जिन समारोहों का सामाजिक सरोकार न हो, वे फिजूल के...

संपादकीय
1 मार्च 2016  

अमरीका और दुनिया के सबसे बड़े फिल्म पुरस्कारों में कल साल की सबसे अच्छी फिल्म का पुरस्कार स्पॉटलाइट नाम की एक अमरीकी फिल्म को मिला, जिसमें  कैथोलिक चर्च में बाल यौन शोषण का मामला और उस पर एक अखबार का किया हुआ भांडाफोड़ फिल्म का विषय है। यह फिल्म वर्ष 2001 की पृष्ठभूमि में बनी है जब स्पॉटलाइट की टीम ने एक घोटाले की जांच शुरू की और अंतत: बच्चों के यौन उत्पीडऩ के मामले का खुलासा किया। इस टीम के काम के कारण समाचार पत्र द बोस्टन ग्लोब को 2003 में सार्वजनिक सेवा के लिए पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 
ऑस्कर पुरस्कार समारोह को लेकर कुछ लोगों को यह शिकायत है कि उसमें लोग पुरस्कार लेते हुए जो भाषण देते हैं, वे फिल्मों से परे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर रहते हैं, और उनसे फिल्मों की तरफ से फोकस हट जाता है। लोगों को याद होगा कि कई लोगों ने ऑस्कर लेने से मना किया, और उसकी अलग-अलग वजहें गिनाईं। किसी भी कला से जुड़े हुए समारोह में अगर आज की दुनिया, आज की राजनीति, आज की इंसानियत या आज की हैवानियत को लेकर जागरूकता नहीं है, तो ऐसी फिल्में भला किस काम की? फिल्म अगर महज एक तकनीक है, तो एक  अलग बात है, लेकिन अगर फिल्में जिंदगी से जुड़ी हुई हैं, तो फिर जिंदगी के मुद्दों से कटी हुई कैसे रह सकती हैं? और हो सकता है कि कई फिल्में ऐसी कहानियों पर बनी हुई हों जिनका असल जिंदगी की जागरूकता से कोई लेना-देना न हो, लेकिन जब जिंदगी में आसपास हकीकत में इतना कुछ, और ऐसा कुछ होते रहता है कि वह किसी भी कहानी के मुकाबले अधिक नाटकीय रहता है, अधिक हिंसक रहता है, तो फिर उस हकीकत की चर्चा भी कोई न करे, तो वह समारोह ही पूरी तरह मुर्दा होगा। 
कल का ऑस्कर समारोह कई वजहों से जिंदादिली से भरा हुआ था, और भारत जैसे देश को उससे कम से कम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीखने का एक मौका मिल सकता है। इस बार के समारोह में पुरस्कार के लिए मनोनीत, मुकाबले में छांटी गई फिल्मों और कलाकारों में से कोई भी अश्वेत नहीं थे। इस एक मुद्दे को लेकर, और पुरस्कारों के मुकाबले में सिर्फ गोरों की मौजूदगी को लेकर अमरीका के रंगभेद पर मजाक-मजाक में बहुत चर्चा हुई, और बच्चों के, बड़ों के, यौन शोषण को लेकर भी कार्यक्रम का खासा बड़ा हिस्सा समर्पित रहा, और अमरीकी राष्ट्रपति ने मंच पर पहुंचकर मौजूद तमाम लोगों को, और टीवी के करोड़ों दर्शकों को यह शपथ दिलाई कि किसी के भी यौन शोषण पर वे चुप नहीं रहेंगे। एक दूसरे कलाकार ने दुनिया के जलवायु परिवर्तन को लेकर फिक्र जताई, और कुछ लोगों ने आदिवासियों के मुद्दों को उठाया। 
जब कलाकार, फिल्मकार, और जागरूक लोग दुनिया के जलते-सुलगते मुद्दों पर चर्चा का कोई मौका नहीं खोते, तो वे अपनी सामाजिक जवाबदेही, और अपने सामाजिक सरोकार को पूरा करते हैं। जो कोई यह मानकर चलते हैं कि समारोह किसी भी विवाद से परे होना चाहिए, वे लोग एक मुर्दा और सामंती समारोह की बात करते हैं जिसके सामाजिक सरोकार शून्य होते हैं। इस बार कैथोलिक चर्च ने बच्चों के यौन शोषण की कहानी पर बनी जिस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला है, उसने इस पुरस्कार के साथ ही दुनिया के चर्चों में बच्चों के यौन शोषण की एक बहुत आम बात को उठाया है, और इस विषय पर और जागरूकता आने की उम्मीद की जा सकती है। पाकिस्तान की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म को भी पुरस्कार मिला है जिसमें वहां प्रेम विवाह करने वाली लड़कियों को परिवार ऑनर किलिंग के नाम पर मार डालते हैं। एक महिला निर्देशक की बनाई हुई इस फिल्म से पाकिस्तान और भारत दोनों जगहों पर चल रहे ऐसे सामाजिक रिवाज पर भी चर्चा हो सकेगी। 
भारत में आज सामाजिक वातावरण जिंदगी के असल मुद्दों पर खरी-खरी चर्चा से परे का है, और जो समाज हकीकत को इतना अनदेखा करने में लगा रहता है, उसका आगे बढऩा थम जाता है। अमरीका में असहमति और आक्रामक तेवरों की जितनी जगह सार्वजनिक जीवन में है, उसी से वहां का समाज एक जिंदा समाज बना हुआ है। ऑस्कर हर बार कुछ न कुछ सामाजिक सरोकार की बातों का मंच बनता है, और फिल्मों में दिलचस्पी न रखने वाले लोग भी इसके प्रसारण को इसी वजह से दिलचस्पी से देखते हैं। 

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