धार्मिक कट्टरता और हिंसा को बढ़ाना आसान, काबू करना...

संपादकीय
14 मार्च 2016

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कल एक बयान देते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और दुनिया के कुख्यात इस्लामी-आतंकी संगठन आईएस की तुलना कर दी। अब शब्द थोड़े-बहुत आगे-पीछे होंगे, लेकिन एक ही सिलसिले में दोनों का जिक्र किया गया, तो आज उसे लेकर संसद में हंगामा भी हुआ, और कांग्रेस से माफी मांगने की बात भाजपा ने की। यह पहला मौका नहीं है जब संघ का जिक्र ऐसी तुलना के साथ भारतीय राजनीति में किया गया है, लेकिन जब-जब ऐसी तुलना हुई है, लोगों को लगा कि यह आलोचना या ऐसी मिसाल नाजायज हैं। 
दरअसल होता यह है कि जब कभी किसी बात को साबित करने के लिए कोई मिसाल दी जाती है, तो उसमें मिलती-जुलती बातों का जितना हिस्सा होता है, उससे कहीं अधिक बड़ा हिस्सा फर्क का निकल आता है। और मिसाल से नुकसान कहीं अधिक हो जाता है, और जिस तरह ऑस्ट्रेलिया में फेंककर चलाने वाला एक हथियार बूमरैंग होता है जो कि फेंकने वाले तक लौट आता है, उसी तरह ये मिसालें इन्हें कहने वाले लोगों को ही लौटकर वार करती हैं। 
जो समझदार लोग रहते हैं वे बहस और तर्क में मिसालों से बचते हैं क्योंकि जिंदगी में दो अलग-अलग चीजों में एक सा होने की गुंजाइश कम रहती है और उनके फर्क सामने आने पर तर्क कमजोर हो जाता है। वैसे भी आज दुनिया में आईएस जिस तरह की हिंसा में लगा हुआ है, आरएसएस की उससे तुलना ठीक नहीं है। आज ही खबर है कि अफ्रीकी देश आइवरी कोस्ट में आईएस के आतंकियों ने एक ईसाई बच्चे को गोली मार दी क्योंकि वह इस्लामी प्रार्थना नहीं जानता था, और इस्लामी प्रार्थना करने वाले उतने ही बड़े दूसरे बच्चे को छोड़ दिया। धर्म का रूप ऐसा ही हिंसक रहता है। अपने धर्म को सबसे ऊपर मानने की जिद रखने वाले लोग किसी भी हद तक जाते हैं। और आज तो ऐतिहासिक क्रूरता को लेकर आईएस खबरों में हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में लंबे समय तक ऐसे साम्प्रदायिक दंगे चलते थे जिनमें लोग अड़ोस-पड़ोस के पुराने साथियों को भी धर्म का फर्क होने पर, उसी वजह से मार डालते थे। बात के बरसों में हिन्दुस्तान में आर्थिक विकास हुआ, और साम्प्रदायिक दंगे घटे। लोगों का ध्यान धर्म की तरफ से कुछ कम हुआ। पचास बरस पहले के दंगे अगर इस देश में बढ़ते रहते, तो यहां भी आईएस किस्म के कई संगठन खड़े हो जाते। लोगों को याद होगा कि पंजाब के आतंक के दिनों में खालिस्तानी आतंकी बसों और रेलगाडिय़ों से लोगों को उतारकर धर्म के आधार पर अलग-अलग खड़ा करते थे, और गैरसिखों को मार डालते थे। 
आज आईएस का जो खतरा दुनिया के सामने है, उससे अमरीका के राष्ट्रपति प्रत्याशी बनने की कोशिश कर रहे डेविड ट्रंप से लेकर हिन्दुस्तान के लोगों तक सबक लेने की जरूरत है कि धार्मिक कट्टरता को बढ़ाया तो जा सकता है, लेकिन बाद में उसे काबू नहीं किया जा सकता। 

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