उत्तराखंड से उठने वाले कई किस्म के सबक

संपादकीय
26 मार्च 2016  

उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार से नाराज चल रहे वहां के कुछ विधायक पार्टी के मुख्यमंत्री को पलटने की कगार पर खड़े हैं, और दो दिन बाद विधानसभा में शक्ति परीक्षण होने जा रहा है। जिसे लेकर कांग्रेस, उसके बागी, और बागियों का साथ देते दिख रही भाजपा, सभी भारी चौकस हैं, अपने लोगों को सम्हाल रहे हैं, और दूसरों को फोडऩे में लगे हुए हैं। भारतीय राजनीति में दल-बदल और बगावत कोई नई बात नहीं है, और जो राज्य जितने छोटे होते हैं, उनमें दल-बदल से सरकार पलटने का खतरा उतना ही बड़ा होता है। सरकार पलटने के बजाय कई बार पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री को भी पलटा जाता है, और इसके पहले भी कांग्रेस और भाजपा उत्तराखंड और झारखंड में ऐसी राजनीतिक उठापटक को झेल चुके हैं। 
जब किसी राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के माहौल में ऐसी खरीद-बिक्री होती है, या बगावत होती है और सरकार बदलती है, तो छत्तीसगढ़ में एक अलग मजबूत राज्य की तरह दिखता है। अपने पन्द्रह बरस के अस्तित्व में इस राज्य में एक भी बार सत्ता-पलट नहीं हुआ, और सीएम-पलट भी नहीं हुआ। यह एक अलग बात है कि राज्य के पहले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के अजीत जोगी ने विधानसभा में बहुमत होते हुए भी दर्जन भर से अधिक भाजपा विधायकों का दल-बदल करवाकर उनको अपनी सरकार में जगह दी थी या घोषित-अघोषित महत्व दिया था। और यह भी एक अलग बात है कि इसके बाद के चुनाव में इनमें से एक-दो लोग ही वापिस विधानसभा पहुंच पाए थे, और वे एक गैरजरूरी शक्ति प्रदर्शन का सामान बनकर, एक बार इस्तेमाल होकर फिंक गए थे। लेकिन इसके बाद से इस राज्य में सरकार स्थिरता से चलती आ रही है, और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी बिना किसी राजनीतिक चुनौती के, बिना किसी कानूनी परेशानी के, लगातार बने हुए हैं। 
लोकतंत्र में स्थिरता से थोड़े-बहुत नुकसान हो सकते हैं, लेकिन सरकार में स्थिरता से कई किस्म के फायदे भी होते हैं। झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल, और उत्तर-पूर्व के राज्य सरकार को बचाने के लिए, या मुख्यमंत्री को बचाने के लिए जिस तरह की खरीद-बिक्री को झेलते आ रहे हैं, वह बड़े नुकसान के साथ ही हो पाया है। विधायकों को साथ जोड़े रखने के लिए, या उन्हें तोडऩे के लिए किस तरह का खर्च होता है, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है, और कर्नाटक में कुछ बरस पहले भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटाने के लिए भाजपा के ही खदान मालिक मंत्री रेड्डी बंधुओं ने जिस भयानक अंदाज में विधायकों को बाढ़ से तबाह राज्य के बाहर ले जाकर सात सितारा होटलों में रखा था, वह सब मुफ्त में तो हुआ नहीं था। और रेड्डी बंधुओं ने वह पैसा किस तरह से पाया था वह अभी अदालत के कटघरे में उनसे पूछा और उनको बताया जा रहा है। 
छत्तीसगढ़ अपनी राजनीतिक साजिशों और खरीद-बिक्री के बावजूद ऐसे बड़े पैमाने के दल-बदल और सत्ता-पलट से बचा हुआ है। इस स्थिरता से कुछ किस्म की बुराइयां इस राज्य में पनप गई हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की जनता राजनीतिक खरीद-बिक्री को बर्दाश्त करने वाली नहीं है, खासकर बड़े पैमाने पर अगर यहां पर कोई ऐसा करेगा, तो जनता उसे खारिज भी करेगी। फिलहाल उत्तराखंड की राजनीतिक अस्थिरता कांग्रेस के हाथ से एक और राज्य को छीनकर ले जा सकती है, लेकिन इससे कांग्रेस को यह सबक भी लेना चाहिए कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में एक बहुगुणा परिवार की जैसी कुनबापरस्ती वह जमाने से चलाते आ रही है, वह आज उसे खुद भारी पड़ रही है। जिस किसी राज्य में ऐसी उथल-पुथल होती है, उसे देखते हुए बाकी राज्यों को, बाकी प्रदेशों और नेताओं को, पार्टियों की लीडरशिप सबक लेना चाहिए। 

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