राजस्व मंडल अध्यक्ष के फैसले साजिश और भ्रष्ट होने के मायने

संपादकीय
30 मार्च 2016  

छत्तीसगढ़ के राजस्व मंडल में मौजूदा अध्यक्ष के आने के बाद से लगातार पिछले एक अध्यक्ष के कार्यकाल के इतने फैसलों को पलटा गया है, कि उन सब पर अमल करते हुए जिला कलेक्टरों की मुश्किल खड़ी हो गई है। गरीब आदिवासियों की जमीनों को साजिश के तहत गैरआदिवासियों के हाथों बेचने में मदद करने वाले राजस्व मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष के खिलाफ आज के मौजूदा अध्यक्ष ने साजिश जैसी कई बातें लिखी हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये बातें पहले चर्चा में नहीं थीं, पहले से यह चल रहा था, और सबको मालूम था कि राजस्व मंडल में कामकाज कैसे चल रहा था, और पूरे प्रदेश में आदिवासियों की जमीन, सरकार की खुद की जमीन, इनके खिलाफ किस तरह ये फैसले हो रहे थे। लेकिन आज पांच-छह बरस बाद जाकर अगर राज्य सरकार के इस राजस्व-न्यायालय से इसी कुर्सी के फैसलों को साजिश पाकर पलटना पड़ रहा है, और इसके खिलाफ अपील के लिए अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट बाकी ही हैं, तो फिर गरीबों और सरकार की जमीनों की हिफाजत कैसे हो सकेगी? 
और इस मामले को हम सिर्फ कुर्सी पर बैठे एक भ्रष्ट या एक ईमानदार के फर्क तक सीमित रखना नहीं चाहते। हमारा यह मानना है कि कलेक्टरों और कमिश्नरों के फैसलों के खिलाफ जमीनों के मामले सुनने के लिए बनाए गए राजस्व मंडल को सरकार के ढांचे में काले पानी की सजा की तरह मानना बंद किया जाना चाहिए। एक तेज और ईमानदार अफसर किस तरह से अदालती अधिकारों वाली इस कुर्सी पर बैठकर प्रदेश के हितों को, और लोगों के हितों को बचाने का काम कर सकता है, इस संभावना को देखते हुए इस कुर्सी पर लगातार बेहतर लोगों को लाने के बारे में सरकार को सोचना चाहिए। यहां पर आमतौर पर ऐसे अफसरों की तैनाती होती है जिनको सरकारी जुबान में लूपलाईन कहा जाता है, यानी नौकरशाही के हाशिए पर किसी को भेज देना। लेकिन प्रदेश की जमीनों के जितने मामले यहां से जुड़े रहते हैं, उनको देखते हुए इस कुर्सी की अहमियत समझना चाहिए। 
और जब राजस्व मंडल के वर्तमान अध्यक्ष ने करीब 50 एक सरीखे मामलों में पिछले एक अध्यक्ष के फैसलों को साजिश और गिरोह का काम कहा है, तो हमारा ख्याल है कि सरकार को खुद को भी ऐसे पिछले अध्यक्ष के खिलाफ कानूनी विकल्प तलाशने चाहिए, और अगर ऐसी कोई साजिश साबित होती है तो ऐसे अफसर को सजा दिलाने का काम करना चाहिए। यह कोई नई बात भी नहीं है, और राजस्व मंडल में बड़े पैमाने पर धांधली, और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार एक आम चर्चा रही है। लोगों का यहां तक कहना होता है कि कई अध्यक्षों के कार्यकाल में वकील ही फैसले लिखकर ले आते थे, और नगद भुगतान के साथ ऐसे फैसलों पर दस्तखत करवा लेते थे। सरकार को इस सिलसिले को तोडऩे की कोशिश करना चाहिए। लोगों की नजरों से दूर यह एक ऐसा कानूनी अधिकार प्राप्त न्यायालय है जहां पर कि हर फैसले से जमीनों का करोड़ों का नफा जुड़ा होता है, जो कि भ्रष्ट व्यवस्था के चलते आमतौर पर सरकारी जमीनों के हितों के खिलाफ जाता है। राज्य सरकार एक तरफ जब प्रशासनिक सुधार आयोग बनाकर सरकारी कामकाज में बेहतरी की कोशिश कर रही है, तो उसे प्रयोग के तौर पर राजस्व मंडल के दो अध्यक्षों के कार्यकाल का भी कानूनी विश्लेषण करना चाहिए कि एक खराब अफसर सरकार के खिलाफ, गरीबों के खिलाफ कितना नुकसान करके जा सकता है। और यह बात तो जाहिर है ही कि इस देश में अगर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का विकल्प बाकी हो, तो वहां पर संपन्न लोगों के ही जीतने की गुंजाइश अधिक बचती है। ऐसा नहीं कि हर जज भ्रष्ट है, लेकिन अदालती कामकाज इतना महंगा है कि गरीब अपनी गरीबी के चलते ही मामले हार जाते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को राजस्व मंडल को ईमानदार और काबिल अफसर देकर इस स्तर पर भ्रष्टाचार को खत्म करना जारी रखना चाहिए। 

यह हैवानियत नहीं इंसानियत ही है...


संपादकीय
29 मार्च 2016
मध्यप्रदेश के जबलपुर से एक रेलगाड़ी का एक ऐसा वीडियो आया है जिसमें डिब्बे की खिड़की से बाहर टांगकर एक बेबस नौजवान को पीटा जा रहा है। खबर है कि इसने साथ के किसी मुसाफिर की बोतल से पानी पी लिया था, और उस मुसाफिर ने अपने साथियों के साथ मिलकर इसे ऐसी सजा दी। खबर में यह भी है कि इसे 272 किमी तक ऐसे ही टांगकर रखा गया था। इस खबर को देखें तो लगता है कि अंधेरे में, या बंद कमरे में छुपकर जुर्म करने वालों से परे खुले में ऐसा भयानक अपराध करने वाले लोग बिल्कुल अलग किस्म के मुजरिम हैं। और इनकी क्या सजा हो सकती है, यह आने वाला वक्त बताएगा। 
कहीं पर दो-चार बरस के छोटे बच्चों से बलात्कार होता है, कहीं पर किसी बेबस अकेली महिला से एक दर्जन लोग बलात्कार करते हैं, और कहीं पर मानसिक रूप से विचलित किसी बच्चे या बच्ची से ज्यादती होती है। सड़कों पर देखें तो पुलिस की हिंसा बेहिसाब जारी है, और उसकी तस्वीरें अब वीडियो और टीवी की मेहरबानी से इस तरह सामने आने लगी हैं कि सरकार या अदालत को उसपर कार्रवाई करनी ही पड़ती है। ऐसी खबरों को लेकर यह चर्चा होती है कि यह अमानवीय काम हुआ है। हकीकत तो यह है कि यह सब मानवीय काम ही है। यह मानव के स्वभाव का एक हिस्सा है, और जब यह इतना हिंसक हो जाता है, इतना शर्मनाक हो जाता है कि इंसान अपने नाम के साथ उसे जुड़े देखना नहीं चाहते, तो उसे हैवानियत का काम, या अमानवीय काम बता दिया जाता है। 
जब तक इंसान यह मंजूर नहीं करेंगे कि ऐसे तमाम जुर्म, और ऐसी तमाम हिंसा उसकी ही अपनी सोच का एक हिस्सा है, तब तक उनके सुधरने का सिलसिला शुरू भी नहीं हो पाएगा। सुधार के लिए सबसे पहले जरूरत होती है खामी को परखने की, मानने की, और फिर सुधार की नीयत की। अगर कैंसर की शिनाख्त न हो, उसके इलाज की नीयत न हो, और इलाज की सहूलियत न हो, तो वह बढ़ते ही चलता है। इसलिए इंसानों को यह मानना ही पड़ेगा कि भयानक हिंसा भी उनके ही भीतर का एक हिस्सा है, और उससे उबरना उनके लिए एक चुनौती है। इसके बाद लोगों को अपने भीतर की हिंसा पर पार पाना आना चाहिए, तब कहीं जाकर नौबत सुधर पाएगी। 
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प्रतिबंध की गारंटी वाले इश्तहारों का बड़ा सोचा-समझा कारोबार

  28 मार्च 2016
दिल्ली के अखबारों में दो दिन पहले एक बड़ा सा इश्तहार छपा जिसे लेकर नाराजगी में उबल पड़े लोगों ने उस कंपनी से शिकायत की। इश्तहार की तस्वीर से दिखता है कि यह चिकन से बने हुए खाने के सामान का कोई रेस्त्रां या ब्रांड है, और अंग्रेजी का यह इश्तहार  कहता है- कुछ ऐसा आजमाओ जिसे दोनों हाथों से दबोच सको। 
इसके बाद चिकन की तस्वीर के नीचे लिखा हुआ है हम बुरा नहीं मानेंगे अगर आप अपने हाथों से हमारे नितंब (बन्स), या सीने (ब्रेस्ट) या यहां तक की हमारी जांघों को भी अगर छुएंगे। आपकी जो कुछ भी पसंद हो, हमारे खाने को दोनों हाथों से पकड़ सकते हैं। 
जाहिर तौर पर यह विज्ञापन महिलाओं के शरीर की तरफ इशारा करते हुए बनाया गया है, और ऐसा लगता है कि जिस विज्ञापन एजेंसी ने इसे तैयार किया होगा, उसे खुद भी पता होगा कि मीडिया में पैसे देकर यह ब्रांड इस विज्ञापन को जितनी जगह दिलवाएगा, उससे कई गुना अधिक जगह इसे लेकर खड़े होने वाले विवाद से मुफ्त में इसे मिल जाएगी। बाजार का हाल हमेशा से यही रहता है कि बदनाम हुए, तो क्या नाम न हुआ? 
हिन्दुस्तान ही नहीं, दुनिया के बहुत से देशों में ऐसे विज्ञापन बनाए जाते हैं जिनका मकसद प्रतिबंधित होना ही होता है। वहां पर रंगभेद, नस्लभेद, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले, महिलाओं को नीचा दिखाने वाले, बच्चों पर क्रूरता वाले, हिंसा और अश्लीलता वाले कई तरह के ऐसे विज्ञापन बनाए जाते हैं, सड़कों के किनारे ऐसे पोस्टर-होर्डिंग लगाए जाते हैं जिन पर प्रतिबंध लगना तय सा रहता है, लेकिन इनको लेकर शिकायतें होती हैं, प्रदर्शन होते हैं, और अदालत, सरकार, या किसी और किस्म के संवैधानिक आयोग जब तक इन पर रोक लगाते हैं, तब तक इस ब्रांड का खासा प्रचार हो चुका रहता है। 
लेकिन जनता का एक छोटा तबका जागरूकता के साथ ऐसे विज्ञापनों या प्रचार का विरोध तो करता है, लेकिन इनका बहिष्कार नहीं करता। ऐसी हरकतों को सच में ही अगर रोकना हो तो लोगों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते हुए, ऐसे ब्रांड और सामान का सामाजिक बहिष्कार करना होगा, तब कहीं जाकर इनको कुछ चोट लग सकती है। लेकिन बाजार में ग्राहक की सामाजिक जवाबदेही, उसकी नैतिक जिम्मेदारी का इतना बुरा हाल है कि जो अमरीका मध्य-पूर्व के जिन देशों पर हमले कर रहा है, उन देशों में भी गैरजरूरी अमरीकी सामानों के बहिष्कार की कोई सोच नहीं है। बहुत से मुस्लिम देशों पर अमरीका ने हमले किए हैं, और दुनिया में मुस्लिम-गैरमुस्लिम तनाव खड़ा किया है, लेकिन फिर भी दुनिया के मुस्लिमों में अमरीकी सामानों के बहिष्कार की कोई सोच नहीं है। 
लेकिन विज्ञापनों की अगर बात करें तो हिन्दुस्तान में लोगों की भावनाओं को, और सामाजिक हकीकत को नुकसान पहुंचाने वाले विज्ञापनों का सिलसिला कभी खत्म ही नहीं होता है। इन दिनों टीवी पर एक इश्तहार लगातार चलता है, राजश्री पान मसाला के विज्ञापन में एक फिल्म अभिनेता अलग-अलग समाजसेवी स्थितियों के साथ यह जताने की कोशिश करता है कि राजश्री पान मसाला खाने वालों की सोच महान हो जाती है। इस अभियान का नारा ही यह है कि स्वाद में सोच है।
अब पान मसाला की हकीकत जानने वाले यह तो जानते हैं कि पान मसाला में कैंसर है लेकिन पान मसाला  के स्वाद से भी कोई ऐसी सोच निकल सकती है कि लोग अपने पुराने कपड़े दूसरे जरूरतमंद लोगों को दान करने लगें, रक्तदान करने के लिए जाने लगें, और ऐसी ही दस और किस्म की समाज सेवा पान मसाला के स्वाद से उनको सूझने लगे, तो फिर सरकार को जागरूकता के अभियान बंद करके सरकारी खर्च पर राजश्री पान मसाला ही जनता को अनिवार्य रूप से खिलाना चाहिए। 
यह बहुत ही अपमानजनक, और घटिया अभियान है, लेकिन यह अपने किस्म का अकेला अभियान नहीं है। बाजार के कारोबारी और विज्ञापन एजेंसियों का तालमेल लोगों का ध्यान खींचने के लिए, या बखेड़े खड़े करने के लिए ऐसा काम पूरी दुनिया में करते हैं। यह एक अलग बात है कि इनके मुकाबले जागरूकता पैदा करने के सामाजिक आंदोलन के विज्ञापन इनसे भी कहीं अधिक असरदार बनने लगे हैं, और लोग उनको आगे भी बढ़ाने लगे हैं। ऐसे जागरूकता के विज्ञापन मीडिया के कुछ लोग अपने अखबारों में, या चैनलों पर खुद होकर भी दिखाने लगे हैं, छापने लगे हैं। 
आज मुफ्त के सोशल मीडिया के चलते हुए दिल्ली के इस ताजा विज्ञापन के खिलाफ बड़ा कड़ा विरोध शुरू हुआ है, लोगों ने जमकर इसकी आलोचना की, और कुछ संवैधानिक संस्थाओं ने इसकी शिकायत भी की। लेकिन यह जागरूकता बढ़ते चलना जरूरी है, इसे धिक्कारना जरूरी है, क्योंकि बाजार ऐसी हरकत करते ही रहेगा, और सामाजिक जवाबदेही से अनजान लोग इन विज्ञापनों को देखते हुए भी ऐसे ब्रांड खाते रहेंगे, और उनका कारोबार बढ़ाते रहेंगे। आज ऐसे वक्त पर होना यह चाहिए कि ऐसी सोच के खिलाफ लोगों को सोशल मीडिया पर बात बढ़ानी चाहिए, कुछ जनसंगठनों को ऐसे ब्रांड के खिलाफ उनके सामने प्रदर्शन करना चाहिए, और जो-जो कानूनी कार्रवाई हो सकती है, वह सब करनी चाहिए। 

हेलमेट को लेकर पुलिस की बददिमागी और बेदिमागी

संपादकीय
28 मार्च 2016

सरकारी अमले की बददिमागी और बेदिमागी के चलते अच्छी भली कोई योजना कैसे तबाह हो सकती है यह देखना हो, तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हेलमेट लागू करवाने का काम देखना चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की निजी दिलचस्पी के आधार पर यह अभियान शुरू हुआ, और धीरे-धीरे यह काम चल भी रहा था कि अचानक पुलिस ने चालान करते-करते लोगों को इस तरह मारना-पीटना चालू किया कि हेलमेट के फायदे तो अलग रह गए, सारा माहौल पुलिस के खिलाफ हो गया। पुलिस की हिंसा सड़कों पर सबसे अधिक खुलकर इसलिए दिखती है कि पुलिस वर्दी में रहती है। ऐसे में उसका व्यवहार बाकी लोगों के मुकाबले अधिक काबू में रहना चाहिए, लेकिन जब वह लोगों को लाठियों से पीटने लगे, और उनके कपड़े फाडऩे लगे, तो जनहित में लागू करवाया जा रहा हेलमेट भी बुरा लगने लगता है, और नेतागिरी के मौके की ताक में एक पैर पर खड़े हुए विपक्ष को इसके खिलाफ जुलूस निकालने का मौका मिलता है। राज्य सरकार को यह चाहिए कि राजधानी के पुलिस अमले के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे, जो कि बहुत सी दूसरी बातों को लेकर जनता के बीच बदनामी और नाराजगी भी झेल रहा है। 
लेकिन इन बातों की वजह से मुद्दे की बात किनारे हुई जा रही है कि हेलमेट का क्या होगा? और सवाल हेलमेट का भी नहीं है, वह तो कुल हजार रूपए के भीतर का सामान है, सिर का क्या होगा? आज प्रदेश में एक भी दिन ऐसा नहीं है जब एक से अधिक दुपहिया सवार मारे न जाएं। इन मौतों में से बहुत सी मौतें हेलमेट से रूक सकती हैं। और जैसा कि हम लगातार अपने अखबार में अभियान चलाते हैं, मौतों के आंकड़ों से परे भी सिर पर लगी चोट से होने वाली कई किस्म की दूसरी तकलीफों को देखने की बात है जिससे न सिर्फ जख्मी दुपहिया चालक, बल्कि उसके पूरे परिवार की जिंदगी भी खराब हो जाती है। राजधानी में पुलिस की मार जिन लोगों पर पड़ी है, वे हेलमेट न लगाने की वजह से जांच में फंसे हुए लोग थे। और अब सवाल यह है कि अगर लोग हेलमेट लगाकर चलें, गाडिय़ों पर नंबर ठीक से लिखे रहें, तो न तो जांच की नौबत आए, न बहस की, और न ही तनाव की। लेकिन जब सिलसिला ही गैरजिम्मेदारी और लापरवाही का हो, जब हेलमेट से आधा या चौथाई जुर्माना पटाकर भी लोग बिना हेलमेट लगाए चलने को शान मानें, तो सरकारी अमले का वक्त भी ऐसी जांच में बर्बाद होता है, और एक निहायत गैरजरूरी टकराव खड़ा होता है। हमारा तो यह मानना है कि दुपहिया वाले हर परिवार को घर बैठकर यह तय करना चाहिए कि वे अपने लोगों के सिर फूटने के खतरे के साथ रोज घर से बाहर जाने दें, या कि उसकी हिफाजत करके उन्हें रवाना करें। जब समाज में निजी जिम्मेदारी के प्रति भी जागरूकता इतनी कम है कि लोग सिर अपना नहीं, पुलिस का मान बैठते हैं, और नियमों को तोडऩा उनको बेहतर लगता है, तो सरकार को पूरी कड़ाई से इस नियम को लागू करना चाहिए। 
प्रदेश में कांग्रेस को इस गैरजिम्मेदार बेवकूफी से बचना चाहिए कि वह हेलमेट का विरोध करे। विपक्ष में रहकर नेतागिरी करने का यह मतलब नहीं होता कि सरकार के किसी अच्छे काम का भी विरोध किया जाए। और यह तो सरकार का काम भी नहीं है, पूरे देश में लागू सड़क सुरक्षा का एक नियम है, जिससे छत्तीसगढ़ सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। बार-बार सरकारी अभियान किसी ढिलाई या विरोध के चलते बंद हो जाए, तो उससे उन नियमों का असर भी खत्म होने लगता है। दूसरी तरफ राज्य सरकार को यह भी चाहिए कि अपने अमले की बददिमागी को घटाने के लिए वह चालान की जगहों पर वीडियो रिकॉर्डिंग का इंतजाम करे, जो कि आज के वक्त में बहुत ही सस्ता काम है। कुछ सौ रूपए में आज दिन भर वीडियो रिकॉर्डिंग करने वाले लोग मिल जाएंगे, और पुलिस और जनता के बीच तोहमतों को खड़े होने का मौका भी नहीं मिलेगा। 

पुलिस-राज बस्तर को लेकर राज्य सरकार को एक गंभीर आत्ममंथन की जरूरत

संपादकीय
27 मार्च 2016  

छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल एक और पत्रकार की गिरफ्तारी के बाद बस्तर पुलिस की नीयत कुछ और साफ हुई है कि असहमति को कुचलने के लिए उसके पास आज महज बंदूकें नहीं हैं, किसी के भी खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करवाना भी उसके बस में है, और उन मुकदमों पर जब चाहे तब गिरफ्तारी भी उसका एक हथियार है। कल जिस संवाददाता को गिरफ्तार किया गया है उसके कागजात बताते हैं कि उसके अखबार ने उसे पिछले बरस ही एक बरस के लिए नक्सल प्रभावित इलाके में तैनात किया था, और वहां वह उन पत्रकारों में से एक था जिससे कि पुलिस खफा है। अब पुलिस ऐसी हर गिरफ्तारी के साथ साबित करने पर उतारू है कि जिस तारीख को ऐसे संवाददाता को गिरफ्तार किया गया, उस तारीख पर वह संवाददाता नहीं था, या फिर उसके खिलाफ किसी और तरह का जुर्म दर्ज था। कल जिस संवाददाता को गिरफ्तार किया गया है, उसके खिलाफ एक परीक्षा केन्द्र में जाकर तस्वीरें लेने का जुर्म दर्ज है, और इस जुर्म में तो छत्तीसगढ़ के सैकड़ों संवाददाता-प्रेस फोटोग्राफर गिरफ्तार किए जा सकते हैं। 
छत्तीसगढ़ में यह एक बड़ी अजीब नौबत आकर खड़ी हो गई है कि जिस तरह गूगल पर जाकर एंटीनेशनल सर्च करने पर जेएनयू का नक्शा दिखने लगता है, उसी तरह जर्नलिस्ट की गिरफ्तारी सर्च करने पर छत्तीसगढ़ दिखने लगता है। राज्य सरकार अब तक इस नौबत की गंभीरता पर गंभीरता से कार्रवाई नहीं कर पा रही है, या नहीं कर रही है कि इस राज्य की सारी घरेलू उपलब्धियां बाकी दुनिया की नजरों से दूर खिसक जा रही हैं, और सिर्फ एक ऐसी तस्वीर लोगों को दिख रही है कि इस प्रदेश में पुलिस का राज है, लोकतंत्र खत्म हो चुका है, सरकार का नक्सल-मोर्चे के एक अफसर पर कोई काबू नहीं है, और राज्य के प्रशासन से परे बस्तर एक निलंबित लोकतंत्र से गुजर रहा है। आज दुनिया भर के लोकतंत्रवादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोग ईमानदारी से फिक्रमंद हैं कि एक निर्वाचित सरकार के राज में लोकतंत्र की ऐसी अनदेखी कैसे हो रही है, और यह कब तक जारी रहेगी। 
छत्तीसगढ़ के भीतर रहते हुए हमको सरकार से जो बातें सुनाई पड़ती हैं, उनके मुताबिक बस्तर के नक्सल मोर्चे पर पुलिस की कामयाबी के एवज में वहां की पुलिस को असहमति कुचलने के लिए खुली छूट दी गई है। सरकार में बैठे बहुत से बड़े लोगों का यह मानना है कि बस्तर पुलिस की कामयाबी से घबराए हुए नक्सली बदनाम करने की नीयत से पुलिस पर ज्यादती की तोहमत लगाने के लिए अपने समर्थकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ बस्तर में जी रहे, मीडिया और सामाजिक जीवन में काम कर रहे लोगों का यह मानना है कि पुलिस अपनी ज्यादतियों और अपने जुर्म को छुपाने के लिए लोगों की आवाज को कुचलने का काम कर रही है और एक के बाद एक पत्रकारों पर हो रही कार्रवाई तो उसका एक पहलू है, उसका दूसरा पहलू यह है कि ऐसी गिनी-चुनी गिरफ्तारियां बाकी सैकड़ों संवाददाताओं के लिए यह संदेश है कि वे पुलिस के तय किए हुए राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी दो तबकों में से किसी एक तबके को छांट लें। 
यह बहुत खतरनाक बात है कि लोकतंत्र में निर्वाचित ताकतें एक वर्दीधारी अफसर के हाथों में इतनी ताकत दे रही हैं कि वह पूरी दबंगई से यह तय करता है कि उसे किस मीडिया से बात करनी है, और किससे नहीं, किन संवाददाताओं को साथ लेकर हेलीकॉप्टर में घुमाना है, और किनका बहिष्कार करना है, बस्तर में कौन से सामाजिक आंदोलन को खड़ा करना है, और किसे कुचलना है। बस्तर के आईजी एस.आर.पी. कल्लुरी की ताकत किस्से-कहानियों जैसी हो गई है, और एक अफसर के ओहदे, उस ओहदे के अधिकार, इन सबसे परे उनके बारे में यही पता लगता है कि बस्तर पूरी तरह से उनके हवाले है, और उनके किसी फैसले, उनकी किसी कार्रवाई के खिलाफ राज्य पुलिस और राज्य का प्रशासन सुनने को तैयार नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी खतरनाक नौबत है। देश ने कई जगहों पर ऐसी अफसरी हुकूमत देखी है। पंजाब में केपीएस गिल से लेकर मुंबई में अब तक छप्पन के लिए कुख्यात अफसर को भी देखा है। लेकिन लोकतंत्र का इतिहास ऐसे अफसरों की मनमानी के साथ-साथ यह भी दर्ज करता है कि उनको बढ़ावा देने, या उनको बर्दाश्त करने वाली राजनीतिक ताकतें कौन थीं। छत्तीसगढ़ सरकार को इस नौबत के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए कि मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कुचलना क्या उसके मकसद में शामिल है? क्या इससे उसे कुछ हासिल हो रहा है? क्या नक्सलियों को शिकस्त देने के लिए लोकतंत्र को शिकस्त देना जरूरी है? राज्य सरकार को एक गंभीर आत्ममंथन करने की जरूरत है। 

उत्तराखंड से उठने वाले कई किस्म के सबक

संपादकीय
26 मार्च 2016  

उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार से नाराज चल रहे वहां के कुछ विधायक पार्टी के मुख्यमंत्री को पलटने की कगार पर खड़े हैं, और दो दिन बाद विधानसभा में शक्ति परीक्षण होने जा रहा है। जिसे लेकर कांग्रेस, उसके बागी, और बागियों का साथ देते दिख रही भाजपा, सभी भारी चौकस हैं, अपने लोगों को सम्हाल रहे हैं, और दूसरों को फोडऩे में लगे हुए हैं। भारतीय राजनीति में दल-बदल और बगावत कोई नई बात नहीं है, और जो राज्य जितने छोटे होते हैं, उनमें दल-बदल से सरकार पलटने का खतरा उतना ही बड़ा होता है। सरकार पलटने के बजाय कई बार पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री को भी पलटा जाता है, और इसके पहले भी कांग्रेस और भाजपा उत्तराखंड और झारखंड में ऐसी राजनीतिक उठापटक को झेल चुके हैं। 
जब किसी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के माहौल में ऐसी खरीद-बिक्री होती है, या बगावत होती है और सरकार बदलती है, तो छत्तीसगढ़ में एक अलग मजबूत राज्य की तरह दिखता है। अपने पन्द्रह बरस के अस्तित्व में इस राज्य में एक भी बार सत्ता-पलट नहीं हुआ, और सीएम-पलट भी नहीं हुआ। यह एक अलग बात है कि राज्य के पहले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के अजीत जोगी ने विधानसभा में बहुमत होते हुए भी दर्जन भर से अधिक भाजपा विधायकों का दल-बदल करवाकर उनको अपनी सरकार में जगह दी थी या घोषित-अघोषित महत्व दिया था। और यह भी एक अलग बात है कि इसके बाद के चुनाव में इनमें से एक-दो लोग ही वापिस विधानसभा पहुंच पाए थे, और वे एक गैरजरूरी शक्ति प्रदर्शन का सामान बनकर, एक बार इस्तेमाल होकर फिंक गए थे। लेकिन इसके बाद से इस राज्य में सरकार स्थिरता से चलती आ रही है, और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी बिना किसी राजनीतिक चुनौती के, बिना किसी कानूनी परेशानी के, लगातार बने हुए हैं। 
लोकतंत्र में स्थिरता से थोड़े-बहुत नुकसान हो सकते हैं, लेकिन सरकार में स्थिरता से कई किस्म के फायदे भी होते हैं। झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल, और उत्तर-पूर्व के राज्य सरकार को बचाने के लिए, या मुख्यमंत्री को बचाने के लिए जिस तरह की खरीद-बिक्री को झेलते आ रहे हैं, वह बड़े नुकसान के साथ ही हो पाया है। विधायकों को साथ जोड़े रखने के लिए, या उन्हें तोडऩे के लिए किस तरह का खर्च होता है, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है, और कर्नाटक में कुछ बरस पहले भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटाने के लिए भाजपा के ही खदान मालिक मंत्री रेड्डी बंधुओं ने जिस भयानक अंदाज में विधायकों को बाढ़ से तबाह राज्य के बाहर ले जाकर सात सितारा होटलों में रखा था, वह सब मुफ्त में तो हुआ नहीं था। और रेड्डी बंधुओं ने वह पैसा किस तरह से पाया था वह अभी अदालत के कटघरे में उनसे पूछा और उनको बताया जा रहा है। 
छत्तीसगढ़ अपनी राजनीतिक साजिशों और खरीद-बिक्री के बावजूद ऐसे बड़े पैमाने के दल-बदल और सत्ता-पलट से बचा हुआ है। इस स्थिरता से कुछ किस्म की बुराइयां इस राज्य में पनप गई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की जनता राजनीतिक खरीद-बिक्री को बर्दाश्त करने वाली नहीं है, खासकर बड़े पैमाने पर अगर यहां पर कोई ऐसा करेगा, तो जनता उसे खारिज भी करेगी। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीतिक अस्थिरता कांग्रेस के हाथ से एक और राज्य को छीनकर ले जा सकती है, लेकिन इससे कांग्रेस को यह सबक भी लेना चाहिए कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में एक बहुगुणा परिवार की जैसी कुनबापरस्ती वह जमाने से चलाते आ रही है, वह आज उसे खुद भारी पड़ रही है। जिस किसी राज्य में ऐसी उथल-पुथल होती है, उसे देखते हुए बाकी राज्यों को, बाकी प्रदेशों और नेताओं को, पार्टियों की लीडरशिप सबक लेना चाहिए। 

अमरीकी चुनाव, हिंसा और गंदगी से भरे हुए बयान...

