नक्सलियों को तब तक तेजी और ताकत से खत्म करें, जब तक कि..

संपादकीय
18 मार्च 2016  

बस्तर में नक्सलियों के लगाए विस्फोटकों की चपेट में कल एक बच्ची के टुकड़े हो गए, और आज एक ग्रामीण आदिवासी महिला मारी गई। ये दो मौतें इसलिए दिल दहलाती हैं कि ये न तो पुलिस या किसी सुरक्षा बल में थीं, न ही पुलिस की मुखबिर थीं, न ही नक्सलियों के लिए किसी तरह का खतरा थीं, उनका जुर्म बस यही था कि वे बस्तर के उस इलाके में अपने पुरखों के जमाने से रहते आई थीं जहां पर पिछले कुछ दशकों से नक्सलियों ने हिंसा फैला रखी है, और सुरक्षा बलों के साथ उनके टकराव के चलते रोजाना कुछ लोग मारे जाते हैं। कई बार इन मौतों की खबरें आ पाती हैं, कई बार नहीं भी आ पातीं। लेकिन बस्तर के इस आदिवासी इलाके में लोकतंत्र के खिलाफ नक्सलियों का जो हथियारबंद आंदोलन चल रहा है, वह बीच-बीच में बेकसूरों को इसी तरह मारता है। कई बार नक्सली दुनिया से अपनी हरकतों के लिए माफी भी मांगते हैं, और फिर इसी तरह मौत बिखेरने में लग जाते हैं। 
एक तरफ तो पुलिस और सुरक्षा बलों पर यह तोहमत लगते रहती है कि वे बेकसूरों पर ज्यादती करते हैं, उनको मारते हैं, उनके फर्जी आत्मसमर्पण करवाते हैं, और कुछ मामलों में यह तोहमत भी लगी है कि सरकारी वर्दीधारियों ने आदिवासी महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया है। जब किसी इलाके में दशकों तक दो तरफ की बंदूकों का ऐसा टकराव चलता है, तो वहां पर जिंदगी के लिए फिक्र घट जाती है, और लोगों को अपनी बंदूकों के मकसद सबसे ऊपर लगने लगते हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि सरकारी बंदूकधारी लोग फिर भी सरकार, अदालत, और संसद-विधानसभा, मीडिया-मानवाधिकार आयोग जैसी कई संस्थाओं के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और उनके जुर्म साबित होने पर उनको सजा भी मिल सकती है। दूसरी तरफ नक्सली अपने किसी जुर्म के लिए किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है, वे जुर्म का दावा करते हैं, और उनको सजा मिलना भी तकरीबन नामुमकिन होता है। एक तरफ हिंसा से लोकतंत्र को पलटने वाले नक्सली हिंसा और जुर्म का क्लेम करते हैं, और दूसरी तरफ पुलिस या सुरक्षा बलों पर ज्यादती और जुर्म का ब्लेम लगता है। 
अपनी हिंसा की दावे, और पुलिस पर हिंसा की तोहमत लगाने वाले नक्सली जब आम लोगों को इस तरह मारने लगते हैं, तो हमारे सरीखे लोगों को भी अपनी खुद की वह सलाह फिजूल लगने लगती है कि नक्सलियों से बात की जानी चाहिए, और सरकारी बंदूकों के मोर्चे के साथ-साथ बातचीत का मोर्चा भी खुला रखना चाहिए। डेढ़ दशक के बातचीत के न्यौते का अगर आज तक कोई नतीजा नहीं निकला है, और नक्सली इस अंदाज में बेकसूरों की जिंदगी खत्म कर रहे हैं, ग्रामीण इलाकों में जनता के बीच बम लगा रहे हैं, तो आम लोगों के हक कायम रखने के लिए यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह पूरी ताकत से नक्सलियों को खत्म करे। और यह बात हमको ठीक से मालूम है कि ऐसी पूरी ताकत बहुत सी ज्यादतियों के साथ ही इस्तेमाल हो पाती है, और उन ज्यादतियों के खिलाफ, उनके खतरे और आशंकाओं के खिलाफ आज हमारे पास कोई तर्क नहीं बचा है, जब एक छोटी सी बच्ची की बिखरी हुई अतडिय़ों की तस्वीर सामने है। जिस मां को अपनी बच्ची के टुकड़े बटोरने पड़े हों, उसका नक्सलियों पर तो कोई भरोसा हो नहीं सकता, दूसरी तरफ अगर सरकार अब भी अपनी ताकत के इस्तेमाल से इन नक्सलियों को नहीं रोकेगी तो ऐसी सरकार पर भी उसका भरोसा नहीं रहेगा। 
अब अगर ऐसी मौतों के बीच पुलिस नक्सलियों को मारने के लिए अधिक ताकत का इस्तेमाल करती है, तो उस ताकत को तौलकर रोकने और टोकने की कोई समझ हमारे में नहीं है। सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी आम लोगों को बचाने की है, और नक्सलियों को तब तक तेजी से और ताकत से खत्म करना चाहिए, जब तक वे हिंसा छोड़ बातचीत की अहमियत न समझें। लेकिन सरकार ऐसे अभियान में और अधिक बेकसूर आदिवासियों के साथ जुल्म और जुर्म से बचने की पूरी सावधानी बरते। 

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