कैलाश विजयवर्गीय की बात देश को तोडऩे वाली

15 मार्च 2016
संपादकीय

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय आम तौर पर उसी वक्त मुंह खोलते हैं, जब कुछ खाना हो, या जब कोई विवाद छेडऩा हो। अब उन्होंने ताजा ट्वीट में कहा है कि मुस्लिम नेता ओवैसी भारत की धरती पर बोझ हैं, भारत माता की जय बोले बिना इस धरती पर रहने का अधिकार किसी को नहीं है। इसके जवाब में देश की इस सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि चाहे उनके गले पर चाकू रख दिया जाए, वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, क्योंकि संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि हर किसी को भारत माता की जय बोलना जरूरी है। 
अब अगर कोई विचारधारा, कोई पार्टी, या कोई संगठन अपनी शब्दावली और अपने प्रतीकों को ही देशभक्ति का सुबूत माने, और उनको न मानने वाले लोगों को देश का गद्दार माने, तो यह बहुत ही हिंसक और घटिया सोच है। भारत माता की तस्वीर और नाम को लेकर भारतीय जनता पार्टी और उसके बहुत से सहयोगी संगठन लगातार यह बात छेड़ते हैं कि भारत में रहने के लिए यह एक जरूरी शर्त है। जबकि हकीकत यह है कि भारत माता की पहली सोच कुल डेढ़ सौ बरस पुरानी है, और 1873 के आसपास पहली बार बंगाल में अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने चार हाथों वाली एक हिंदू देवी जैसी भारत माता का चित्रण किया था, और उसी दौर में कुछ नाटकों में भारत माता का किरदार रखा गया था। भारत माता का इससे अधिक पुराना और कोई इतिहास नहीं है, और यह इतिहास पूरी तरह से हिंदू धर्म के प्रतीकों, हिंदू देवी की तस्वीरों के साथ जुड़कर ही आगे बढ़ा, और हिंदू संगठनों ने भारत माता के प्रतीक को उठाया।
अब सवाल यह उठता है कि अपनी जन्मभूमि को लेकर दुनिया के कोई देश उसे फादरलैंड कहते हैं, किसी और देश या संस्कृति में देश की जमीन के लिए कुछ और प्रतीक इस्तेमाल होते हैं। भारत में रहने वाले लोगों के लिए यह शर्त कैसे बनाई जा सकती है कि वे एक हिंदू देवी की तरह बनाई गई, और उसी तरह पूजी गई भारत माता की जय बोलें, तो ही देश में रहें। भारत माता शब्द या उसकी तस्वीर की भारतीय संविधान में कोई जगह नहीं है, यह हिंदुओं के बीच भी एक तबके के बीच लोकप्रिय एक प्रतीक है, और उन्हें वह प्रतीक मानने की पूरी आजादी है। दूसरी तरफ देश के प्रति वफादारी दिखाने के लिए किसी को किसी दिखावे की जरूरत नहीं है, और लोग अपने-अपने रस्म-रिवाज के मुताबिक जीने के लिए पूरी तरह आजाद हैं।
एक तरफ आज देश में कुछ लोग उदारता की बातें कर रहे हैं, खुद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने आरक्षण सहित कुछ और मुद्दों पर पिछले चार-छह दिनों में एक नई उदारता की बात की है। ऐसे में भाजपा के कुछ बड़बोले नेता अगर साम्प्रदायिकता की बात करते हैं, और अपने से अलग रीति-रिवाज वालों को गद्दार कहते हैं, तो यह देश को तोडऩे की बात है।

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