संपादकीय
25 मार्च 2016  
अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी का उम्मीदवार बनने की हसरत लेकर पार्टी के भीतर प्रचार में जुटे डोनाल्ड ट्रंप अभी तक तो मुस्लिमों और प्रवासियों के खिलाफ अपनी नफरत का तेजाब फैला रहे थे, और अपनी असीमित दौलत का घमंड जता रहे थे, लेकिन अभी उन्होंने गंदगी की एक नई मिसाल कायम की है। उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रतिद्वंद्वी टेड क्रूज की पत्नी को लेकर भारी गंदी बातें कहना शुरू किया है। जमीन जायदाद के एक बड़े सफल कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप एक खरबपति हैं, और उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि उन्हें चुनाव लडऩे के लिए किसी चंदे की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने महिलाओं के खिलाफ ओछी बातें कहना जारी रखा है, मुस्लिम देशों के लिए हमलावर बातें कहना जारी रखा है, और अमरीका में आकर रहने वाले दूसरे देशों के प्रवासी कामगारों के खिलाफ भी गंदगी की बात लगातार कर रहे हैं। अभी दो दिन पहले बेल्जियम के ब्रसेल्स में जो हमला हुआ, उसको लेकर भी उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ बहुत कुछ कहा। लेकिन अपनी ही पार्टी के एक नेता के खिलाफ बोलते हुए उन्होंने ट्विटर पर उसकी बीवी को लेकर घटिया बातें कहीं, और इसे लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर घमासान मचा हुआ है। 
भारतीय राजनीति के लिए यह कुछ अटपटी बात है कि एक ही पार्टी के दो नेता किस तरह पार्टी के मंचों पर ही एक-दूसरे के खिलाफ बोलते हैं, और पार्टी के रजिस्टर्ड मतदाताओं के बीच अपनी लोकप्रियता साबित करके राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी बनने की कोशिश करते हैं। भारतीय लोकतंत्र में ऐसी बहस नहीं होती है, और पार्टी बंद कमरे में अधिकतर बातें निपटा लेती हैं। लेकिन अमरीका में भी आमतौर पर वैचारिक असहमति और सैद्धांतिक विरोध बहस का सामान रहते हैं। यह पहला मौका है जब पत्नियों पर बात सामने आई है। हालांकि यह सिलसिला पहले डोनाल्ड ट्रंप की एक मॉडल रही पत्नी की एक नग्न तस्वीर को लेकर शुरू हुआ, और जब डोनाल्ड टेक्सास राज्य में पार्टी के भीतर प्रचार को पहुंचे तो एक संगठन ने ऐसी नग्न तस्वीर के साथ एक विज्ञापन दिया। ट्रंप ने इसे अपने प्रतिद्वंद्वी टेड क्रूज की हरकत बताते हुए ट्विटर पर लिखा कि वे क्रूज की पत्नी के बारे में कई राज खोल देंगे। इसके साथ ही ट्रंप ने अपनी पत्नी की सुंदरता दिखाते हुए उसकी एक तस्वीर को क्रूज की साधारण दिखने वाली पत्नी की तस्वीर के साथ जोड़कर उसे ट्विटर पर डाला। ऐसे घटिया विज्ञापन के लिए तो क्रूज सीधे जुड़े हुए नहीं पाए गए, लेकिन जब ट्रंप ने लगातार उनकी पत्नी के बारे में घटिया बातें कहीं, तो क्रूज ने ट्रंप के लिए कैमरों के सामने बयान दिया कि वे एक सिसकते हुए कायर हैं। 
दुनिया के सबसे ताकतवर देश के सबसे ताकतवर ओहदे के लिए चल रहे प्रचार की यह गंदगी दुनिया को हैरान करती है कि ऐसी सोच वाले लोग अगर दुनिया पर राज करने के लिए आ जाएंगे, तो क्या होगा? घोर नस्लभेदी, घोर साम्प्रदायिक, कट्टरपंथी, अमानवीय, और दकियानूसी सोच वाले इंसान अगर अमरीकी राष्ट्रपति बनते हैं, तो उनके हमलावर तेवरों के मुकाबले दुनिया में आतंक और बढ़ते चलेगा। फिर जिस तरह की गंदी बातें आज वहां हो रही हैं, निजी संपन्नता का घमंड जिस तरह से सामने रखा जा रहा है, उससे लगता है कि दुनिया का यह एक सबसे बड़ा सबसे अधिक पढ़ा-लिखा समझा जाने वाला देश किस हद तक असभ्य भी है। ऐसे बयानों के बाद भी अगर रिपब्लिकन पार्टी अपने नेताओं पर कोई काबू नहीं रख सकती, तो ऐसी आजादी भला किस काम की जो आपसी लड़ाई में सार्वजनिक गंदगी फैला रही है। 

पाकिस्तान में परमाणु हथियार चोरी होने के खतरे की रिपोर्ट

संपादकीय
22 मार्च 2016  

अमरीका के एक गैरसरकारी संगठन ने अपनी शोध रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि पाकिस्तान में गैरसामरिक परमाणु हथियार बनाए जा रहे हैं, और इसके साथ ही उसके परमाणु हथियारों की चोरी का खतरा बढ़ गया है। इस गंभीर और महत्वपूर्ण थिंकटैंक की रिपोर्ट वजनदार मानी जा रही है, और भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों के लिए यह फिक्र का एक बड़ा सामान है। 
दुनिया में परमाणु हथियार बनाने की ताकत रखने वाले देश गिने-चुने हैं। दर्जन भर से कम ऐसे देशों में से जिनमें सरकार पर कभी फौज और कभी आतंकियों की पकड़ होती रहती हैं, उनमें पाकिस्तान सबसे ऊपर है। वहां पर जिस तरह से धर्मान्ध कट्टरपंथी, अलोकतांत्रिक और तानाशाह, जंगखोर और हमलावर ताकतें समय-समय पर सरकार पर काबू करती हैं, उन्हें देखते हुए ऐसी सरकार के पास परमाणु हथियारों का होना अपने आपमें खतरनाक था, लेकिन अब अगर वहां की सरकार गैरसामरिक परमाणु हथियार भी बनाते चल रही है, तो किसी अपराध-कथा की तरह आतंकी संगठन वहां की कुछ ताकतों से ऐसे हथियार खरीद भी सकते हैं, और उनका इस्तेमाल जरूरी नहीं है कि मुंबई के आतंकी हमले जैसे किसी पड़ोसी पर ही हो, ऐसे हमले इन हथियारों को किसी दूसरे देश ले जाकर वहां पर भी हो सकते हैं। जिस अमरीकी मदद से पाकिस्तान में फौजी सामान खरीदा जाता है, और सरकार के हाथ मजबूत होते हैं, वह अमरीका दुनिया में आतंकियों का आज सबसे बड़ा और पहला निशाना है। इसलिए अमरीका के एक संगठन की इस रिपोर्ट को देखते हुए अमरीका को खुद को समझना चाहिए कि उसके दिए हुए पैसों का कैसा-कैसा इस्तेमाल हो रहा है। 
लेकिन ठीक पड़ोस में बसे हुए भारत को भी यह देखना होगा कि ऐसे किसी परमाणु-आतंक या परमाणु हमले की नौबत आती है तो वह खुद क्या करेगा। दुनिया के कई देश ऐसी नौबत आने पर सीधे-सीधे हमले के लिए तैयार रहते हैं। लेकिन भारत और पाकिस्तान के पास जितना परमाणु जखीरा है वह दोनों देशों को दस-बीस बार खत्म करने के लिए बहुत है। इसलिए समझदारी इसमें है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत हो, और वहां की परमाणु तैयारियां घटें। भारत और पाकिस्तान दोनों की ही फौजी खर्च घटाना चाहिए, और अमरीका को चाहिए कि वह हिन्द महासागर क्षेत्र में अपनी फौजी सोच को बदले। 

सोशल मीडिया पर लापरवाही या बदनीयत छुपाए नहीं छुपती...

21 मार्च 2016
संपादकीय

फेसबुक पर अभी एक ऐसे कमोड की तस्वीर किसी ने पोस्ट की है जिसके भीतर से रौशनी आते दिख रही है, और इस मजाकिया पोस्ट में लिखा गया है कि इसके इस्तेमाल पर यह कम्प्यूटर-नियंत्रित कमोड तुरंत ही पखाने का वैज्ञानिक विश्लेषण करके नतीजों को  उनके फेसबुक और ट्विटर पेज पर डाल देगा। और आज हकीकत कुछ इसी तरह की है कि लोग अपने पल-पल और अपनी रग-रग की खबरें फेसबुक पर डाल रहे हैं। इनमें से कुछ खबरें, कुछ तस्वीरें, और कुछ बातें तो बाकी लोगों के काम की हो सकती हैं, लेकिन लोग जब यह मानकर चलते हैं कि उनके बहुत करीबी लोग ही इन्हें देखेंगे, और देखकर मजा लेंगे, और बात आई-गई हो जाएगी, तो वैसा होता नहीं है। 
आज शादी-ब्याह की बातचीत हो, नौकरी पर रखना हो, किसी को कर्ज देना हो, या किसी सामाजिक संस्था की तरफ से स्कॉलरशिप देनी हो, इन तमाम बातों के लिए लोगों के मिजाज, उनके रूझान, उनके चाल-चलन, और उनकी संगत, इन सबका अंदाज लगाने के लिए लोग शुरुआत उनके फेसबुक पेज से ही करते हैं। किसी शादी के लिए रिश्ता आया, तो लोग फेसबुक पेज पर जाकर उसकी हर तस्वीर देख लेते हैं, दोस्तों की लिस्ट किस तरह की है, वह भी देख लेते हैं, और तस्वीरों पर दोस्तों के कमेंट कैसे रहते हैं, उनको भी बारीकी से पढ़ लेते हैं। और आज कम्प्यूटर-फोन में सहूलियत इतनी हो गई है कि लोग स्क्रीनशॉट लेकर रख लेते हैं, ताकि बाद में मिटाया  भी जाए, तो भी सुबूत बना रहे। यह सब तो असल और सच की बात है, लोग डिजिटल छेडख़ानी करके स्क्रीनशॉट में तरह-तरह के झूठ भी गढ़ देते हैं। 
बहुत से लोग सरकारी नौकरी करते हुए राजनीतिक और साम्प्रदायिक मुद्दों पर बहुत खतरनाक किस्म की बातें लिखते हैं, या दूसरों की लिखी हुई बातों को अपने पेज पर पोस्ट करते हैं। भारत में सरकारी सेवा-शर्तों में एक खतरनाक शर्त यह भी है कि किसी अधिकारी-कर्मचारी का आचरण उसकी नौकरी और कामकाज, पद की जिम्मेदारी की प्रतिष्ठा घटाने वाला न हो। छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय में सरकारी अफसरों के सोशल मीडिया पन्नों को लेकर विवाद छिड़ा भी है, लेकिन बात अधिक दूर तक नहीं गई है। लेकिन इन तमाम निजी खतरों से परे यह समझना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया की संभावनाएं क्या हैं, सोशल मीडिया पर मौजूदगी के साथ कौन सी सामाजिक जिम्मेदारी जुड़ी हुई है। 
अभी कोलकाता में हुए भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के दौरान स्टेडियम में भारतीय राष्ट्रगान गाने वाले अमिताभ बच्चन को लेकर सोशल मीडिया पर दसियों लाख लोगों ने ट्वीट किए और लिखा कि उन्होंने इसके लिए चार करोड़ रूपए लिए। दो दिन तक यही चलते रहा, इसके बाद सौरभ गांगुली ने यह साफ किया कि अमिताभ ने एक धेला भी नहीं लिया और अपने सफर का, अपने होटल का खर्च भी खुद उठाया। अब इन दो दिनों में जिन लोगों ने अमिताभ बच्चन पर हमले किए, और ओछी बातें लिखीं, उनकी इज्जत हमारी नजरों में वैसे भी घट गई। लेकिन आज हमसे भी अधिक चौकन्नी नजरों वाले लोग दुनिया में मौजूद हैं जो कि इंटरनेट पर लोगों की जांच-पड़ताल के काम में लगे रहते हैं। इसलिए लोगों को न सिर्फ अपनी निजी जिंदगी की बातों को पोस्ट करते हुए, बल्कि दूसरी खबरों को, दूसरे आरोपों को पोस्ट करते हुए भी यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे जिसकी इज्जत को तबाह करना चाहते हैं, या जिसकी इज्जत को बढ़ाना चाहते हैं, वह मकसद तो बातों के सच होने पर ही पूरा हो सकेगा, लेकिन वह मकसद पूरा नहीं भी होगा, तो भी झूठ पोस्ट करने से ऐसा करने वालों की इज्जत तो तबाह हो ही जाती है। लोग अपनी विश्वसनीयता खो बैठते हैं, और उसके साथ-साथ उस विचारधारा या मुद्दे की विश्वसनीयता भी खत्म हो जाती है जिसे कि वे बढ़ाना चाहते हैं। 

