यह भारतीय लोकतंत्र की आंखों में झोंकी जा रही आइवरी कोस्ट की रेत है

विशेष संपादकीय
17 मार्च 2016  
-सुनील कुमार
महाराष्ट्र की विधानसभा ने कल एक भयानक नजारा देखा। और दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना और विपक्षी कांग्रेस-एनसीपी एक संसदीय-बाहुबली-हिंसा करने में एक होते हैं। देश की एक बड़ी प्रमुख मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम के विधायक वारिस पठान को इस बात के लिए बचे पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया कि उन्होंने भारत माता की जय का नारा लगाने से इंकार कर दिया। वारिस पठान की पार्टी के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने दो दिन पहले भाजपा नेताओं के भड़कावे और उकसावे, देश के साथ गद्दारी की परिभाषा, और देश छोड़कर चले जाने के फतवे के बीच कहा था कि वे देशभक्त हैं लेकिन वे भारत माता की जय नहीं कहेंगे, चाहे कोई उनकी गर्दन पर छुरी ही क्यों न रख दे। 
दो दिन पहले हमने इसी संपादकीय कॉलम में इस मुद्दे पर लिखा था कि 1873 के आसपास एक हिन्दू देवी के प्रतीकों वाली भारत माता की कल्पना की गई थी और बंगाल के चित्रकारों ने भारत माता की पहली काल्पनिक तस्वीर बनाई थी, हिन्दू धर्म की महिमा वाले, और मुस्लिमों के खिलाफ बात करने वाले नाटकों में भारत माता को जोड़ा गया था, और उसके बाद से लगातार महज हिन्दू संगठन भारत माता की कल्पना और धारणा के प्रतीक का इस्तेमाल करते आ रहे थे। अब अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए भारत माता के हाथ के झंडे का डंडा लेकर अगर सड़कों पर लोग टूट पड़ रहे हैं, तो वह सड़क की जुबान हो सकती है। लेकिन एक विधानसभा में पक्ष और विपक्ष दोनों मिलकर भी किसी विधायक को यह कहने पर कैसे बेबस कर सकते हैं कि वह भारत माता की जय कहे, वरना उसे जूते मारे जाएंगे, उसे विधायक के पूरे कार्यकाल के लिए विधानसभा से निकाल दिया जाएगा, और आखिर में उसे पूरे सत्र के लिए निलंबित कर भी दिया गया। 
कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के लिए यह बात चुनावी राजनीति के हिसाब से नुकसान की होती अगर वे भाजपा-शिवसेना के इस बाहुबल के खिलाफ खड़ी होतीं, और वारिस पठान के मौलिक अधिकारों की वकालत करतीं। एक बार कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी की अगुवाई में लोकसभा में अपने दानवाकार बहुमत के बाहुबल का इस्तेमाल करके मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए एक अकेली शाहबानो का गला घोंटा था, और कल महाराष्ट्र विधानसभा में हिन्दू कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए कांग्रेस-राकांपा पार्टी ने एक मुस्लिम के गले से हिन्दू-सांस्कृतिक नारा निकलवाने की कोशिश करते हुए उसका गला दबाया है। ये बातें देश के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो रही हैं कि जब देश में हिंसक फतवे दिए जा रहे हैं, जब सड़कों पर लोगों को देशद्रोही साबित करके उनके सिर और उनकी जुबान काटने पर ईनाम रखे जा रहे हैं, तो नेहरू-गांधी की पार्टी क्या कर रही है।
जिस लोकतंत्र के तहत, और लोकतंत्र को बचाने के लिए, या उसके नाम पर जो संसदीय व्यवस्था भारत में है, संविधान की उस पूरी सोच को कुचलते हुए महाराष्ट्र विधानसभा ने यह जो निलंबन किया है, वह हमारी समझ से बहुमत का होने के बावजूद पूरी तरह से असंवैधानिक है, और देश की बड़ी अदालत में जाकर यह टिक नहीं पाएगा। निलंबित विधायक और उसकी पार्टी को ही नहीं, देश के इंसाफपसंद लोगों को ऐसी ज्यादती के खिलाफ अदालत और बाहर मामला उठाना चाहिए। आज एक मुस्लिम विधायक को इस मुद्दे पर निलंबित किया गया है, कल कश्मीर की मुस्लिम बहुतायत वाली विधानसभा में क्या किसी हिन्दू विधायक को इस्लाम के प्रतीकों पर आधारित किसी ऐसे सामाजिक नारे को लगाने के लिए बेबस किया जाएगा जो कि उसकी सोच, उसकी पसंद, या उसकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ होगा? और फिर क्या नागालैंड की विधानसभा में ईसाई धर्म-प्रतीकों पर आधारित नारों का बोलबाला होगा? तो फिर हिन्दुस्तान लोकतंत्र कहां रह जाएगा? कहां पर सर्वधर्म समभाव की बात रह जाएगी? कैसे यह देश धर्मनिरपेक्ष कहला सकेगा? 
जब अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को देशभक्ति और देशद्रोही होने के तराजू की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो वहां लोकतंत्र खत्म समझा जाना चाहिए।  हो सकता है कि एक तरफ भाजपा और हिन्दू पार्टियां, दूसरी तरफ ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता की मुस्लिम पार्टी अगर वोटों का ध्रुवीकरण करती हैं, तो पूरे देश में इन दोनों का निजी फायदा हो सकता है, और इन दोनों से परे की पार्टियां नुकसान झेल सकती हैं। बहुत से लोगों को यह शक है कि यह भाजपा और ओवैसी की मिलीजुली नूराकुश्ती है। हम अभी उस पर नहीं जाते क्योंकि देश के मुकाबले एक चुनाव और एक सरकार बहुत छोटी बात है। 
लेकिन हम एक सवाल महाराष्ट्र विधानसभा से, और बाकी देश से भी जरूर पूछना चाहते हैं। अभी चार दिन पहले अफ्रीका के एक देश आइवरी कोस्ट में अलकायदा के इस्लामी-आतंकियों ने समुद्र तट पर डेढ़ दर्जन सैलानियों को मार डाला। उन्होंने चुन-चुनकर गैरमुस्लिमों को मारा। पांच बरस उम्र के दो बच्चे भी वहां थे, उन्होंने इन बच्चों से कोई इस्लामी प्रार्थना सुनाने को कहा। जो मुस्लिम बच्चा सुना पाया उसे उन्होंने छोड़ दिया, और जो ईसाई बच्चा वह प्रार्थना नहीं सुना पाया, उसे वहीं गोली मार दी। आइवरी कोस्ट के समुद्र तट की रेत जो लोग माथे पर तिलक की तरह लगाकर भारत में सिर ताने घूम रहे हैं, वे अपने धर्म, अपनी संस्कृति के साथ चाहे जो कर रहे हों, वे लोकतंत्र की आंंखों में बच्चे के लहू से सनी वह रेत झोंक रहे हैं। 

