देश के माहौल पर मोदी को सोचने की जरूरत है

संपादकीय
12 मार्च 2016  

अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से वैसे तो हमारा कोई खास लेना-देना नहीं है, लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे कि भारत की राजनीति को और भारत के लोगों को कुछ सीखने की जरूरत है। वहां दकियानूसी मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के अब तक के सबसे कट्टर उम्मीदवारों में से एक, डोनाल्ड ट्रंप नीचता और कमीनगी के नए रिकॉर्ड कायम करते चल रहे हैं। उनकी कही हुई बहुत सी बातों की कोई मिसाल हिन्दुस्तान में सबसे गंदगी की बात करने वाले नेताओं में भी नहीं मिलेगी। कुछ अरसा पहले उन्होंने बिल क्लिंटन के मोनिका लेविंस्की के साथ संबंधों का इशारा करते हुए अपने मुकाबले सामने आ रहीं डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के बारे में यह कहा कि जो औरत अपने पति को संतुष्ट नहीं कर सकी, वह देश क्या चला सकेगी। एक दूसरे भाषण में उन्होंने अपने शरीर के अंगों को लेकर एक अहंकार की गंदगी बिखेरी। लेकिन इससे परे उनकी सबसे भयानक बातें अमरीका में मुस्लिमों के खिलाफ हैं, और तमाम गैरगोरों के खिलाफ हैं। दुनिया के मुस्लिम देशों के खिलाफ हमले की अनगिनत बातें कहने के बाद डोनाल्ड ट्रंप देश के भीतर भी मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने पर आमादा हैं, और उनकी खुद की रिपब्लिकन पार्टी में कई समझदार लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना ठीक रहेगा या नहीं? दूसरी तरफ कल अमरीका के एक बड़े शहर शिकागो में, जहां से कि मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा आते हैं, वहां पर डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में लोगों ने ऐसा जबर्दस्त प्रदर्शन किया कि उनका वहां का कार्यक्रम ही रद्द कर देना पड़ा। 
इन्हीं बातों को लेकर हिन्दुस्तान के कुछ लोगों को यह समझने की जरूरत है कि साम्प्रदायिकता के आधार पर, जातिवाद के आधार पर, खान-पान और सोच के आधार पर लोगों को किस हद तक बांटा जाए, किस हद तक उनका ध्रुवीकरण किया जाए, किस हद तक समाज में निहायत गैरजरूरी फर्जी मुद्दों को लेकर तनाव खड़ा किया जाए? और आज सबसे अधिक अगर किसी का कुछ दांव पर लगा हुआ है, तो वह अकेले नरेन्द्र मोदी का लगा हुआ है। अगले चुनाव अगर वे एनडीए और भाजपा को बहुमत नहीं दिला पाते हैं, तो नाकामयाबी का घड़ा फोडऩे के लिए उनकी पार्टी के लोग भी अकेले उन्हीं का सिर ठीक पाएंगे। लेकिन हम चुनावी हार-जीत से परे एक दूसरी बात करना चाहते हैं। क्या नरेन्द्र मोदी ने देश में ऐसे धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ाने के लिए जीत हासिल की थी? प्रधानमंत्री बने थे? उनके जितने आर्थिक विकास के नारे हैं, वे सारे के सारे बुरी तरह, और पूरी तरह, हाशिए पर जा चुके हैं, और उनकी पार्टी के लोग, उनके प्रशंसक, उनका झंडा लेकर चलने वाले पत्रकार और विचारक भी अब हैरान हैं कि क्या ऐसी नौबत के लिए जनता ने पिछले चुनाव में उन्हें अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत दिया था? आज ही हम इसी पेज पर एक भाजपा-प्रशंसक समझे जाने वाले लेखक का लेख छाप रहे हैं जो कि कुछ इसी तरह के सवाल उठा रहा है, और ये लेखक अकेले नहीं हैं, भाजपा के भीतर अनगिनत ऐसे लोग हैं जो देश में फैलाए जा रहे गैरजरूरी तनाव और टकराव के बीच खोते जा रहे असल मुद्दों को लेकर बहुत ही निराश हैं। 
नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि देश को एक रखकर, इसे आर्थिक विकास की तरफ लेकर जाएं, और जैसा कि पिछले कुछ दिनों से वे खुद भी कह रहे हैं, और बाकी तमाम लोग भी मांग कर रहे हैं कि उन्हें भाजपा का प्रधानमंत्री रहने के बजाय पूरे देश का प्रधानमंत्री रहना चाहिए। वैसे भाजपा भी पूरी की पूरी पार्टी के रूप में आज फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता से सहमत नहीं हैं, और उसके सहयोगी संगठन, उसके अपने नेता और मंत्री जिस तरह की हिंसा की बातें कर रहे हैं, उनसे भाजपा के बड़े-बड़े नेता भी बहुत फिक्रमंद हैं, और भाजपा के आम कार्यकर्ता भी। 

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