पेड़ महज लकड़ी-पत्ते-फल नहीं, बेहतर जिंदगी सिखाने वाले दार्शनिक

21 मार्च 2016

आज विश्व वानिकी दिवस पर दुनिया भर में जंगलों की याद में सालाना आंसू बहाए जाएंगे। लेकिन इस मौके पर राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक दिलचस्प कार्यक्रम हुआ। चंबल के बीहड़ों में एक समय राज करने वाले, और बाद में आत्मसमर्पण करके, या बिना आत्मसमर्पण किए, सजा काटकर जेल से निकले हुए भूतपूर्व डकैतों ने एक सम्मेलन में जंगल विभाग के एक बड़े अफसर और एक सांसद की मौजूदगी में बात की, और कहा कि वे जंगल बचाने के लिए अपना योगदान दे सकते हैं क्योंकि उनके इलाकों में उनकी बात अभी भी चलती है, और जब चंबल के बीहड़ों पर वे राज करते थे, तब उनकी मर्जी के बिना वहां कोई एक पत्ता भी नहीं तोड़ सकता था। ये बीहड़ राजस्थान, मध्यप्रदेश, और उत्तरप्रदेश तीन राज्यों में बिखरे हुए हैं, इसलिए वहां मौजूद अफसरों ने कहा कि वे केन्द्र सरकार के सामने उनका यह प्रस्ताव रखेंगे। 
इधर जयपुर से दूर छत्तीसगढ़ के बस्तर में बहुत से लोगों का यह मानना है कि वहां पर जंगल का कटना अगर धीमा हुआ है, तो इसके लिए वन विभाग के अफसर जिम्मेदार नहीं हैं, वहां नक्सलियों की जो मौजूदगी है, और जितना उनका हुक्म चलता है उसकी वजह से जंगल नहीं कट पा रहे हैं, और जंगली जानवरों का शिकार कम हुआ है। अब यह कितना कम हुआ है, यह तो पेड़ और जानवर ही बता सकते हैं क्योंकि उपग्रह से जुटाई गई जानकारी भी एक गलत किस्म की तस्वीर पेश करती है, और यह बताती है कि छत्तीसगढ़ में जंगल बढ़ गए हैं। 
जंगल और पेड़ की बात करें तो लगता है कि विज्ञान की बताई बातों को तो लोगों को याद रखना ही चाहिए कि किस तरह पेड़ ऑक्सीजन देते हैं, बारिश को खींचते हैं, धरती को उपजाऊ बनाते हैं, पंछियों को रहने की छाया देते हैं, और लोगों को फल, पत्ते, और लकड़ी भी देते हैं। यह तो बात हुई विज्ञान की, लेकिन एक दूसरे नजरिए से देखें तो पेड़ों से इंसान जिंदगी को लेकर एक फलसफा भी ले सकते हैं, जो कि कुदरत के हर पहलू में है। पेड़ बिना कहे, बिना मुंह खोले एक दार्शनिक की तरह खड़े रहते हैं, और इंसान अगर खुद होकर उन्हें देखकर कुछ सीखें, तो उनकी जिंदगी बदल सकती है। 
पेड़ लोगों को सिखाते हैं कि किस तरह उन तमाम लोगों के लिए भी फल-फूल और छाया देनी चाहिए, जिनसे पेड़ों को कुछ भी वापिस नहीं मिलता। बिना किसी मतलब के, बिना किसी उम्मीद के कैसे दूसरों का भला किया जा सकता है, इसकी एक बड़ी नसीहत पेड़ों से मिल सकती है। पेड़ों से एक यह सीखना भी होता है कि आम बोने से आम के पेड़ लगते हैं, और आम के फल मिलते हैं। दूसरी तरफ बबूल बोने से बबूल के पत्ते और कांटे मिलते हैं। मेरे लिखने का यह मकसद नहीं है कि बबूल का पेड़ बुरा होता है, बहुत से ऐसे जानवर हैं जिनको बबूल की पत्तियां सुहाती हैं, और जो उसके कांटों के बीच से ही उसकी पत्तियों को खा लेने की खूबी रखते हैं। लेकिन फिर भी इंसान को यह सीखने मिलता है कि उनके जिस तरह के रहते हैं, उसी तरह का फल उन्हें हासिल होता है, या झेलना पड़ता है। जिंदगी में अच्छे काम करने के लिए इससे बड़ी नसीहत और तो किसी ज्ञानी-विज्ञानी से भी नहीं मिल सकती है। 
अब पेड़ों की एक और खूबी देखें, तो वह यह कि हर बरस एक तय मौसम में पेड़ की पत्तियां झड़ जाती हैं, और पतझड़ के बाद जो नई कोंपलें फूटती हैं, वे इसीलिए आ पाती हैं कि पुरानी पत्तियों ने उनके लिए जगह छोड़कर अपनी जिंदगी को काफी मान लिया, और चल बसीं। इंसानों को भी यह सीखने और समझने की जरूरत है कि किस तरह घर-परिवार में, दफ्तर-कारोबार में, समाज या राजनीति में एक वक्त गुजारकर उनको नई पीढ़ी के लिए जगह खाली करनी चाहिए। लोग कंधों पर लेटकर आखिरी सफर शुरू करने के करीब पहुंच जाते हैं, और तब तक उनकी आखिरी हसरत शुरू भी नहीं हो पाती। ऐसी हसरतों को अक्ल सिखाने के लिए, राह दिखाने के लिए पेड़ों के पत्तों की मिसाल बहुत ही वैज्ञानिक भी है, और सरल भी है। 
दुनिया के जो सबसे समझदार समाज हैं, वे आदिवासी, वे जंगलवासी, या दुनिया की अलग-अलग जुबानों में नेटिव, एबओरिजिन, और ट्राइबल जैसे कई नामों से बुलाए जाने वाले लोग कुदरत के इतने करीब रहते हैं, और उससे इतना तालमेल बिठाकर चलते हैं, उससे इतना सीखते चलते हैं, कि उनकी समझ शहरी दुनिया की सबसे अधिक पढ़ी-लिखी बिरादरी से भी बहुत अधिक होती है। एक गजल के एक शेर के अंदाज में कहें तो जो पेड़ों के बहुत करीब होते हैं, वे बड़े खुशनसीब होते हैं। 
आदिवासी समाज की खूबियों को देखें, तो अपनी न्यूनतम जरूरत के लिए ही वे जंगल से कुछ लेते हैं, और एक किफायत में जीते हैं। उनके बीच औरत और मर्द के हकों का फासला कम होता है, और उनकी सोच में इंसाफ कूट-कूटकर भरा होता है। वे शहरियों के खून के प्यासे नहीं रहते, दूसरी तरफ शहरी उनके जंगलों, और उन जंगलों के नीचे दबी खदानों के खून के प्यासे रहते हैं। कुदरत के करीब रहने का एक बड़ा फायदा यह होता है कि लोगों की सोच बिना पढऩा सीखे, बिना विज्ञान नाम का शब्द जाने वैज्ञानिक हो जाती है। 
इसलिए आज जब दुनिया में पेड़ों का नुकसान होता है, तो वह नुकसान सिर्फ लकड़ी, पानी, ऑक्सीजन, फल और छाया का नहीं होता है, वह नुकसान एक पूरी स्कूल का नुकसान होता है, जिंदगी की ऐसी स्कूल जो कि पीढिय़ों को सब कुछ सिखाते चलती है। जिसके पास ब्लैकबोर्ड नहीं है, जिसके पास चॉक या डस्टर भी नहीं है, लेकिन जिसके पास असल जिंदगी की सबसे सकारात्मक समझ लबालब है। इसलिए जब कभी जंगलों की बात होती है, तो पेड़ों सहित बाकी कुदरत के बारे में यह भी सोचना चाहिए कि यह धरती की किसी मुर्दा दौलत की बात नहीं हो रही है, यह धरती में पीढ़ी दर पीढ़ी को समझदार बनाने की स्कूल की बात भी हो रही है। पेड़ कहते कुछ नहीं हैं, कट जाने पर भी बद्दुआ नहीं देते हैं, लेकिन इंसान उस पेड़ की लकड़़ी, उसके फल, उसके पत्तों जैसी बहुत सारी चीजों के साथ-साथ उस पेड़ से सीख पाने की संभावना भी खत्म कर बैठते हैं। 
और फिर जहां से बात आज शुरू की है, वहीं पर अगर पहुंचे, तो यह सोचने की बात है कि क्या आज इंसान इस कदर हैवान हो गए हैं कि पेड़ों की हिफाजत नक्सलियों या भूतपूर्व डकैतों की मोहताज हो गई है? और यह हैवान शब्द भी मैं प्रचलित भाषा से उठाकर इस्तेमाल कर रहा हूं, हैवान और कुछ भी नहीं है, वह इंसान के भीतर का वह हिस्सा है, जिसे अपना मानने से इंसान को शर्मिंदगी होती है, और वह अपनी किडनी, अपने लीवर, अपनी आंखों की तरह के ही अपने इस हैवान को अपने से बाहर दिखाने की कोशिश करने लगते हैं। अगर पेड़ों से इंसानों ने कुछ सीखा होता, सीखना जारी रखा होता, तो वे यह सीखते कि अपने कांटों को लेकर बबूल के मन में कोई अपराधबोध नहीं होता, और वह उन कांटों को किसी और पेड़ का बताने के लिए उनको कोई और नाम नहीं दे देता। 
किसी पेड़ के कटने से जो कागज बना होगा, उसी पर अभी यह लिखा जा रहा छपेगा। इसलिए कागज को एक हद से अधिक बर्बाद न करने के लिए इस बात को यहां रोक देना बेहतर है, लेकिन लोग पेड़ों के सामने कुछ देर बैठकर उसके पहलुओं, और उसके तौर-तरीकों के बारे में जरूर सोचें कि अपनी इंसानी जिंदगी में उन्हें पेड़ों से क्या-क्या सीखने मिल सकता है। 

एक खेल और एक मैच लंबा सबक सिखा जाते हैं

संपादकीय
20 मार्च 2016  

कल जिन लोगों ने कोलकाता के ईडन गार्डन स्टेडियम में बैठकर भारत और पाकिस्तान का मैच देखा, और उनसे हजारों गुना अधिक जिन लोगों ने दुनिया भर में टीवी पर इसे देखा, उनको यह बात पता नहीं सूझी है या नहीं लेकिन हमारा पूरा ध्यान इस बात पर था कि स्टेडियम में उकसाने और भड़काने वाले कोई नारे तो नहीं लग रहे। लेकिन एक बहुत ही दोस्ताना अंदाज में मैच निपटा, दोनों टीम के खिलाड़ी एक-दूसरे की पीठ थपथपाते दिखे और राहत के साथ एक शाम गुजरी। 
सोशल मीडिया की मेहरबानी से दोनों देशों में जो बवाली लोग हैं, वे एक-दूसरे के खिलाफ बकवास करने को अपना जिम्मा समझते हुए भड़काने में लगे रहते हैं, और ऐसे ही लोग आनन-फानन यह तय कर लेते हैं कि गद्दार कौन हैं। जब पाकिस्तानी क्रिकेट कप्तान शाहिद अफरीदी ने भारत पहुंचते ही यह कहा कि पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को भारत में पाकिस्तान से भी अधिक मोहब्बत मिलती है, तो पाकिस्तान में इसके खिलाफ लोग अदालत पहुंच गए, और शायद एक अदालत से अफरीदी को नोटिस भी जारी हो गया। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में सानिया मिर्जा के पीछे लोग इसलिए लग जाते हैं कि उन्होंने एक पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी से शादी की है, हालांकि सानिया अब तक हिन्दुस्तानी नागरिक ही हैं, और पूरी दुनिया में टेनिस के खिताब जीत-जीतकर हिन्दुस्तान का नाम रौशन कर रही हैं। जब उन्होंने शादी की थी तो हिन्दुस्तान के साम्प्रदायिक लोगों ने, और इनमें से कुछ बड़े नेताओं ने, पार्टियों ने बयान दिए थे कि क्या सानिया को हिन्दुस्तान में शादी के लायक कोई लड़का नहीं दिखा? 
हमने कुछ दिन पहले भी भारत और पाकिस्तान के सिलसिले में यह लिखा था कि सरहद और राजधानियों में जो तनाव एक-दूसरे देश के खिलाफ भड़काया जाता है, और उस आग का टुकड़ा लाकर टीवी चैनल जिस अंदाज में आग भड़काने की कोशिश करते हैं, उसका सबसे सही जवाब खेल के मैदान, फिल्में, साहित्य, और नौजवानों की आपस में मुलाकात ही हो सकते हैं। दोनों देश के जो लोग बड़े ओहदों पर बैठे हुए हैं, उन्हें अपनी फौजी वर्दी के इस्तेमाल को जायज और जरूरी ठहराने के लिए नफरत और जंग की बातें करना पड़ता है। इसी तरह जो लोग सियासी राजनीति करते हैं, उन लोगों की भी यह बेबसी रहती है कि एक काल्पनिक दुश्मन खड़ा करके, उसके खिलाफ युद्धोन्माद खड़ा करके इस दहशत में अपने-अपने देशों में वोट बटोरे जाएं। लेकिन बार-बार सरहद के दोनों तरफ के खिलाडिय़ों ने यह साबित किया है कि वे जंगी तनाव को घटा सकते हैं, और खिलाड़ी भावना के साथ एक दरियादिली से एक-दूसरे को गले लगा सकते हैं। 
शाहिद अफरीदी ने हिन्दुस्तान आते ही भारतीय प्रशंसकों के बारे में जो कहा, वह बात पाकिस्तान के क्रिकेट प्रशंसकों को बुरा कहने के लिए नहीं थी, एक मेहमान खिलाड़ी एक मेजबान देश के क्रिकेट-शौकीनों की तारीफ की एक बुनियादी तमीज-तहजीब निभा रहा था। लेकिन नफरत पर जीने वाले लोग इस सामान्य शिष्टाचार के खिलाफ भी अदालत चले गए। कल कोलकाता में जिस अमन-चैन के साथ यह मैच हुआ, उसकी एक वजह यह भी है कि बहुत लंबे वामपंथी शासन और उसके बाद से ममता बैनर्जी के शासन में भी बंगाल में साम्प्रदायिकता को जगह नहीं मिली, उसे बढ़ावा नहीं मिला। यही मैच मुम्बई में न होने देने के लिए शिवसेना जान लड़ा देती है। इसलिए कल की इस शानदार कामयाबी से राज्य सरकारों को यह भी सीखना चाहिए कि वे अपने प्रदेश में जैसा सद्भाव रखते हैं, वह कदम-कदम पर नागरिकों के बर्ताव में भी झलकता है। यही बात अगर उत्तरप्रदेश में हुई रहती तो इस मैच के मौके का इस्तेमाल कई लोग नफरत को फैलाने में कर लेते। भारत की राज्य सरकारों को, और राजनीतिक दलों को गंभीरता से यह सोचना चाहिए कि प्रदेश में साम्प्रदायिक सद्भाव के लंबे फायदे होते हैं, और वे एक चुनाव के फायदों के मुकाबले कई गुना अधिक होते हैं। फिलहाल इस शानदार मैच के लिए, जीत-हार से परे, दोनों ही टीम बधाई की हकदार हैं। 

पवन दीवान के नाम पर विवि? और नहीं, अब और नहीं...

19 मार्च 2016
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के संत-कवि और कांगे्रस-भाजपा की राजनीति में लंबा वक्त गुजारने वाले, भागवत-प्रवचनकर्ता पवन दीवान के गुजरने पर यह तो होना ही था कि उनकी स्मृति में कुछ बनाने की बात उठती। और स्मृति गं्रथ जैसी छोटी बातों से परे अब यह मांग भी सामने आई है कि उनके कर्मस्थान राजिम में एक संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। ऐसी किसी मांग पर विचार करने के पहले, और ऐसी मांग सामने आने की वजह से छत्तीसगढ़ को उन तमाम विश्वविद्यालयों पर एक बार फिर सोच लेना चाहिए जो कि राज्य नया बनने के बाद शुरू किए गए, और इन पन्द्रह बरसों में शायद पन्द्रह नए विश्वविद्यालय यहां शुरू हुए जिनमें दर्जनभर तो सरकारी ही होंगे। 
अपने दस-बारह बरस के अस्तित्व में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर जितने सेमीनार किए, जितने व्याख्यान एक विचारधारा के पत्रकारों और विचारकों के करवाए, शायद उतनी गिनती वहां से निकले हुए काबिल पत्रकारों की भी नहीं है। इतने बरस, शहर से लगी इतनी बड़ी जमीन, और सरकार के करोड़ों रुपये हर बरस, अभी भी शायद इस विश्वविद्यालय में कुछ सौ छात्र-छात्राएं ही पढ़ते हैं, और शायद उनमें भी बहुत से महज नाम के लिए फर्जी हाजिरी से इम्तिहान देने के लिए। जिस पूरे प्रदेश में रविशंकर विश्वविद्यालय अकेला था, वहां पर अब बिलासपुर का विश्वविद्यालय अलग, सरगुजा का अलग, बस्तर का अलग, और अब तो दुर्ग का भी अपना विश्वविद्यालय हो गया है। नतीजा यह है कि आज रविशंकर विश्वविद्यालय पुराने अविभाजित रायपुर जिले का ही विश्वविद्यालय है। जिस तरह कोई कॉलेज खोले जाते हैं, उसी तरह विश्वविद्यालय खोल दिए गए। आज प्रदेश में संगीत-कला का विश्वविद्यालय अलग है जिसमें कुछ सौ छात्र-छात्राएं हैं, और बाहर के कॉलेजों के कुछ हजार छात्र-छात्राएं वहां से इम्तिहान देते हैं। मेडिकल कॉलेजों के लिए एक विश्वविद्यालय बन गया जो चिकित्सा से जुड़ी हुई गैरडॉक्टरी के कोर्स भी देखता है, और इनमें से हर कॉलेज का हाल फटेहाल-दीवालिया है, और इनमें से कुछ भी विश्वविद्यालय के काबू में नहीं हैं। ऐसा ही हाल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय का है, और अब तो कोई खुला विश्वविद्यालय, कोई कामधेनु विश्वविद्यालय, और कोई किसी और बात के लिए बनाया गया विश्वविद्यालय है।
जैसा कि नाम से जाहिर होता है, विश्वविद्यालय का विश्वस्तर से कुछ तो लेना-देना होना चाहिए। आज इन विश्वविद्यालयों के कुलपति एक कॉलेज के मैनेजर की तरह सरकारी दफ्तरों में पर्ची भीतर भेजकर बाहर खड़े रहते हैं। छोटे-छोटे इलाकों के लिए, छोटी-छोटी बातों के लिए नए-नए विश्वविद्यालय खड़े करना सिर्फ उन्हीं लोगों के फायदे का रहता है जो कि कुलपति बनना चाहते हैं, और बड़े-बड़े अहातों में बड़ी-बड़ी इमारतों के नए साम्राज्य के ठेके देना चाहते हैं, किसी-किसी महान नाम पर बनाई गई पीठ पर उसी तरह परजीवी बनकर सवारी करना चाहते हैं जिस तरह बड़े जानवर की पीठ पर बैठे पंछी कीड़े खाते पेट भरते हैं।
अब पवन दीवान के नाम पर एक संस्कृति विश्वविद्यालय की मांग हो रही है, और कोई हैरानी भी नहीं है कि सरकार एक बड़े तबके को खुश करने के लिए ऐसा कोई फैसला भी ले ले, और खासकर इसके कुलपति की कुर्सी पर जिन लोगों का दावा हो सकता है, वे लोग दमखम के साथ इस विश्वविद्यालय के लिए सरकार के पीछे भी लग सकते हैं। लेकिन या तो इन विश्वविद्यालयों का नाम विद्यालय कर देना चाहिए, और इनको जिला स्तर पर खोल देना चाहिए, या फिर विश्वविद्यालय नाम से आज छत्तीसगढ़ में चल रहे औने-पौने संस्थानों को विश्वविद्यालय बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस बार के राज्य बजट में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नई मुनादियों के बजाय पुराने कामों को निपटाने और मजबूत करने पर जोर दिया है। छत्तीसगढ़ में अगले सौ बरस के लिए पर्याप्त विश्वविद्यालय खुल चुके हैं, और जब तक कोई बहुत मौलिक सोच-सूझबूझ न हो, कोई नया दायरा न हो, किसी नए विश्वविद्यालय की बात भी नहीं करनी चाहिए। 

नक्सलियों को तब तक तेजी और ताकत से खत्म करें, जब तक कि..

