पवन दीवान के नाम पर विवि? और नहीं, अब और नहीं...

19 मार्च 2016
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के संत-कवि और कांगे्रस-भाजपा की राजनीति में लंबा वक्त गुजारने वाले, भागवत-प्रवचनकर्ता पवन दीवान के गुजरने पर यह तो होना ही था कि उनकी स्मृति में कुछ बनाने की बात उठती। और स्मृति गं्रथ जैसी छोटी बातों से परे अब यह मांग भी सामने आई है कि उनके कर्मस्थान राजिम में एक संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। ऐसी किसी मांग पर विचार करने के पहले, और ऐसी मांग सामने आने की वजह से छत्तीसगढ़ को उन तमाम विश्वविद्यालयों पर एक बार फिर सोच लेना चाहिए जो कि राज्य नया बनने के बाद शुरू किए गए, और इन पन्द्रह बरसों में शायद पन्द्रह नए विश्वविद्यालय यहां शुरू हुए जिनमें दर्जनभर तो सरकारी ही होंगे। 
अपने दस-बारह बरस के अस्तित्व में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर जितने सेमीनार किए, जितने व्याख्यान एक विचारधारा के पत्रकारों और विचारकों के करवाए, शायद उतनी गिनती वहां से निकले हुए काबिल पत्रकारों की भी नहीं है। इतने बरस, शहर से लगी इतनी बड़ी जमीन, और सरकार के करोड़ों रुपये हर बरस, अभी भी शायद इस विश्वविद्यालय में कुछ सौ छात्र-छात्राएं ही पढ़ते हैं, और शायद उनमें भी बहुत से महज नाम के लिए फर्जी हाजिरी से इम्तिहान देने के लिए। जिस पूरे प्रदेश में रविशंकर विश्वविद्यालय अकेला था, वहां पर अब बिलासपुर का विश्वविद्यालय अलग, सरगुजा का अलग, बस्तर का अलग, और अब तो दुर्ग का भी अपना विश्वविद्यालय हो गया है। नतीजा यह है कि आज रविशंकर विश्वविद्यालय पुराने अविभाजित रायपुर जिले का ही विश्वविद्यालय है। जिस तरह कोई कॉलेज खोले जाते हैं, उसी तरह विश्वविद्यालय खोल दिए गए। आज प्रदेश में संगीत-कला का विश्वविद्यालय अलग है जिसमें कुछ सौ छात्र-छात्राएं हैं, और बाहर के कॉलेजों के कुछ हजार छात्र-छात्राएं वहां से इम्तिहान देते हैं। मेडिकल कॉलेजों के लिए एक विश्वविद्यालय बन गया जो चिकित्सा से जुड़ी हुई गैरडॉक्टरी के कोर्स भी देखता है, और इनमें से हर कॉलेज का हाल फटेहाल-दीवालिया है, और इनमें से कुछ भी विश्वविद्यालय के काबू में नहीं हैं। ऐसा ही हाल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय का है, और अब तो कोई खुला विश्वविद्यालय, कोई कामधेनु विश्वविद्यालय, और कोई किसी और बात के लिए बनाया गया विश्वविद्यालय है।
जैसा कि नाम से जाहिर होता है, विश्वविद्यालय का विश्वस्तर से कुछ तो लेना-देना होना चाहिए। आज इन विश्वविद्यालयों के कुलपति एक कॉलेज के मैनेजर की तरह सरकारी दफ्तरों में पर्ची भीतर भेजकर बाहर खड़े रहते हैं। छोटे-छोटे इलाकों के लिए, छोटी-छोटी बातों के लिए नए-नए विश्वविद्यालय खड़े करना सिर्फ उन्हीं लोगों के फायदे का रहता है जो कि कुलपति बनना चाहते हैं, और बड़े-बड़े अहातों में बड़ी-बड़ी इमारतों के नए साम्राज्य के ठेके देना चाहते हैं, किसी-किसी महान नाम पर बनाई गई पीठ पर उसी तरह परजीवी बनकर सवारी करना चाहते हैं जिस तरह बड़े जानवर की पीठ पर बैठे पंछी कीड़े खाते पेट भरते हैं।
अब पवन दीवान के नाम पर एक संस्कृति विश्वविद्यालय की मांग हो रही है, और कोई हैरानी भी नहीं है कि सरकार एक बड़े तबके को खुश करने के लिए ऐसा कोई फैसला भी ले ले, और खासकर इसके कुलपति की कुर्सी पर जिन लोगों का दावा हो सकता है, वे लोग दमखम के साथ इस विश्वविद्यालय के लिए सरकार के पीछे भी लग सकते हैं। लेकिन या तो इन विश्वविद्यालयों का नाम विद्यालय कर देना चाहिए, और इनको जिला स्तर पर खोल देना चाहिए, या फिर विश्वविद्यालय नाम से आज छत्तीसगढ़ में चल रहे औने-पौने संस्थानों को विश्वविद्यालय बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस बार के राज्य बजट में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नई मुनादियों के बजाय पुराने कामों को निपटाने और मजबूत करने पर जोर दिया है। छत्तीसगढ़ में अगले सौ बरस के लिए पर्याप्त विश्वविद्यालय खुल चुके हैं, और जब तक कोई बहुत मौलिक सोच-सूझबूझ न हो, कोई नया दायरा न हो, किसी नए विश्वविद्यालय की बात भी नहीं करनी चाहिए। 

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