहशोषण, बच्चों के साथ बुरा सुलूक, वेश्याओं के साथ असुरक्षित संबंध जैसे बहुत से खतरे बढ़ते चल रहे हैं। भारत का आज का गैरमहानगरीय इलाका बहुत ही पाखंडी मानसिकता के साथ जी रहा है जहां पर कि कुछ लोग यह मानकर, और साबित करते हुए चल रहे हैं कि भारत की संस्कृति में प्रेम कभी था ही नहीं। जबकि यहां का इतिहास और पुराण कृष्ण की तरह-तरह की रासलीलाओं से लेकर वात्सायन के विस्तृत सेक्स-ग्रंथ तक से भरा है और श्रृंगार रस का साहित्य भारत के एक युग में पहाड़ सा पैदा हुआ है। ऐसे देश में एक राजनीतिक सोच भारतीय संस्कृति के एक फर्जी इतिहास का दावा करते हुए प्रेम के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाती है। हिन्दू धर्म के ठेकेदार बनते हुए लाठियां लेकर ये लोग वेलेंटाइन डे पर, नए साल पर जिस तरह से प्रेमी-प्रेमिकाओं पर, दोस्त लड़के-लड़कियों पर हमले करते हैं उनको रोकने में सरकारों की भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। यह माहौल आज की नौजवान पीढ़ी को ऐसे लठैतों की नजरों से बचने पर मजबूर करता है। और चूंकि परिवारों के लोग भी अपने जवान बच्चों की जरूरतों को नहीं समझते इसलिए यह पीढ़ी कहीं कोने ढूंढती है तो कहीं कोई दूसरी खाली जगहें। 
हम यहां पर यह भी लिखना चाहते हैं कि एक नौजवान पीढ़ी की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को कुचलते हुए अगर कोई समाज अपने आपको बहुत शुद्धता पर टिका समाज मानता है तो वह ऐसी पीढ़ी के सामाजिक योगदान भी संभावनाओं को पहले कुचलता है। अपनी अपूरित जरूरतों के साथ भड़ास और कुंठा से जीने वाले नौजवान अपने समाज और देश-प्रदेश में अपनी पूरी क्षमता से कुछ नहीं जोड़ पाते। इंसानी ताकत से दुनिया के जो देश आगे बढ़े हैं उन सब में इंसान को बहुत बड़ी निजी आजादी मिलने का इतिहास है। जो देश वर्तमान की जरूरत को नहीं समझता, उस देश का भविष्य कभी उसकी संभावनाओं जितना अच्छा नहीं हो सकता। भारत का छत्तीसगढ़ जैसा इलाका इसी तरह अपनी संभावनाओं को खो रहा है। अपनी जवान पीढ़ी में अगर भड़ास बोई जा रही है, तो उससे कभी बहुत मीठे फल मिल भी नहीं सकते।

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