संपादकीय
18 मार्च 2016  

बस्तर में नक्सलियों के लगाए विस्फोटकों की चपेट में कल एक बच्ची के टुकड़े हो गए, और आज एक ग्रामीण आदिवासी महिला मारी गई। ये दो मौतें इसलिए दिल दहलाती हैं कि ये न तो पुलिस या किसी सुरक्षा बल में थीं, न ही पुलिस की मुखबिर थीं, न ही नक्सलियों के लिए किसी तरह का खतरा थीं, उनका जुर्म बस यही था कि वे बस्तर के उस इलाके में अपने पुरखों के जमाने से रहते आई थीं जहां पर पिछले कुछ दशकों से नक्सलियों ने हिंसा फैला रखी है, और सुरक्षा बलों के साथ उनके टकराव के चलते रोजाना कुछ लोग मारे जाते हैं। कई बार इन मौतों की खबरें आ पाती हैं, कई बार नहीं भी आ पातीं। लेकिन बस्तर के इस आदिवासी इलाके में लोकतंत्र के खिलाफ नक्सलियों का जो हथियारबंद आंदोलन चल रहा है, वह बीच-बीच में बेकसूरों को इसी तरह मारता है। कई बार नक्सली दुनिया से अपनी हरकतों के लिए माफी भी मांगते हैं, और फिर इसी तरह मौत बिखेरने में लग जाते हैं। 
एक तरफ तो पुलिस और सुरक्षा बलों पर यह तोहमत लगते रहती है कि वे बेकसूरों पर ज्यादती करते हैं, उनको मारते हैं, उनके फर्जी आत्मसमर्पण करवाते हैं, और कुछ मामलों में यह तोहमत भी लगी है कि सरकारी वर्दीधारियों ने आदिवासी महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया है। जब किसी इलाके में दशकों तक दो तरफ की बंदूकों का ऐसा टकराव चलता है, तो वहां पर जिंदगी के लिए फिक्र घट जाती है, और लोगों को अपनी बंदूकों के मकसद सबसे ऊपर लगने लगते हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि सरकारी बंदूकधारी लोग फिर भी सरकार, अदालत, और संसद-विधानसभा, मीडिया-मानवाधिकार आयोग जैसी कई संस्थाओं के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और उनके जुर्म साबित होने पर उनको सजा भी मिल सकती है। दूसरी तरफ नक्सली अपने किसी जुर्म के लिए किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है, वे जुर्म का दावा करते हैं, और उनको सजा मिलना भी तकरीबन नामुमकिन होता है। एक तरफ हिंसा से लोकतंत्र को पलटने वाले नक्सली हिंसा और जुर्म का क्लेम करते हैं, और दूसरी तरफ पुलिस या सुरक्षा बलों पर ज्यादती और जुर्म का ब्लेम लगता है। 
अपनी हिंसा की दावे, और पुलिस पर हिंसा की तोहमत लगाने वाले नक्सली जब आम लोगों को इस तरह मारने लगते हैं, तो हमारे सरीखे लोगों को भी अपनी खुद की वह सलाह फिजूल लगने लगती है कि नक्सलियों से बात की जानी चाहिए, और सरकारी बंदूकों के मोर्चे के साथ-साथ बातचीत का मोर्चा भी खुला रखना चाहिए। डेढ़ दशक के बातचीत के न्यौते का अगर आज तक कोई नतीजा नहीं निकला है, और नक्सली इस अंदाज में बेकसूरों की जिंदगी खत्म कर रहे हैं, ग्रामीण इलाकों में जनता के बीच बम लगा रहे हैं, तो आम लोगों के हक कायम रखने के लिए यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह पूरी ताकत से नक्सलियों को खत्म करे। और यह बात हमको ठीक से मालूम है कि ऐसी पूरी ताकत बहुत सी ज्यादतियों के साथ ही इस्तेमाल हो पाती है, और उन ज्यादतियों के खिलाफ, उनके खतरे और आशंकाओं के खिलाफ आज हमारे पास कोई तर्क नहीं बचा है, जब एक छोटी सी बच्ची की बिखरी हुई अतडिय़ों की तस्वीर सामने है। जिस मां को अपनी बच्ची के टुकड़े बटोरने पड़े हों, उसका नक्सलियों पर तो कोई भरोसा हो नहीं सकता, दूसरी तरफ अगर सरकार अब भी अपनी ताकत के इस्तेमाल से इन नक्सलियों को नहीं रोकेगी तो ऐसी सरकार पर भी उसका भरोसा नहीं रहेगा। 
अब अगर ऐसी मौतों के बीच पुलिस नक्सलियों को मारने के लिए अधिक ताकत का इस्तेमाल करती है, तो उस ताकत को तौलकर रोकने और टोकने की कोई समझ हमारे में नहीं है। सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी आम लोगों को बचाने की है, और नक्सलियों को तब तक तेजी से और ताकत से खत्म करना चाहिए, जब तक वे हिंसा छोड़ बातचीत की अहमियत न समझें। लेकिन सरकार ऐसे अभियान में और अधिक बेकसूर आदिवासियों के साथ जुल्म और जुर्म से बचने की पूरी सावधानी बरते। 

यह भारतीय लोकतंत्र की आंखों में झोंकी जा रही आइवरी कोस्ट की रेत है

विशेष संपादकीय
17 मार्च 2016  
-सुनील कुमार
महाराष्ट्र की विधानसभा ने कल एक भयानक नजारा देखा। और दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना और विपक्षी कांग्रेस-एनसीपी एक संसदीय-बाहुबली-हिंसा करने में एक होते हैं। देश की एक बड़ी प्रमुख मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम के विधायक वारिस पठान को इस बात के लिए बचे पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया कि उन्होंने भारत माता की जय का नारा लगाने से इंकार कर दिया। वारिस पठान की पार्टी के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने दो दिन पहले भाजपा नेताओं के भड़कावे और उकसावे, देश के साथ गद्दारी की परिभाषा, और देश छोड़कर चले जाने के फतवे के बीच कहा था कि वे देशभक्त हैं लेकिन वे भारत माता की जय नहीं कहेंगे, चाहे कोई उनकी गर्दन पर छुरी ही क्यों न रख दे। 
दो दिन पहले हमने इसी संपादकीय कॉलम में इस मुद्दे पर लिखा था कि 1873 के आसपास एक हिन्दू देवी के प्रतीकों वाली भारत माता की कल्पना की गई थी और बंगाल के चित्रकारों ने भारत माता की पहली काल्पनिक तस्वीर बनाई थी, हिन्दू धर्म की महिमा वाले, और मुस्लिमों के खिलाफ बात करने वाले नाटकों में भारत माता को जोड़ा गया था, और उसके बाद से लगातार महज हिन्दू संगठन भारत माता की कल्पना और धारणा के प्रतीक का इस्तेमाल करते आ रहे थे। अब अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए भारत माता के हाथ के झंडे का डंडा लेकर अगर सड़कों पर लोग टूट पड़ रहे हैं, तो वह सड़क की जुबान हो सकती है। लेकिन एक विधानसभा में पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर भी किसी विधायक को यह कहने पर कैसे बेबस कर सकते हैं कि वह भारत माता की जय कहे, वरना उसे जूते मारे जाएंगे, उसे विधायक के पूरे कार्यकाल के लिए विधानसभा से निकाल दिया जाएगा, और आखिर में उसे पूरे सत्र के लिए निलंबित कर भी दिया गया। 
कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लिए यह बात चुनावी राजनीति के हिसाब से नुकसान की होती अगर वे भाजपा-शिवसेना के इस बाहुबल के खिलाफ खड़ी होतीं, और वारिस पठान के मौलिक अधिकारों की वकालत करतीं। एक बार कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी की अगुवाई में लोकसभा में अपने दानवाकार बहुमत के बाहुबल का इस्तेमाल करके मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए एक अकेली शाहबानो का गला घोंटा था, और कल महाराष्ट्र विधानसभा में हिन्दू कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए कांग्रेस-राकांपा पार्टी ने एक मुस्लिम के गले से हिन्दू-सांस्कृतिक नारा निकलवाने की कोशिश करते हुए उसका गला दबाया है। ये बातें देश के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो रही हैं कि जब देश में हिंसक फतवे दिए जा रहे हैं, जब सड़कों पर लोगों को देशद्रोही साबित करके उनके सिर और उनकी जुबान काटने पर ईनाम रखे जा रहे हैं, तो नेहरू-गांधी की पार्टी क्या कर रही है।
जिस लोकतंत्र के तहत, और लोकतंत्र को बचाने के लिए, या उसके नाम पर जो संसदीय व्यवस्था भारत में है, संविधान की उस पूरी सोच को कुचलते हुए महाराष्ट्र विधानसभा ने यह जो निलंबन किया है, वह हमारी समझ से बहुमत का होने के बावजूद पूरी तरह से असंवैधानिक है, और देश की बड़ी अदालत में जाकर यह टिक नहीं पाएगा। निलंबित विधायक और उसकी पार्टी को ही नहीं, देश के इंसाफपसंद लोगों को ऐसी ज्यादती के खिलाफ अदालत और बाहर मामला उठाना चाहिए। आज एक मुस्लिम विधायक को इस मुद्दे पर निलंबित किया गया है, कल कश्मीर की मुस्लिम बहुतायत वाली विधानसभा में क्या किसी हिन्दू विधायक को इस्लाम के प्रतीकों पर आधारित किसी ऐसे सामाजिक नारे को लगाने के लिए बेबस किया जाएगा जो कि उसकी सोच, उसकी पसंद, या उसकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ होगा? और फिर क्या नागालैंड की विधानसभा में ईसाई धर्म-प्रतीकों पर आधारित नारों का बोलबाला होगा? तो फिर हिन्दुस्तान लोकतंत्र कहां रह जाएगा? कहां पर सर्वधर्म समभाव की बात रह जाएगी? कैसे यह देश धर्मनिरपेक्ष कहला सकेगा? 
जब अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को देशभक्ति और देशद्रोही होने के तराजू की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो वहां लोकतंत्र खत्म समझा जाना चाहिए।  हो सकता है कि एक तरफ भाजपा और हिन्दू पार्टियां, दूसरी तरफ ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता की मुस्लिम पार्टी अगर वोटों का ध्रुवीकरण करती हैं, तो पूरे देश में इन दोनों का निजी फायदा हो सकता है, और इन दोनों से परे की पार्टियां नुकसान झेल सकती हैं। बहुत से लोगों को यह शक है कि यह भाजपा और ओवैसी की मिलीजुली नूराकुश्ती है। हम अभी उस पर नहीं जाते क्योंकि देश के मुकाबले एक चुनाव और एक सरकार बहुत छोटी बात है। 
लेकिन हम एक सवाल महाराष्ट्र विधानसभा से, और बाकी देश से भी जरूर पूछना चाहते हैं। अभी चार दिन पहले अफ्रीका के एक देश आइवरी कोस्ट में अलकायदा के इस्लामी-आतंकियों ने समुद्र तट पर डेढ़ दर्जन सैलानियों को मार डाला। उन्होंने चुन-चुनकर गैरमुस्लिमों को मारा। पांच बरस उम्र के दो बच्चे भी वहां थे, उन्होंने इन बच्चों से कोई इस्लामी प्रार्थना सुनाने को कहा। जो मुस्लिम बच्चा सुना पाया उसे उन्होंने छोड़ दिया, और जो ईसाई बच्चा वह प्रार्थना नहीं सुना पाया, उसे वहीं गोली मार दी। आइवरी कोस्ट के समुद्र तट की रेत जो लोग माथे पर तिलक की तरह लगाकर भारत में सिर ताने घूम रहे हैं, वे अपने धर्म, अपनी संस्कृति के साथ चाहे जो कर रहे हों, वे लोकतंत्र की आंंखों में बच्चे के लहू से सनी वह रेत झोंक रहे हैं। 

झीरम सीबीआई को देने के पीछे की कुछ बातें..

छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा से झुलस रहे बस्तर में झीरम घाटी में कांग्रेस के काफिले पर हुए हमले की अब सीबीआई की घोषणा राज्य सरकार ने की है। कांग्रेस का एक तबका लगातार इस बात की मांग कर रहा था, और कांग्रेस के कई नेताओं का यह गहरा शक था कि इस हमले में कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने नक्सलियों के साथ मिलकर साजिश रची थी और प्रदेश कांग्रेस की लीडरशीप को एकमुश्त खत्म करने का काम किया था। अब यह कांग्रेस का अपना घरेलू और अंदरुनी शक है, और इसमें हकीकत क्या है, इसे या तो नक्सली जानते हैं, या अगर कोई कांग्रेसी इस साजिश के पीछे था, तो वह जानता है, या फिर फिरोज सिद्दीकी नाम का वह स्टिंगबाज जानता है जिसने कि इस राज को खोलने का दावा किया है, और मीडिया बेसब्री से कांग्रेस के इस सीरियल की अगली कड़ी की राह देख रहा है। 
लेकिन इन सबसे परे अब झीरम घाटी की सीबीआई जांच से आखिर क्या होगा? प्रदेश की भाजपा सरकार ने इस घोषणा के बाद अपने हाथ जांच से झाड़ लिए हैं, और केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली सीबीआई इस जांच को ले, या न ले, राज्य सरकार ने तो कांग्रेस की फरमाईश पर यह सिफारिश करके अपना जिम्मा पूरा कर लिया है। अब किसी भी ऐसे हमले की जांच की बात करें, तो झीरम की जांच देश की एक सबसे बड़ी राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए कर ही रही है, और उसने अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया है। एनआईए को बनाया ही इसलिए गया था कि ऐसे आतंकी मामलों, या देश के भीतर के लोगों, देश के बाहर के लोगों द्वारा इस जमीन पर किए गए आतंकी हमलों की जांच ठीक से हो सके। अब एक राष्ट्रीय एजेंसी की जांच चल ही रही है, एक न्यायिक जांच आयोग की सुनवाई चल ही रही है, और अब इस मामले को उस सीबीआई को दिया जा रहा है, जिसे जब जो पार्टी विपक्ष में रहती है, वह उसे प्रधानमंत्री का थाना कहती है, या प्रधानमंत्री का तोता कहती है। 
हम सरकार के इस फैसले को एक चतुराई का काम मानते हैं कि उसने कांग्रेस की मांग मान ली, और जांच का अपना जिम्मा खत्म कर लिया। यह भी हो सकता है कि प्रदेश की भाजपा सरकार के हाथ फिरोज सिद्दीकी की मेहरबानी से कुछ ऐसा लगा हो जिससे सीबीआई जांच में कांग्रेस की घरेलू आग साबित हो सके, और एनआईए के मुकाबले सीबीआई इस काम को बेहतर तरीके से कर सके। फिलहाल तीन अलग-अलग जांच, और तीन अलग-अलग राजनीतिक खेमों के बीच फंसी हकीकत पता नहीं कभी सामने आ भी पाएगी या नहीं। 

