पानी पीने के लिए कुएं में जान देने को बेबस मप्र का दलित बच्चा

संपादकीय
10 मार्च 2016  

मध्यप्रदेश में दलितों के साथ ज्यादती आए दिन की बात है। न वहां दलित दूल्हों को घोड़े पर चढऩे मिलता, न दलितों को गांव के अकेले कुओं पर पानी भरने मिलता, और कल वहां एक सरकारी स्कूल में दोपहर के भोजन के बाद एक बच्चा कुएं में गिरकर मर गया क्योंकि स्कूल में दलित बच्चों को हैंडपंप से पानी लेने की इजाजत नहीं है, और वे खतरा झेलते हुए कुएं का पानी निकालते हैं। मध्यप्रदेश की सोच में सामंती जातिवाद की हिंसा बड़ी आम बात है, और लगातार दलित-प्रताडऩा के मामले वहां से सामने आते हैं, और हमारा यह भी मानना है कि सामने आने वाले हर मामले के पीछे सामने न आने वाले सैकड़ों मामले रहते होंगे। देश में आजादी के बाद पौन सदी पूरी होने को है, और जात-पात को लेकर कुछ लोगों को अछूत मानना अब तक जारी है। उत्तर भारत में ही नहीं, दक्षिण भारत में भी जगह-जगह सरकारों को दखल देनी पड़ती है कि किसी दलित महिला के पकाए हुए स्कूली-खाने को सभी लोग खाएं। गांव के सवर्ण अपने बच्चों को ऐसा खाना खाने नहीं देते हैं। जात-पात को लेकर उत्तर भारत में आए दिन हत्याएं होती हैं कि कैसे किसी ने दूसरी जात वाले से शादी कर ली। 
हमारा मानना है कि इंसान की सोच में इंसाफ और वैज्ञानिक समझ टुकड़े-टुकड़े में नहीं आ पाती। जिस तरह कोई दस फीसदी कुंवारा नहीं हो सकता, पन्द्रह फीसदी ईमानदार नहीं हो सकता, उसी तरह कोई भी दस-बीस फीसदी तर्कसंगत या न्यायसंगत नहीं हो सकते। लोग या तो पूरी तरह से इंसाफपसंद हो सकते हैं, या पूरी तरह से बेइंसाफी वाले लोग बने रह सकते हैं। आज देश में जिस अंदाज में साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, खान-पान को लेकर एक जिद, संस्कृति और धर्म को लेकर एक जिद, क्षेत्रीय भावनाओं को लेकर उसके पक्ष में या उसके खिलाफ एक जिद चल रही है, उसके चलते हुए लोगों की सोच को दकियानूसी किया जा रहा है, और उसे राष्ट्रवाद, देशप्रेम, और भारतीय संस्कृति या भारतमाता से भी जोड़ दिया जा रहा है। यह एक खतरनाक सिलसिला है जो लोगों को आधुनिकता से दूर धकेल रहा है, लोकतंत्र से दूर धकेल रहा है, इंसाफपसंद सोच से दूर धकेल रहा है, और यही वजह है कि भारतीय संविधान में छुआछूत एक गंभीर जुर्म होने के बावजूद मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में, देश के बीचों-बीच सरकारी स्कूल में एक दलित बच्चा डूबकर मर जाने को बेबस किया जाता है, क्योंकि स्कूल के हेडमास्टर से लेकर शिक्षकों तक कोई भी हैंडपंप छूने के उसके हक को दिलाने की दिलचस्पी नहीं रखते। 
हिन्दुस्तान में धर्म और जाति को लेकर, खान-पान और संस्कृति को लेकर जितना हिंसक भेदभाव है, उसका अंदाज उन लोगों को नहीं है जो कि हिंसा करते हैं। उसका अंदाज उन लोगों को है जो हिंसा झेलते हैं। यह देश, इसको हांकने वाले लोग, और यहां की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज भी इस बात में मजा लेते हैं कि बालिग आपसी सहमति वाले लोगों के बेडरूम में ताक-झांक करके यह नजर रखें कि वे किस तरह से सेक्स करते हैं, किसके साथ करते हैं, और उसे लेकर उन्हें किस तरह जेल में डाला जा सकता है। यह देश पाखंडी इतिहास की तरफ धकेला जा रहा है, और एक ऐसे इतिहास का झांसा भी खड़ा किया जा रहा है जो कि कभी था ही नहीं। झूठ को चारों तरफ इस रफ्तार से फैलाया जा रहा है कि सच को सांस लेने के लिए भी जगह न मिले। जब चारों तरफ धर्म और साम्प्रदायिकता के ऐसे जुर्म का बोलबाला हो, तो इस देश के दलित और आदिवासी, यहां के अल्पसंख्यक, यहां की महिलाएं, और देश के नौजवान छात्र, इन सबकी जिंदगी मुश्किल होती जा रही है। यह देश कुछ सीमित लोगों की साम्प्रदायिक और सांस्कृतिक सोच तले कुचला जा रहा है, और जो लोग भारत के अड़ोस-पड़ोस के देशों को भी मिलाकर एक अखंड भारत की कल्पना करते हैं, वे भारत के सरहदी नक्शे के भीतर भी तबकों को खंड-खंड करने में लगे हुए हैं। 

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