झीरम सीबीआई को देने के पीछे की कुछ बातें..

छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा से झुलस रहे बस्तर में झीरम घाटी में कांग्रेस के काफिले पर हुए हमले की अब सीबीआई की घोषणा राज्य सरकार ने की है। कांग्रेस का एक तबका लगातार इस बात की मांग कर रहा था, और कांग्रेस के कई नेताओं का यह गहरा शक था कि इस हमले में कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने नक्सलियों के साथ मिलकर साजिश रची थी और प्रदेश कांग्रेस की लीडरशीप को एकमुश्त खत्म करने का काम किया था। अब यह कांग्रेस का अपना घरेलू और अंदरुनी शक है, और इसमें हकीकत क्या है, इसे या तो नक्सली जानते हैं, या अगर कोई कांग्रेसी इस साजिश के पीछे था, तो वह जानता है, या फिर फिरोज सिद्दीकी नाम का वह स्टिंगबाज जानता है जिसने कि इस राज को खोलने का दावा किया है, और मीडिया बेसब्री से कांग्रेस के इस सीरियल की अगली कड़ी की राह देख रहा है। 
लेकिन इन सबसे परे अब झीरम घाटी की सीबीआई जांच से आखिर क्या होगा? प्रदेश की भाजपा सरकार ने इस घोषणा के बाद अपने हाथ जांच से झाड़ लिए हैं, और केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली सीबीआई इस जांच को ले, या न ले, राज्य सरकार ने तो कांग्रेस की फरमाईश पर यह सिफारिश करके अपना जिम्मा पूरा कर लिया है। अब किसी भी ऐसे हमले की जांच की बात करें, तो झीरम की जांच देश की एक सबसे बड़ी राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए कर ही रही है, और उसने अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया है। एनआईए को बनाया ही इसलिए गया था कि ऐसे आतंकी मामलों, या देश के भीतर के लोगों, देश के बाहर के लोगों द्वारा इस जमीन पर किए गए आतंकी हमलों की जांच ठीक से हो सके। अब एक राष्ट्रीय एजेंसी की जांच चल ही रही है, एक न्यायिक जांच आयोग की सुनवाई चल ही रही है, और अब इस मामले को उस सीबीआई को दिया जा रहा है, जिसे जब जो पार्टी विपक्ष में रहती है, वह उसे प्रधानमंत्री का थाना कहती है, या प्रधानमंत्री का तोता कहती है। 
हम सरकार के इस फैसले को एक चतुराई का काम मानते हैं कि उसने कांग्रेस की मांग मान ली, और जांच का अपना जिम्मा खत्म कर लिया। यह भी हो सकता है कि प्रदेश की भाजपा सरकार के हाथ फिरोज सिद्दीकी की मेहरबानी से कुछ ऐसा लगा हो जिससे सीबीआई जांच में कांग्रेस की घरेलू आग साबित हो सके, और एनआईए के मुकाबले सीबीआई इस काम को बेहतर तरीके से कर सके। फिलहाल तीन अलग-अलग जांच, और तीन अलग-अलग राजनीतिक खेमों के बीच फंसी हकीकत पता नहीं कभी सामने आ भी पाएगी या नहीं। 

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