हमको भी समाजवादी-सुगंध मिल जाए, तो बात बन जाए

संपादकीय
16 मार्च 2016  

उत्तरप्रदेश के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनको पारिवारिक विरासत में मिली मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आने के बाद से अपने परिवार का और भी गैरसमाजवादी राजनीतिक विस्तार कर रहे हैं, और लखनऊ से लेकर दिल्ली तक पूरी पार्टी उनके घरबार की तरह ही चल रही है। लेकिन समाजवादी पार्टी होने का नाम सार्थक करने के लिए वे और उनके पिता कई तरह की हरकतें करते हैं। कभी वे अपने गांव के गरीबों को दिखाने के लिए करोड़ों के खर्च वाले फिल्म स्टार कार्यक्रम को करवाते हैं, तो कभी अपने गांव में अंतरराष्ट्रीय स्तर का हवाई अड्डा बनवाकर, राष्ट्रीय स्तर की सड़क बनवा लेते हैं, फिर चाहे सीएजी ऑडिट आपत्ति करता रहे। 
अब अखिलेश की ताजा करामात है समाजवादी इत्र जारी करना। उन्होंने अपनी सरकार के चार बरस पूरे होने पर समाजवादी-सुगंध नाम से परफ्यूम जारी किया और कहा- कई मौकों पर मैंने कहा है कि यूपी की नदिया समाजवादी हैं, हमारी नदिया किसी तरह का भेदभाव नहीं करती, किसी तरह समाजवादी-सुगंध सपा सरकार की एक कोशिश है। उन्होंने कहा कि ये इत्र पार्टी के लोगों और जनता को एक साथ जोड़ेगा और समाजवाद का मैसेज बड़े पैमाने पर फैलाएगा। ये चार अलग-अलग खुशबुओं वाले इत्र उत्तरप्रदेश के चार शहरों, काशी, कन्नौज, आगरा, और लखनऊ के नाम पर रखे गए हैं। अखिलेश का कहना है कि ये समानता, उन्नति, और कार्यकुशलता का संदेश देंगे, और समाजवाद को फैलाएंगे। 
अभी तक जो डरावनी विज्ञान कथाएं आती थीं, उनमें कई बार इस तरह के मामले लिखे जाते थे कि किसी खुशबू से, या किसी और तकनीक से लोगों का ब्रेनवॉश किया जाए। लेकिन ब्रेनवॉश करने का यह समाजवादी तरीका बहुत ही अनोखा और मौलिक है। आज तक किसी ने राजनीतिक दल की सोच की खुशबू वाले इत्र की कल्पना भी नहीं की होगी। और वैसे अखिलेश का यह काम बहुत गलत भी नहीं है, क्योंकि उनके परिवार, उनके पिता, उनके नेता लोगों की बातों से इतनी बदबू फैलती है, उनकी पार्टी और सरकार के कारनामों से इतनी बदबू फैलती है कि उसे आम फिनाइल से खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए ऐसा इत्र बहुत जरूरी है, तभी समाजवाद की खुशबू कायम रह सकेगी। अब यह खोज और शोध की बात है कि भारत में समाजवादी सोच के सबसे बड़े नेता रहे डॉ. राममनोहर लोहिया इन खुशबुओं का इस्तेमाल करते थे या नहीं? अखिलेश सरकार द्वारा बाजार में इनको उतारने के पहले भी लोहिया जरूर इनका इस्तेमाल करते रहे होंगे, तभी उनकी सोच समाजवादी हो पाई थी, और विकसित हो पाई थी। 
अब हो सकता है कि भारत में बाकी राजनीतिक दल भी अपनी-अपनी पसंद की खुशबुओं को बाजार में उतारें, और उनके इलाकों में होने वाले चुनावों के पहले लोगों को रिझाने की कोशिश करें। लेकिन बंगाल जैसे राज्य में एक दिक्कत हो सकती है कि सभी पार्टियां मछलियों की गंध के इत्र उतारना चाहें, या फिर यह भी हो सकता है कि वामपंथी पार्टियां गरीब मजदूरों के पसीने की गंध वाले इत्र लाएं। बंगाल में कांग्रेस हो सकता है कि आपातकाल में मारे गए लोगों के लहू की गंध का इत्र लाकर मतदाताओं को चेतावनी देना चाहे कि वोट न दिया तो...। पंजाब में हो सकता है कि अकाली दल तरह-तरह के नशों की गंध के इत्र लाए, हैदराबाद में ओवैसी बिरयानी के गंध का इत्र ला सकते हैं, और गोवा की पार्टियां नारियल या काजू से बनी देसी दारू की गंध अपने-अपने नाम करने के लिए चुनाव आयोग जा सकती हैं। 
दुनिया के बाकी देश भी अखिलेश यादव की सोच सीखने के लिए लखनऊ पहुंच सकते हैं। खासकर अमरीका में अभी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने की कोशिश में लगे डेविड ट्रंप अफगानिस्तान और इराक, सीरिया और फिलीस्तीन से मुस्लिमों का लहू लाकर उसके गंध का इत्र अपने धर्मान्ध समर्थकों के बीच बांट सकते हैं। और पाकिस्तान यह सोच सकता है कि शाहिद अफरीदी को, और भारत यह सोच सकता है कि कन्हैया को किस गंध का इत्र देकर फिर राष्ट्रभक्त बनाया जाए। 
फिलहाल हम उम्मीद करते हैं कि कोई लखनऊ से समाजवादी-सुगंध नाम के इत्र का बक्सा लाकर हमें भी भेंट करे, ताकि समाजवाद की कुछ सोच हममें भी विकसित हो सके। 

कैलाश विजयवर्गीय की बात देश को तोडऩे वाली

15 मार्च 2016
संपादकीय

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय आम तौर पर उसी वक्त मुंह खोलते हैं, जब कुछ खाना हो, या जब कोई विवाद छेडऩा हो। अब उन्होंने ताजा ट्वीट में कहा है कि मुस्लिम नेता ओवैसी भारत की धरती पर बोझ हैं, भारत माता की जय बोले बिना इस धरती पर रहने का अधिकार किसी को नहीं है। इसके जवाब में देश की इस सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि चाहे उनके गले पर चाकू रख दिया जाए, वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, क्योंकि संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि हर किसी को भारत माता की जय बोलना जरूरी है। 
अब अगर कोई विचारधारा, कोई पार्टी, या कोई संगठन अपनी शब्दावली और अपने प्रतीकों को ही देशभक्ति का सुबूत माने, और उनको न मानने वाले लोगों को देश का गद्दार माने, तो यह बहुत ही हिंसक और घटिया सोच है। भारत माता की तस्वीर और नाम को लेकर भारतीय जनता पार्टी और उसके बहुत से सहयोगी संगठन लगातार यह बात छेड़ते हैं कि भारत में रहने के लिए यह एक जरूरी शर्त है। जबकि हकीकत यह है कि भारत माता की पहली सोच कुल डेढ़ सौ बरस पुरानी है, और 1873 के आसपास पहली बार बंगाल में अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने चार हाथों वाली एक हिंदू देवी जैसी भारत माता का चित्रण किया था, और उसी दौर में कुछ नाटकों में भारत माता का किरदार रखा गया था। भारत माता का इससे अधिक पुराना और कोई इतिहास नहीं है, और यह इतिहास पूरी तरह से हिंदू धर्म के प्रतीकों, हिंदू देवी की तस्वीरों के साथ जुड़कर ही आगे बढ़ा, और हिंदू संगठनों ने भारत माता के प्रतीक को उठाया।
अब सवाल यह उठता है कि अपनी जन्मभूमि को लेकर दुनिया के कोई देश उसे फादरलैंड कहते हैं, किसी और देश या संस्कृति में देश की जमीन के लिए कुछ और प्रतीक इस्तेमाल होते हैं। भारत में रहने वाले लोगों के लिए यह शर्त कैसे बनाई जा सकती है कि वे एक हिंदू देवी की तरह बनाई गई, और उसी तरह पूजी गई भारत माता की जय बोलें, तो ही देश में रहें। भारत माता शब्द या उसकी तस्वीर की भारतीय संविधान में कोई जगह नहीं है, यह हिंदुओं के बीच भी एक तबके के बीच लोकप्रिय एक प्रतीक है, और उन्हें वह प्रतीक मानने की पूरी आजादी है। दूसरी तरफ देश के प्रति वफादारी दिखाने के लिए किसी को किसी दिखावे की जरूरत नहीं है, और लोग अपने-अपने रस्म-रिवाज के मुताबिक जीने के लिए पूरी तरह आजाद हैं।
एक तरफ आज देश में कुछ लोग उदारता की बातें कर रहे हैं, खुद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने आरक्षण सहित कुछ और मुद्दों पर पिछले चार-छह दिनों में एक नई उदारता की बात की है। ऐसे में भाजपा के कुछ बड़बोले नेता अगर साम्प्रदायिकता की बात करते हैं, और अपने से अलग रीति-रिवाज वालों को गद्दार कहते हैं, तो यह देश को तोडऩे की बात है।

धार्मिक कट्टरता और हिंसा को बढ़ाना आसान, काबू करना...

संपादकीय
14 मार्च 2016

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कल एक बयान देते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और दुनिया के कुख्यात इस्लामी-आतंकी संगठन आईएस की तुलना कर दी। अब शब्द थोड़े-बहुत आगे-पीछे होंगे, लेकिन एक ही सिलसिले में दोनों का जिक्र किया गया, तो आज उसे लेकर संसद में हंगामा भी हुआ, और कांग्रेस से माफी मांगने की बात भाजपा ने की। यह पहला मौका नहीं है जब संघ का जिक्र ऐसी तुलना के साथ भारतीय राजनीति में किया गया है, लेकिन जब-जब ऐसी तुलना हुई है, लोगों को लगा कि यह आलोचना या ऐसी मिसाल नाजायज हैं। 
दरअसल होता यह है कि जब कभी किसी बात को साबित करने के लिए कोई मिसाल दी जाती है, तो उसमें मिलती-जुलती बातों का जितना हिस्सा होता है, उससे कहीं अधिक बड़ा हिस्सा फर्क का निकल आता है। और मिसाल से नुकसान कहीं अधिक हो जाता है, और जिस तरह ऑस्ट्रेलिया में फेंककर चलाने वाला एक हथियार बूमरैंग होता है जो कि फेंकने वाले तक लौट आता है, उसी तरह ये मिसालें इन्हें कहने वाले लोगों को ही लौटकर वार करती हैं। 
जो समझदार लोग रहते हैं वे बहस और तर्क में मिसालों से बचते हैं क्योंकि जिंदगी में दो अलग-अलग चीजों में एक सा होने की गुंजाइश कम रहती है और उनके फर्क सामने आने पर तर्क कमजोर हो जाता है। वैसे भी आज दुनिया में आईएस जिस तरह की हिंसा में लगा हुआ है, आरएसएस की उससे तुलना ठीक नहीं है। आज ही खबर है कि अफ्रीकी देश आइवरी कोस्ट में आईएस के आतंकियों ने एक ईसाई बच्चे को गोली मार दी क्योंकि वह इस्लामी प्रार्थना नहीं जानता था, और इस्लामी प्रार्थना करने वाले उतने ही बड़े दूसरे बच्चे को छोड़ दिया। धर्म का रूप ऐसा ही हिंसक रहता है। अपने धर्म को सबसे ऊपर मानने की जिद रखने वाले लोग किसी भी हद तक जाते हैं। और आज तो ऐतिहासिक क्रूरता को लेकर आईएस खबरों में हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में लंबे समय तक ऐसे साम्प्रदायिक दंगे चलते थे जिनमें लोग अड़ोस-पड़ोस के पुराने साथियों को भी धर्म का फर्क होने पर, उसी वजह से मार डालते थे। बात के बरसों में हिन्दुस्तान में आर्थिक विकास हुआ, और साम्प्रदायिक दंगे घटे। लोगों का ध्यान धर्म की तरफ से कुछ कम हुआ। पचास बरस पहले के दंगे अगर इस देश में बढ़ते रहते, तो यहां भी आईएस किस्म के कई संगठन खड़े हो जाते। लोगों को याद होगा कि पंजाब के आतंक के दिनों में खालिस्तानी आतंकी बसों और रेलगाडिय़ों से लोगों को उतारकर धर्म के आधार पर अलग-अलग खड़ा करते थे, और गैरसिखों को मार डालते थे। 
आज आईएस का जो खतरा दुनिया के सामने है, उससे अमरीका के राष्ट्रपति प्रत्याशी बनने की कोशिश कर रहे डेविड ट्रंप से लेकर हिन्दुस्तान के लोगों तक सबक लेने की जरूरत है कि धार्मिक कट्टरता को बढ़ाया तो जा सकता है, लेकिन बाद में उसे काबू नहीं किया जा सकता। 

क्रिकेट से शुरू बात आगे भी दूर तक जानी चाहिए

13 मार्च 2016
संपादकीय

भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट कभी भी राजनीति, सरहदी तनाव, साम्प्रदायिकता, और आतंक की घटनाओं के असर से परे नहीं रह पाता। ऐसे माहौल में भी अब जब पाकिस्तान की पुरुष और महिला टीमें भारत पहुंच रही हैं, तो यह एक अच्छी बात है, और इस मौके पर पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान शाहिद अफरीदी की कोलकाता पहुंचकर कही गई इस बात को तारीफ के साथ सुनना चाहिए कि उनकी टीम को हमेशा ही हिंदुस्तान में क्रिकेट खेलने में मजा आया है, यहां के लोगों से उन्हें बहुत प्यार मिला है, और इतना प्यार तो उन्हें पाकिस्तान में भी नहीं मिलता। 
यहां यह याद रखने की जरूरत है कि भारत में क्रिकेट संगठनों की राजनीति में कांगे्रस, भाजपा, राष्ट्रवादी कांगे्रस पार्टी जैसी कई पार्टियों के बड़े-बड़े नेता बड़े-बड़े ओहदों पर कायम हैं, और क्रिकेट की राजनीति में वे एक-दूसरे के साथ हैं। यह अलग बात है कि भाजपा जब देश के विपक्ष में रहती है, तो एक पार्टी के रूप में वह तब तक पाकिस्तान के साथ खेलने के खिलाफ रहती है, जब तक सरहद पर किसी तरह का तनाव हो, या टकराव हो, या भारत में कहीं आतंकी वारदातों में पाकिस्तान पर शक हो। लेकिन आज जो चेहरा पाकिस्तान के भारत आने की वकालत करते हुए सबसे अधिक सक्रिय दिखता है, वह भाजपा के नौजवान सांसद और भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर का है। हिमाचल प्रदेश से आए अनुराग ठाकुर क्रिकेट की राजनीति मेें ऊपर हैं और अभी जब हिमाचल के कांगे्रसी मुख्यमंत्री ने राज्य के भूतपूर्व सैनिकों की भावनाओं का हवाला देते हुए वहां भारत-पाक मैच करवाने से मना कर दिया था, तो अनुराग ठाकुर ने जमकर मोर्चा संभाला था, और अभी भी वे भारत-पाक मैच होने के लिए हर मोर्चे पर जुटे हुए हैं।
दरअसल खेल, संगीत, फिल्म, टीवी, साहित्य, संस्कृति के ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें एक वक्त एक देश रहे हुए, और आज एक-दूसरे के दुश्मन समझे जाने वाले भारत और पाकिस्तान के बीच लोगों में कोई विवाद नहीं है। सारा झगड़ा सरकारों के बीच है, फौजियों की दिलचस्पी का है, और राजनीतिक दलों से लेकर आतंकियों तक की भागीदारी का है। दोनों देशों की आम जनता एक-दूसरे से टकराव नहीं चाहतीं, क्योंकि दोनों देशों में भयानक गरीबी और कुपोषण है, पढ़ाई और इलाज का इंतजाम कमजोर है, और इन दोनों देशों के बीच लडऩे की कोई वजह नहीं है। दुनिया में हथियारों के सौदागर जगह-जगह सरहद के झगड़े खड़े करवाते हैं, आतंक के हमले करवाते हैं, और मीडिया के एक हिस्से से लेकर धर्मांध कट्टरपंथियों, नेताओं, को रिश्वत देते हैं ताकि तनाव भड़कता रहे, और हथियार बिकते रहें।
आज हम भाजपा को यह बिल्कुल याद दिलाना नहीं चाहेंगे कि वह भारत-पाकिस्तान मैच का हमेशा ही विरोध करते आई है। सत्ता में आने के बाद अगर किसी पार्टी का रूख सकारात्मक होता है, तो बीते कल के उसके नकारात्मक रूख की याद दिला-दिलाकर उस पर ताने कसना ठीक नहीं है। हर पार्टी और नेता को अपने अतीत से उबरकर बेहतर बनने का हक है, और लोकतंत्र में उन पर ऐसी जिम्मेदारी भी रहती है। हमारी यह भी सलाह है कि इन दोनों देशों में एक-दूसरे के टीवी चैनल, एक-दूसरे की फिल्में, एक-दूसरे के संगीत कार्यक्रमों को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि दिलों के बीच के फासले या तो राजधानियों में हैं, या फौजी साए वाली सरहदों में है। दोनों देशों की आम जनता को मिलकर मजा लेने का मौका देना चाहिए, उसी से दोनों तरफ फौजी खर्च घट सकता है, और दोनों देशों के बच्चों को एक बेहतर भविष्य मिल सकता है।

