रविशंकर का भूमाफिया जैसा काम और केन्द्र सरकार का शर्मनाक रूख सदमा दे रहा...

संपादकीय
11 मार्च 2016  

दिल्ली में यमुना के किनारे दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक समारोह करने का दावा करने वाले स्वघोषित श्रीश्री रविशंकर ने भारत की सबसे बड़ी पर्यावरण-अदालत के साथ एक टकराव लिया है, और कहा है कि उन पर लगाया गया पांच करोड़ का जुर्माना वे नहीं पटाएंगे, और उसकी बजाय वे जेल चले जाएंगे। इस कार्यक्रम में पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जाने वाले थे, उन्होंने जाना रद्द किया, लेकिन अब तक की खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसमें जा रहे हैं। यमुना के किनारे पर्यावरण के हिसाब से बहुत ही संवेदनशील इलाके को पाटकर, कुचलकर, वहां तरह-तरह की दवाईयां छिड़ककर रविशंकर अपनी मर्जी से एक जमींदारी की तरह यह कार्यक्रम कर रहे हैं, और शर्मनाक बात यह भी है कि दिल्ली सरकार की सिफारिश पर केन्द्र सरकार ने भारतीय फौज को लगाकर इस कार्यक्रम के लिए यमुना पर पुल खड़े करवाए हैं। जिस सेना की शहादत का इस्तेमाल इन दिनों जेएनयू के छात्रों को देशद्रोही साबित करने के लिए हो रहा है, उस सेना के सैनिक आज भवन निर्माण मजदूरों की तरह सामान ढोते हुए इस बाबा रविशंकर के समारोह का काम कर रहे हैं, जिसका काम एक श्री से नहीं चल पाता, और दो श्री लगाने के बाद ही जिसके अहंकार का पेट भर पाता है। 
जिन लोगों को रविशंकर की पहचान आर्ट ऑफ लिविंग नाम की उनकी योग-ध्यान शैली से है, उनकी जानकारी में यहां पर थोड़ा सा इजाफा कर देना ठीक रहेगा। ये वही रविशंकर हैं जो कि यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी करते रहे, लेकिन उसी दौर में उनके अपने आश्रम वाले कर्नाटक में येदियुरप्पा की भाजपा सरकार के भयानक भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी उनका मुंह नहीं खुला। ऐसे रविशंकर के नाम की दुकानदारी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चलाने वाले लोग किस तरह से बड़े-बड़े जमीनों के जुर्म में शामिल रहे, यह भी सबका देखा हुआ है। जब भूमाफिया रविशंकर की दुकान चलाएं, तो फिर खुद रविशंकर के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है कि कानून तोड़ते हुए वे यमुना के किनारे अपना अहंकारी रिकॉर्ड कायम करें, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सुनाए हुए जुर्माने को पटाने से मना कर दें। इस देश में धर्म और आध्यात्म के नाम पर, योग और इसी किस्म की दूसरी कुछ चीजों के नाम पर हर किस्म की हिंसा, हर किस्म का जुर्म आम बात है, और इन दिनों ऐसा लगता है कि ऐसे ही चोलाधारी माफिया के अच्छे दिन आ गए हैं। 
अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्या सोचकर इस कार्यक्रम में जा रहे हैं? जिसे देश की सबसे बड़ी पर्यावरण अदालत से जुर्माना सुनाया गया है, वह अगर जुर्माना पटा भी देता है, तो भी यह आयोजन कानून को तोड़कर किया जा रहा है, और गैरकानूनी आयोजन में प्रधानमंत्री का जाना देश के सामने एक बहुत बुरी मिसाल रखेगा। इसके बाद तो हर किस्म के मुजरिमों के लिए यह रास्ता खुल जाएगा कि वे जुर्माने लायक जुर्म करते जाएं, और जुर्म में प्रधानमंत्री को भागीदार बनाते जाएं। जिस मामले की तीखी आलोचना के साथ उस पर इतना कड़ा जुर्माना लगाया गया है, उसमें प्रधानमंत्री का जाना उनके ओहदे के लिए शर्मनाक होगा, इस देश की सरकार के लिए शर्मनाक होगा। एक व्यक्ति के रूप में वे किसी मुजरिम के साथ भी जा सकते हैं, लेकिन उनको प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी को समझना चाहिए, और ऐसे किसी कार्यक्रम से अपने को दूर रखना चाहिए। केन्द्र सरकार की तरफ से प्रतिरक्षा मंत्री ने यह कुतर्क सामने रखा है कि सेना पहले भी कुछ कार्यक्रमों के लिए पुल बना चुकी है, इस सिलसिले में इलाहाबाद में होने वाले कुंभ को गिनाया गया है। कुंभ एक राष्ट्रीय आयोजन होता है, जिसका इंतजाम राज्य सरकार करती है, और केन्द्र सरकार उसमें भागीदार रहती है। एक रविशंकर की जिद पर पर्यावरण की हत्या करते हुए हो रहे ऐसे कार्यक्रम की कुंभ से क्या तुलना हो सकती है? और देश के लिए शहादत के लिए तैयार सैनिकों को एक ढोंगी बाबा की सेवा में पांव दबाने के लिए लगाकर मनोहर पर्रीकर ने देश की सेना का अपमान किया है। हमें उम्मीद है कि भारत की अदालतें इस पर सरकार के खिलाफ कुछ कहेंगी। फिलहाल देश में यह सबसे बड़ी इतनी बुरी मिसाल पेश हो रही है, और आर्ट ऑफ लिविंग का लेबल बेचने वाले रविशंकर एक भूमाफिया के अंदाज में यमुना को कुचल रहे हैं। उनके नाम का इस्तेमाल करके छत्तीसगढ़ में भी जमीनों के ऐसे ही जुर्म किए गए, इसलिए दिल्ली का उनका यह काम हमको हैरान नहीं कर रहा है, लेकिन इस पर केन्द्र सरकार का शर्मनाक रूख हमें सदमा जरूर दे रहा है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें