हेलमेट को लेकर पुलिस की बददिमागी और बेदिमागी

संपादकीय
28 मार्च 2016

सरकारी अमले की बददिमागी और बेदिमागी के चलते अच्छी भली कोई योजना कैसे तबाह हो सकती है यह देखना हो, तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हेलमेट लागू करवाने का काम देखना चाहिए। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की निजी दिलचस्पी के आधार पर यह अभियान शुरू हुआ, और धीरे-धीरे यह काम चल भी रहा था कि अचानक पुलिस ने चालान करते-करते लोगों को इस तरह मारना-पीटना चालू किया कि हेलमेट के फायदे तो अलग रह गए, सारा माहौल पुलिस के खिलाफ हो गया। पुलिस की हिंसा सड़कों पर सबसे अधिक खुलकर इसलिए दिखती है कि पुलिस वर्दी में रहती है। ऐसे में उसका व्यवहार बाकी लोगों के मुकाबले अधिक काबू में रहना चाहिए, लेकिन जब वह लोगों को लाठियों से पीटने लगे, और उनके कपड़े फाडऩे लगे, तो जनहित में लागू करवाया जा रहा हेलमेट भी बुरा लगने लगता है, और नेतागिरी के मौके की ताक में एक पैर पर खड़े हुए विपक्ष को इसके खिलाफ जुलूस निकालने का मौका मिलता है। राज्य सरकार को यह चाहिए कि राजधानी के पुलिस अमले के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे, जो कि बहुत सी दूसरी बातों को लेकर जनता के बीच बदनामी और नाराजगी भी झेल रहा है। 
लेकिन इन बातों की वजह से मुद्दे की बात किनारे हुई जा रही है कि हेलमेट का क्या होगा? और सवाल हेलमेट का भी नहीं है, वह तो कुल हजार रूपए के भीतर का सामान है, सिर का क्या होगा? आज प्रदेश में एक भी दिन ऐसा नहीं है जब एक से अधिक दुपहिया सवार मारे न जाएं। इन मौतों में से बहुत सी मौतें हेलमेट से रूक सकती हैं। और जैसा कि हम लगातार अपने अखबार में अभियान चलाते हैं, मौतों के आंकड़ों से परे भी सिर पर लगी चोट से होने वाली कई किस्म की दूसरी तकलीफों को देखने की बात है जिससे न सिर्फ जख्मी दुपहिया चालक, बल्कि उसके पूरे परिवार की जिंदगी भी खराब हो जाती है। राजधानी में पुलिस की मार जिन लोगों पर पड़ी है, वे हेलमेट न लगाने की वजह से जांच में फंसे हुए लोग थे। और अब सवाल यह है कि अगर लोग हेलमेट लगाकर चलें, गाडिय़ों पर नंबर ठीक से लिखे रहें, तो न तो जांच की नौबत आए, न बहस की, और न ही तनाव की। लेकिन जब सिलसिला ही गैरजिम्मेदारी और लापरवाही का हो, जब हेलमेट से आधा या चौथाई जुर्माना पटाकर भी लोग बिना हेलमेट लगाए चलने को शान मानें, तो सरकारी अमले का वक्त भी ऐसी जांच में बर्बाद होता है, और एक निहायत गैरजरूरी टकराव खड़ा होता है। हमारा तो यह मानना है कि दुपहिया वाले हर परिवार को घर बैठकर यह तय करना चाहिए कि वे अपने लोगों के सिर फूटने के खतरे के साथ रोज घर से बाहर जाने दें, या कि उसकी हिफाजत करके उन्हें रवाना करें। जब समाज में निजी जिम्मेदारी के प्रति भी जागरूकता इतनी कम है कि लोग सिर अपना नहीं, पुलिस का मान बैठते हैं, और नियमों को तोडऩा उनको बेहतर लगता है, तो सरकार को पूरी कड़ाई से इस नियम को लागू करना चाहिए। 
प्रदेश में कांग्रेस को इस गैरजिम्मेदार बेवकूफी से बचना चाहिए कि वह हेलमेट का विरोध करे। विपक्ष में रहकर नेतागिरी करने का यह मतलब नहीं होता कि सरकार के किसी अच्छे काम का भी विरोध किया जाए। और यह तो सरकार का काम भी नहीं है, पूरे देश में लागू सड़क सुरक्षा का एक नियम है, जिससे छत्तीसगढ़ सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। बार-बार सरकारी अभियान किसी ढिलाई या विरोध के चलते बंद हो जाए, तो उससे उन नियमों का असर भी खत्म होने लगता है। दूसरी तरफ राज्य सरकार को यह भी चाहिए कि अपने अमले की बददिमागी को घटाने के लिए वह चालान की जगहों पर वीडियो रिकॉर्डिंग का इंतजाम करे, जो कि आज के वक्त में बहुत ही सस्ता काम है। कुछ सौ रूपए में आज दिन भर वीडियो रिकॉर्डिंग करने वाले लोग मिल जाएंगे, और पुलिस और जनता के बीच तोहमतों को खड़े होने का मौका भी नहीं मिलेगा। 

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