देश के माहौल पर मोदी को सोचने की जरूरत है

संपादकीय
12 मार्च 2016  

अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से वैसे तो हमारा कोई खास लेना-देना नहीं है, लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे कि भारत की राजनीति को और भारत के लोगों को कुछ सीखने की जरूरत है। वहां दकियानूसी मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के अब तक के सबसे कट्टर उम्मीदवारों में से एक, डोनाल्ड ट्रंप नीचता और कमीनगी के नए रिकॉर्ड कायम करते चल रहे हैं। उनकी कही हुई बहुत सी बातों की कोई मिसाल हिन्दुस्तान में सबसे गंदगी की बात करने वाले नेताओं में भी नहीं मिलेगी। कुछ अरसा पहले उन्होंने बिल क्लिंटन के मोनिका लेविंस्की के साथ संबंधों का इशारा करते हुए अपने मुकाबले सामने आ रहीं डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के बारे में यह कहा कि जो औरत अपने पति को संतुष्ट नहीं कर सकी, वह देश क्या चला सकेगी। एक दूसरे भाषण में उन्होंने अपने शरीर के अंगों को लेकर एक अहंकार की गंदगी बिखेरी। लेकिन इससे परे उनकी सबसे भयानक बातें अमरीका में मुस्लिमों के खिलाफ हैं, और तमाम गैरगोरों के खिलाफ हैं। दुनिया के मुस्लिम देशों के खिलाफ हमले की अनगिनत बातें कहने के बाद डोनाल्ड ट्रंप देश के भीतर भी मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने पर आमादा हैं, और उनकी खुद की रिपब्लिकन पार्टी में कई समझदार लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना ठीक रहेगा या नहीं? दूसरी तरफ कल अमरीका के एक बड़े शहर शिकागो में, जहां से कि मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा आते हैं, वहां पर डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में लोगों ने ऐसा जबर्दस्त प्रदर्शन किया कि उनका वहां का कार्यक्रम ही रद्द कर देना पड़ा। 
इन्हीं बातों को लेकर हिन्दुस्तान के कुछ लोगों को यह समझने की जरूरत है कि साम्प्रदायिकता के आधार पर, जातिवाद के आधार पर, खान-पान और सोच के आधार पर लोगों को किस हद तक बांटा जाए, किस हद तक उनका ध्रुवीकरण किया जाए, किस हद तक समाज में निहायत गैरजरूरी फर्जी मुद्दों को लेकर तनाव खड़ा किया जाए? और आज सबसे अधिक अगर किसी का कुछ दांव पर लगा हुआ है, तो वह अकेले नरेन्द्र मोदी का लगा हुआ है। अगले चुनाव अगर वे एनडीए और भाजपा को बहुमत नहीं दिला पाते हैं, तो नाकामयाबी का घड़ा फोडऩे के लिए उनकी पार्टी के लोग भी अकेले उन्हीं का सिर ठीक पाएंगे। लेकिन हम चुनावी हार-जीत से परे एक दूसरी बात करना चाहते हैं। क्या नरेन्द्र मोदी ने देश में ऐसे धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ाने के लिए जीत हासिल की थी? प्रधानमंत्री बने थे? उनके जितने आर्थिक विकास के नारे हैं, वे सारे के सारे बुरी तरह, और पूरी तरह, हाशिए पर जा चुके हैं, और उनकी पार्टी के लोग, उनके प्रशंसक, उनका झंडा लेकर चलने वाले पत्रकार और विचारक भी अब हैरान हैं कि क्या ऐसी नौबत के लिए जनता ने पिछले चुनाव में उन्हें अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत दिया था? आज ही हम इसी पेज पर एक भाजपा-प्रशंसक समझे जाने वाले लेखक का लेख छाप रहे हैं जो कि कुछ इसी तरह के सवाल उठा रहा है, और ये लेखक अकेले नहीं हैं, भाजपा के भीतर अनगिनत ऐसे लोग हैं जो देश में फैलाए जा रहे गैरजरूरी तनाव और टकराव के बीच खोते जा रहे असल मुद्दों को लेकर बहुत ही निराश हैं। 
नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि देश को एक रखकर, इसे आर्थिक विकास की तरफ लेकर जाएं, और जैसा कि पिछले कुछ दिनों से वे खुद भी कह रहे हैं, और बाकी तमाम लोग भी मांग कर रहे हैं कि उन्हें भाजपा का प्रधानमंत्री रहने के बजाय पूरे देश का प्रधानमंत्री रहना चाहिए। वैसे भाजपा भी पूरी की पूरी पार्टी के रूप में आज फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता से सहमत नहीं हैं, और उसके सहयोगी संगठन, उसके अपने नेता और मंत्री जिस तरह की हिंसा की बातें कर रहे हैं, उनसे भाजपा के बड़े-बड़े नेता भी बहुत फिक्रमंद हैं, और भाजपा के आम कार्यकर्ता भी। 

रविशंकर का भूमाफिया जैसा काम और केन्द्र सरकार का शर्मनाक रूख सदमा दे रहा...

संपादकीय
11 मार्च 2016  

दिल्ली में यमुना के किनारे दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक समारोह करने का दावा करने वाले स्वघोषित श्रीश्री रविशंकर ने भारत की सबसे बड़ी पर्यावरण-अदालत के साथ एक टकराव लिया है, और कहा है कि उन पर लगाया गया पांच करोड़ का जुर्माना वे नहीं पटाएंगे, और उसकी बजाय वे जेल चले जाएंगे। इस कार्यक्रम में पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जाने वाले थे, उन्होंने जाना रद्द किया, लेकिन अब तक की खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसमें जा रहे हैं। यमुना के किनारे पर्यावरण के हिसाब से बहुत ही संवेदनशील इलाके को पाटकर, कुचलकर, वहां तरह-तरह की दवाईयां छिड़ककर रविशंकर अपनी मर्जी से एक जमींदारी की तरह यह कार्यक्रम कर रहे हैं, और शर्मनाक बात यह भी है कि दिल्ली सरकार की सिफारिश पर केन्द्र सरकार ने भारतीय फौज को लगाकर इस कार्यक्रम के लिए यमुना पर पुल खड़े करवाए हैं। जिस सेना की शहादत का इस्तेमाल इन दिनों जेएनयू के छात्रों को देशद्रोही साबित करने के लिए हो रहा है, उस सेना के सैनिक आज भवन निर्माण मजदूरों की तरह सामान ढोते हुए इस बाबा रविशंकर के समारोह का काम कर रहे हैं, जिसका काम एक श्री से नहीं चल पाता, और दो श्री लगाने के बाद ही जिसके अहंकार का पेट भर पाता है। 
जिन लोगों को रविशंकर की पहचान आर्ट ऑफ लिविंग नाम की उनकी योग-ध्यान शैली से है, उनकी जानकारी में यहां पर थोड़ा सा इजाफा कर देना ठीक रहेगा। ये वही रविशंकर हैं जो कि यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी करते रहे, लेकिन उसी दौर में उनके अपने आश्रम वाले कर्नाटक में येदियुरप्पा की भाजपा सरकार के भयानक भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी उनका मुंह नहीं खुला। ऐसे रविशंकर के नाम की दुकानदारी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चलाने वाले लोग किस तरह से बड़े-बड़े जमीनों के जुर्म में शामिल रहे, यह भी सबका देखा हुआ है। जब भूमाफिया रविशंकर की दुकान चलाएं, तो फिर खुद रविशंकर के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है कि कानून तोड़ते हुए वे यमुना के किनारे अपना अहंकारी रिकॉर्ड कायम करें, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सुनाए हुए जुर्माने को पटाने से मना कर दें। इस देश में धर्म और आध्यात्म के नाम पर, योग और इसी किस्म की दूसरी कुछ चीजों के नाम पर हर किस्म की हिंसा, हर किस्म का जुर्म आम बात है, और इन दिनों ऐसा लगता है कि ऐसे ही चोलाधारी माफिया के अच्छे दिन आ गए हैं। 
अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्या सोचकर इस कार्यक्रम में जा रहे हैं? जिसे देश की सबसे बड़ी पर्यावरण अदालत से जुर्माना सुनाया गया है, वह अगर जुर्माना पटा भी देता है, तो भी यह आयोजन कानून को तोड़कर किया जा रहा है, और गैरकानूनी आयोजन में प्रधानमंत्री का जाना देश के सामने एक बहुत बुरी मिसाल रखेगा। इसके बाद तो हर किस्म के मुजरिमों के लिए यह रास्ता खुल जाएगा कि वे जुर्माने लायक जुर्म करते जाएं, और जुर्म में प्रधानमंत्री को भागीदार बनाते जाएं। जिस मामले की तीखी आलोचना के साथ उस पर इतना कड़ा जुर्माना लगाया गया है, उसमें प्रधानमंत्री का जाना उनके ओहदे के लिए शर्मनाक होगा, इस देश की सरकार के लिए शर्मनाक होगा। एक व्यक्ति के रूप में वे किसी मुजरिम के साथ भी जा सकते हैं, लेकिन उनको प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी को समझना चाहिए, और ऐसे किसी कार्यक्रम से अपने को दूर रखना चाहिए। केन्द्र सरकार की तरफ से प्रतिरक्षा मंत्री ने यह कुतर्क सामने रखा है कि सेना पहले भी कुछ कार्यक्रमों के लिए पुल बना चुकी है, इस सिलसिले में इलाहाबाद में होने वाले कुंभ को गिनाया गया है। कुंभ एक राष्ट्रीय आयोजन होता है, जिसका इंतजाम राज्य सरकार करती है, और केन्द्र सरकार उसमें भागीदार रहती है। एक रविशंकर की जिद पर पर्यावरण की हत्या करते हुए हो रहे ऐसे कार्यक्रम की कुंभ से क्या तुलना हो सकती है? और देश के लिए शहादत के लिए तैयार सैनिकों को एक ढोंगी बाबा की सेवा में पांव दबाने के लिए लगाकर मनोहर पर्रीकर ने देश की सेना का अपमान किया है। हमें उम्मीद है कि भारत की अदालतें इस पर सरकार के खिलाफ कुछ कहेंगी। फिलहाल देश में यह सबसे बड़ी इतनी बुरी मिसाल पेश हो रही है, और आर्ट ऑफ लिविंग का लेबल बेचने वाले रविशंकर एक भूमाफिया के अंदाज में यमुना को कुचल रहे हैं। उनके नाम का इस्तेमाल करके छत्तीसगढ़ में भी जमीनों के ऐसे ही जुर्म किए गए, इसलिए दिल्ली का उनका यह काम हमको हैरान नहीं कर रहा है, लेकिन इस पर केन्द्र सरकार का शर्मनाक रूख हमें सदमा जरूर दे रहा है। 

पानी पीने के लिए कुएं में जान देने को बेबस मप्र का दलित बच्चा

संपादकीय
10 मार्च 2016  

मध्यप्रदेश में दलितों के साथ ज्यादती आए दिन की बात है। न वहां दलित दूल्हों को घोड़े पर चढऩे मिलता, न दलितों को गांव के अकेले कुओं पर पानी भरने मिलता, और कल वहां एक सरकारी स्कूल में दोपहर के भोजन के बाद एक बच्चा कुएं में गिरकर मर गया क्योंकि स्कूल में दलित बच्चों को हैंडपंप से पानी लेने की इजाजत नहीं है, और वे खतरा झेलते हुए कुएं का पानी निकालते हैं। मध्यप्रदेश की सोच में सामंती जातिवाद की हिंसा बड़ी आम बात है, और लगातार दलित-प्रताडऩा के मामले वहां से सामने आते हैं, और हमारा यह भी मानना है कि सामने आने वाले हर मामले के पीछे सामने न आने वाले सैकड़ों मामले रहते होंगे। देश में आजादी के बाद पौन सदी पूरी होने को है, और जात-पात को लेकर कुछ लोगों को अछूत मानना अब तक जारी है। उत्तर भारत में ही नहीं, दक्षिण भारत में भी जगह-जगह सरकारों को दखल देनी पड़ती है कि किसी दलित महिला के पकाए हुए स्कूली-खाने को सभी लोग खाएं। गांव के सवर्ण अपने बच्चों को ऐसा खाना खाने नहीं देते हैं। जात-पात को लेकर उत्तर भारत में आए दिन हत्याएं होती हैं कि कैसे किसी ने दूसरी जात वाले से शादी कर ली। 
हमारा मानना है कि इंसान की सोच में इंसाफ और वैज्ञानिक समझ टुकड़े-टुकड़े में नहीं आ पाती। जिस तरह कोई दस फीसदी कुंवारा नहीं हो सकता, पन्द्रह फीसदी ईमानदार नहीं हो सकता, उसी तरह कोई भी दस-बीस फीसदी तर्कसंगत या न्यायसंगत नहीं हो सकते। लोग या तो पूरी तरह से इंसाफपसंद हो सकते हैं, या पूरी तरह से बेइंसाफी वाले लोग बने रह सकते हैं। आज देश में जिस अंदाज में साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, खान-पान को लेकर एक जिद, संस्कृति और धर्म को लेकर एक जिद, क्षेत्रीय भावनाओं को लेकर उसके पक्ष में या उसके खिलाफ एक जिद चल रही है, उसके चलते हुए लोगों की सोच को दकियानूसी किया जा रहा है, और उसे राष्ट्रवाद, देशप्रेम, और भारतीय संस्कृति या भारतमाता से भी जोड़ दिया जा रहा है। यह एक खतरनाक सिलसिला है जो लोगों को आधुनिकता से दूर धकेल रहा है, लोकतंत्र से दूर धकेल रहा है, इंसाफपसंद सोच से दूर धकेल रहा है, और यही वजह है कि भारतीय संविधान में छुआछूत एक गंभीर जुर्म होने के बावजूद मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में, देश के बीचों-बीच सरकारी स्कूल में एक दलित बच्चा डूबकर मर जाने को बेबस किया जाता है, क्योंकि स्कूल के हेडमास्टर से लेकर शिक्षकों तक कोई भी हैंडपंप छूने के उसके हक को दिलाने की दिलचस्पी नहीं रखते। 
हिन्दुस्तान में धर्म और जाति को लेकर, खान-पान और संस्कृति को लेकर जितना हिंसक भेदभाव है, उसका अंदाज उन लोगों को नहीं है जो कि हिंसा करते हैं। उसका अंदाज उन लोगों को है जो हिंसा झेलते हैं। यह देश, इसको हांकने वाले लोग, और यहां की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज भी इस बात में मजा लेते हैं कि बालिग आपसी सहमति वाले लोगों के बेडरूम में ताक-झांक करके यह नजर रखें कि वे किस तरह से सेक्स करते हैं, किसके साथ करते हैं, और उसे लेकर उन्हें किस तरह जेल में डाला जा सकता है। यह देश पाखंडी इतिहास की तरफ धकेला जा रहा है, और एक ऐसे इतिहास का झांसा भी खड़ा किया जा रहा है जो कि कभी था ही नहीं। झूठ को चारों तरफ इस रफ्तार से फैलाया जा रहा है कि सच को सांस लेने के लिए भी जगह न मिले। जब चारों तरफ धर्म और साम्प्रदायिकता के ऐसे जुर्म का बोलबाला हो, तो इस देश के दलित और आदिवासी, यहां के अल्पसंख्यक, यहां की महिलाएं, और देश के नौजवान छात्र, इन सबकी जिंदगी मुश्किल होती जा रही है। यह देश कुछ सीमित लोगों की साम्प्रदायिक और सांस्कृतिक सोच तले कुचला जा रहा है, और जो लोग भारत के अड़ोस-पड़ोस के देशों को भी मिलाकर एक अखंड भारत की कल्पना करते हैं, वे भारत के सरहदी नक्शे के भीतर भी तबकों को खंड-खंड करने में लगे हुए हैं। 

दो चुनावों के बीच बरस का बिना दबाव वाला बजट, ढांचे बेहतर करने पर जोर

9 मार्च 2016
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सोलहवें बरस में बारह बरस के मुख्यमंत्री का वित्तमंत्री की हैसियत से दसवां बजट चुनाव से परे का बिना दबाव वाला बजट है, और प्रदेश में वित्तीय अनुशासन अब भी देश के अधिकतर राज्यों के मुकाबले बेहतर रहने की तस्वीर पेश करता है। वैसे तो खबरों में आंकड़े पूरे आ जा रहे हैं लेकिन यह बात प्रभावशाली है कि बारह बरस की अपनी सरकार में राज्य ने प्रदेश पर से कर्ज को जीएसडीपी के 25 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी तक लाया गया है, और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बजट के साथ यह बताया कि यह पूरे देश में सबसे कम कर्ज भार वाला राज्य है। लेकिन किसी चुनावी बरस से परे का बीच के बरस का बजट होने के कारण इसे लुभावना बनाने का कोई दबाव सरकार के ऊपर नहीं था, और इसीलिए ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री, जो कि दस बरस से वित्तमंत्री भी हैं ने राज्य के मौजूदा ढांचे को और मजबूत बनाने का काम किया है।
राज्य सरकार के जानकार लोगों से इस बजट के पीछे की सोच को समझने से यह जानकारी मिलती है कि इसमें सबसे कमजोर और सूखे की तकलीफ झेल रहे किसानों की मदद के लिए कृषि और सिंचाई में तो भरपूर मद रखा गया है, लेकिन नई मुनादियों से बचा गया है। ऐसा समझ पड़ता है कि राज्य सरकार जनसुविधाओं और ढांचागत क्षमताओं को मजबूत बनाने में यह साल लगाना चाहती है, बजाय नई-नई योजनाओं को शुरू करके मौजूदा ढांचे को कमजोर छोड़ देने के। जानकार लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने स्कूल-कॉलेज से लेकर अस्पतालों तक, और आदिवासी आश्रमों तक के लिए मौजूदा ढांचे को अधिक मजबूत और अधिक सुविधासंपन्न, अधिक क्षमता के बनाने पर जोर दिया है। 
बजट को आमतौर पर टैक्स से जोड़कर देखा जाता है लेकिन राज्य सरकार के बजट में टैक्स का इतना बड़ा हिस्सा रहता नहीं है कि उसमें बड़ा फेरबदल किया जाए। छत्तीसगढ़ में मंदी की मार झेल रहे इस्पात उद्योग को इस बजट में टैक्स की कुछ छूट मिली है, लेकिन अधिकतर दूसरे दायरों में टैक्स ढांचे में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। ऐसे में मौजूदा टैक्स वसूली और केंद्र सरकार से मिलने वाले आबंटन से ही राज्य का अगला बरस चलना है, बजाय किसी नई टैक्स-कमाई के।
मुख्यमंत्री की पेश की गई लंबी लिस्ट को अगर देखें तो हर विभाग के सैकड़ों मौजूदा केंद्रों पर बड़ा खर्च बजट में रखा गया है। सड़कों के ढांचे से लेकर स्कूल-कॉलेज की इमारतों और सभागृहों तक, बिजली के विस्तार और अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने तक बड़ी रकम खर्च होने जा रही है। लेकिन नए-नए स्कूल-कॉलेज, नए अस्पताल-हॉस्टल, नई-नई संस्थाओं की घोषणाओं को शायद अगले बजट तक टाल दिया गया है, क्योंकि सारे चुनाव निपट जाने के बाद अब विधानसभा स्तर पर, या जिला स्तर पर वोटरों को लुभाने और संतुष्ट करने की कोई तुरत जरूरत नहीं है। 
लेकिन एक बात जो हमें पिछले कई बजटों के बारे में लिखते हुए कही थी, हम उसे दुहराना चाहेंगे। राज्य में टैक्स चोरी से लेकर चिटफंड जैसे व्यापक आर्थिक अपराधों की भरमार है। सरकारी विभागों में बड़े पैमाने पर नियमित और संगठित भ्रष्टाचार है। खुद सरकार के कामकाज में जगह-जगह अधिकतर विभागों में साजिश से किए गए अपराध हैं। ऐसे में सरकार को एक मशीनरी ऐसी विकसित करनी चाहिए जो कि प्रदेश के सरकारी और गैरसरकारी आर्थिक अपराधों पर खुफिया नजर रख सके। आज सरकार के अपने भ्रष्टाचार विरोधी हाथ-पैर ऐसे हैं जो कि शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करते हैं, या कि किसी बहुत ही अधिक भ्रष्ट अफसर पर कभी-कभार अनुपातहीन संपत्ति का मामला बना देते हैं। लेकिन तकरीबन सभी भ्रष्टाचार जब हो चुके रहते हैं, उसके बाद ही सरकार की एजेंसियां उनमें से गिनती के कुछ मामलों को देख पाती हैं। हमारा मानना है कि जिस देश और प्रदेश में आतंक को लेकर, उग्रवादी हिंसा को लेकर खुफिया एजेंसियां काम करती हैं, वैसा ही काम राज्य सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए किया जाना चाहिए, और उससे समय रहते भ्रष्टाचार में गायब हो रही सरकारी रकम को बचाया जा सके। आर्थिक अपराध निगरानी ब्यूरो किस्म की एक ऐसी एजेंसी रहनी चाहिए जो कि अपराधों की जांच, और उनके मुकदमों के बजाय सिर्फ खुफिया निगरानी का काम करे, और जानकारी मिलने पर जांच एजेंसियों को खबर करे। यह एक नया काम होगा, लेकिन इससे सरकारी खर्च की चोरी और बर्बादी काफी घट सकती है।
मुख्यमंत्री ने वित्तमंत्री का जिम्मा बिना अधिक परेशान हुए, परेशान दिखे, जितनी आसानी के साथ इतने बरसों से निभाया है, और राज्य को आर्थिक रूप से जहां तक पहुंचाया है, वह तारीफ की बात है, और देश के बाकी बहुत से राज्यों में हालत पर काबू इतना अच्छा नहीं है। उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर काम पर जितना बड़ा खर्च किया जा रहा है, उसमें उतनी ही बड़ी चोरी और बर्बादी का जो खतरा है, उसे कैसे घटाया जाए।

लड़कों के लिए चाह, और लड़कियों के लिए मरघट की राह वाला देश

8 मार्च 2016
संपादकीय
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर बहुत से सरकारी भाषण देश भर में चल रहे हैं, और भारत में देवी की पूजा करने वाली दो नवरात्रियों के अलावा महिला दिवस एक दिन और हो जाता है जब महिलाओं के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जाती हैं, और उनको आगे बढ़ाने के बारे में कई तरह के वायदे किए जाते हैं। लेकिन हकीकत अगर देखें तो हर शहर में तकरीबन हर हफ्ते किसी भी उम्र की महिला के साथ बलात्कार हो रहा है। महिलाओं को नसीहत देने के मामले में हरियाणा के भाजपा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कुर्सी संभालने के कुछ दिन पहले ही कहा था कि जिन महिलाओं को रात में अकेले घर से निकलना ठीक लगता है वे नंगी क्यों नहीं घूमतीं। इसके बाद यह बात तो बहुत स्वाभाविक थी कि हरियाणा के जाट आंदोलन के दौरान सड़क रोकते लोगों को यह जायज लगा हो कि रात में सड़कों पर कार से जा रही महिलाओं को खेत में ले जाकर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाए। लेकिन हरियाणा से बहुत दूर, बंगाल में ममता बैनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद वहां हुए एक बलात्कार को सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दिया था, लेकिन उनकी पुलिस ने शिकायत को सही पाया, और शायद उस मामले में अदालत से सजा भी हो चुकी है। और यह बात महज नेताओं की नहीं है, देश की राजधानी दिल्ली ने भी महिलाओं के खिलाफ हिंसक बकवास करने वाला पुलिस कमिश्नर देखा है। बात-बात में देश की महिलाओं को कपड़े ठीक पहनने की नसीहत दी जाती है। लेकिन जिस देश में दो-चार बरस की बच्चियों से भी बलात्कार के बिना कोई सूरज नहीं ढलता, कोई सूरज नहीं उगता, वहां पर कपड़ों पर जिम्मेदारी को डाल देना हजारों बरस से चले आ रहे मर्दाना-जुर्म की एक कड़ी ही है। 
महिलाओं से बलात्कार से परे भी उनके साथ गजब-गजब के भेदभाव होते हैं। दो ही दिन पहले हमने मुंबई की एक खबर पर इसी जगह लिखा था कि किस तरह कैंसर की शिकार लड़कियों में से लड़कों के मुकाबले आधी संख्या को ही इलाज नसीब होता है, और बाकी लड़कियों को यह सोचकर मर जाने दिया जाता है कि लड़की को बचाकर क्या हासिल होगा। गरीबी एक वजह हो सकती है, लेकिन इन मामलों में जहां लड़कों और लड़कियों में फर्क किया जाता है, वहां गरीबी वजह नहीं होती, लड़कों के लिए चाह, और लड़कियों के लिए मरघट की राह वजह होती है। 
महिलाओं के साथ जुल्म और जुर्म इतने अधिक होने की एक वजह यह है कि सत्ता पर बैठे हुए नेता और अफसर, धर्म की ठेकेदारी करने वाले अलग-अलग रंगों के चोले वाले लोग, और जाति की नेतागिरी, खाप पंचायतों की अगुवाई करने वाले लोग जब कन्या भू्रण हत्या से लेकर ऑनर किलिंग तक करवाते हैं, जब लड़कियों के जींस पहनने और उनके मोबाइल फोन इस्तेमाल पर रोक लगाते हैं, तो समाज के उनके नीचे के सारे मर्द यह मान लेते हैं कि लड़कियों से हिंसा और बलात्कार जायज है। जब तक देश की अदालत महिलाओं के खिलाफ हिंसक बयान देने वालों को जेल भेजना शुरू नहीं करेगी, तब तक हिंसा रूक नहीं सकती। जहां देश की राजनीति, जाति-व्यवस्था, धर्म, और पुरुषप्रधान सोच सब कुछ मिलकर औरत के खिलाफ हथियार उठाए हुए हैं, वहां अदालत को खुद होकर कार्रवाई करनी पड़ेगी, और बकवासियों को हिंसा के जुर्म में जेल भेजना पड़ेगा, उससे कम में नौबत नहीं सुधर सकती। इस देश में आज माहौल ऐसा है कि लड़कियां और महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं, और मर्द के खाना खा लेने के बाद ही उसे खाने का हक है। इसके अलावा खाना कम पड़े तो उसे मार खाकर पेट भर लेने का हक है। ऐसे देश में आने वाली कई सदी तक महिलाओं की हालत बराबरी की आएगी, इसमें हमको शक है। 

प्रशांत किशोरों को लेकर जनमत पर कुछ सवाल

7 मार्च 2016
संपादकीय
पिछले कुछ दिनों से हवा में यह खबर है कि एक वक्त मोदी, और फिर नीतीश कुमार को चुनावी जीत दिलाकर अपनी राजनीतिक महारत साबित कर चुके प्रशांत किशोर अब राज्यों के चुनाव में कांगे्रस के रणनीतिकार बनने जा रहे हैं। उनका राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा है, सिवाय एक पेशेवर आदमी के जो कि उसे दिया गया चुनावी सर्वे, तैयारी, या प्रचार का जिम्मा निभाता है। और कांगे्रस के नेताओं के साथ अभी हुई प्रशांत किशोर की बैठक से ऐसा लगता है कि यह पार्टी शायद पहली बार अपने कुनबाई-करिश्मे के अतिआत्मविश्वास को कुछ किनारे पर रखकर चुनाव को चुनाव की तरह भी लड़ सकती है। हमको वैसे तो कांगे्रस या किसी और पार्टी की जीत या हार से कोई अधिक लेना-देना नहीं है, और हमारी सारी परवाह पार्टियों की रीति-नीति, और उनके सिद्धांतों को लेकर रहती है। लेकिन भारतीय राजनीति में पेशेवर चुनावी-रणनीतिकार आने से अब यह सोचने की जरूरत महसूस हो रही है कि क्या यह लोकतंत्र ऐसी पेशेवर तैयारी से किसी आकार में ढाला जा सकता है? क्या लोगों का रूझान पहाड़ी नदी को सरकारी नहर में तब्दील करने की तरह बदला जा सकता है? और अगर ऐसा किया जा सकता है तो फिर क्या इस लोकतंत्र में लोगों के वोट को सचमुच ही उतना वजनदार मानना ठीक है जितना कि चुनाव आयोग की वोटिंग मशीनें मानती हैं? 
अभी देश की हवा में जेएनयू से निकला यह नारा भी तैर रहा है कि कितने फीसदी लोगों ने किनको वोट दिया। जोश में थोड़ा सा फिसलकर जेएनयू छात्र नेता कन्हैया ने यह कह दिया कि 69 फीसदी लोगों ने मोदी के खिलाफ वोट दिया था। यह आंकड़ा गलत है क्योंकि मोदी के लिए चाहे 31 फीसदी लोगों ने ही वोट दिया, लेकिन घर बैठे लोगों के वोटों को मोदी के खिलाफ गिन लेना एक गलत गिनती है। ऐसी ही गिनती पर असर डालने के लिए प्रशांत किशोर जैसे लोग मोदी के गुजरात और नीतीश के बिहार में चुनाव-संचालन की अहमियत साबित कर चुके हैं। अब हमारा यह सोचना है कि देश में सबसे बड़ा फैसला तो घरघुस्सू मतदाता करते हैं जो वोट डालने वालों की गलत पसंद के मुकाबले भी अधिक गुनहगार होते हैं। दूसरी बात यह कि भारतीय लोकतंत्र में जात के नाम पर वोटों को बरगलाने की, धर्म के नाम पर लोगों भड़काने की, और नगद देकर वोट खरीदने की बात तो पहले से चली आ रही है। दिग्विजय सिंह जैसे लोग अपने खुद के चुनाव हारने के पहले यह दावा करते आए थे कि चुनाव सरकार के काम से नहीं, चुनाव के मैनेजमेंट से जीता जाता है। अब अगर कांगे्रस के लिए प्रशांत किशोर कोई ऐसा मैनेजमेंट कर सकते हैं जो कि इस टाईटैनिक को फिर से तैरा सके, तो फिर लोकतंत्र का मतलब क्या रह जाएगा? क्या भारत के चुनाव अमरीकी राष्ट्रपति के चुनावों की तरह के हो जाएंगे, जिनमें ड्रेस डिजाइनरों से लेकर एक-एक शब्द लिखने वालों तक, और मीडिया को मैनेज करने वालों तक का काम पेशेवर लोग भुगतान लेकर करते हैं? अगर ऐसा होता है, और ऐसे ही आसार दिख रहे हैं, तो भारतीय लोकतंत्र में जनमत नाम का शब्द इश्तहारों के झांसे में आने वाले ग्राहक नाम के शब्द में तब्दील कर देना चाहिए। प्रशांत किशोर जैसे लोग मार्केट सर्वे करने वाले, विज्ञापन बनाने वाले, और बिक्री बढ़ाने वाले बाजार के पेशेवरों का मिला-जुला पैकेज सरीखा साबित हो रहे हैं। तो क्या अब भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक सोच, राजनीतिक साख, और नेताओं की राजनीतिक छवि इसी तरह की रह गई है जिसे कि एक बाजार के ब्यूटी पार्लर में ले जाकर अधिक बिकाऊ बनाया जा सके? 
हम चुनावों में पेशेवर समझ, जनमनोविज्ञान के इस्तेमाल, और जनरूझान को मोडऩे की कोशिशों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन एक फिक्र यह है कि क्या लोकतंत्र में जनमत बस इतना ही गंभीर है कि उसे ऐसे क्रीम-पावडर से रिझाया जा सकता है?