कन्हैया को जमानत देते हुए जज की नाजायज बातें

संपादकीय
3 मार्च 2016  

दिल्ली हाईकोर्ट की एक जज जस्टिस प्रतिभा रानी ने जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के जमानत के मामले में जमानत देने के साथ-साथ एक बड़ा लंबा फैसला लिखा है, और इस फैसले में देश के पढ़े-लिखे और सोचने-विचारने वाले लोगों के बीच बहुत से सवाल खड़े किए हैं। एक हिन्दी फिल्म उपकार के एक गाने से यह फैसला शुरू करके जज ने राष्ट्रवादी नजरिए से देशद्रोह, राजद्रोह, राष्ट्रवाद जैसे बहुत से पहलुओं को छूते हुए, उन्हें कन्हैया को गिनाते हुए जमानत दी है। जमानत के मामले में इस असाधारण लंबे फैसले में जस्टिस प्रतिभा रानी ने आखिर में जाकर यह जरूर लिखा है कि उनकी लिखी हुई बातों को कन्हैया के खिलाफ दायर किए गए देशद्रोह के मामले में आरोपों पर उनकी टिप्पणी न समझा जाए, और वे ये बातें महज जमानत के संदर्भ में लिख रही हैं। लेकिन इस लंबे जमानत-फैसले के आखिर में जब जज को यह सफाई देनी पड़ रही है, तो जाहिर है कि उनको खुद को दस्तखत करने के ठीक पहले यह शक जरूर रहा होगा कि उनकी टिप्पणियों को लोग कन्हैया पर लगाए गए देशद्रोह के आरोपों पर उनके विचार मानेंगे। और हम उनके शक से पूरी तरह सहमत हैं क्योंकि जज ने देशभक्ति और देश के लिए कुर्बानी जैसे पहलुओं पर जो लंबी-लंबी टिप्पणियां अपने विचारों की की हैं, वे कन्हैया या उसके साथियों को कुसूरवार ठहराने जैसी लगती हैं। अदालत का यह फैसला बड़ा लंबा है, और उसकी बातों को यहां फिर से गिनाना ठीक नहीं है, लेकिन जब इस फैसले में खुद जज ने इन बातों को नोट किया है कि मीडिया में ऐसा सामने आया है कि कन्हैया के नाम से जोड़े गए देशद्रोह के वीडियो में छेडख़ानी की गई है, तो फिर कन्हैया की दी गई सफाई, और दिल्ली पुलिस का यह मानना कि उसके पास कन्हैया के देशद्रोह के नारे का कोई वीडियो नहीं है, उसके महत्व को कम आंकते हुए कन्हैया को देशभक्ति का एक बड़ा लंबा प्रवचन देकर जज ने कन्हैया को एक किस्म से कुसूरवार मान लिया है। हम इस फैसले के आखिर में जज की दी गई सफाई को बहुत ही नाकाफी मानते हैं, और हमारा मानना है कि इस मामले में जज की कही ये बातें निहायत ही गैरजरूरी थीं, और नाजायज थीं। 
अदालत के फैसलों में कई बार जज गैरजरूरी दर्शनशास्त्र पर उतर आते हैं, कई बार वे देशभक्ति या राष्ट्रवाद पर उतर आते हैं, और ऐसी बातों से फैसले की साख और उसका वजन दोनों ही घट जाते हैं। इस मुद्दे पर लिखते हुए हमें दो दिन पहले अमरीका के सुप्रीम कोर्ट के एक जज की खबर याद आती है जिसमें जज ने एक सवाल पूछा तो वह पूरे अमरीका में एक खबर इसलिए बन गया कि इस जज ने दस बरस बाद अदालत में मुंह खोला था। दस बरस पहले एक मामले में इस जज ने एक सवाल पूछा था, और उसके बाद अब दूसरी बार। भारत की अदालतों में मामलों की सुनवाई के दौरान जज जो जुबानी टिप्पणियां करते हैं, वे अदालती फैसले का हिस्सा नहीं बनतीं, और न ही उन टिप्पणियों को कोई चुनौती दी जा सकती है। और अदालती कार्रवाई के दौरान जजों का ऐसा बड़बोलापन उनके रूझान को खुलकर बताता है, और आमतौर पर खबरों की सुर्खियां भी बनता है। हमारा मानना है कि अदालती फैसलों में जजों को गैरजरूरी बातें नहीं करना चाहिए, और इसकी एक बहुत ही जलती हुई मिसाल कन्हैया की जमानत पर फैसला है। 
न तो हाईकोर्ट के जज को, और न ही सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को किसी आरोप के प्रमाणित होने के पहले आरोपी को देशभक्ति सिखाने का हक है, और न ही किसी जज की कुर्सी पर बैठकर किसी को राष्ट्रवाद का प्रवचन देना चाहिए। भारत के ही बहुत से महान लोग राष्ट्रवाद के खिलाफ बहुत कुछ बोल चुके हैं, और दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में यह अच्छी तरह दर्ज है कि किस तरह सबसे बड़े अपराधी दौड़-दौड़कर राष्ट्रवाद और देशभक्ति की आड़ में छुपते हैं। जेएनयू में छात्रों ने जो नारे लगाए हैं, उन पर तो उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं, गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन दूसरी तरफ इन छात्रों के वीडियो के साथ छेडख़ानी करके जो देशविरोधी नारे जोड़े गए, और जिस तरह कुछ लोगों ने उसे सोशल मीडिया पर और कुछ चैनलों ने टीवी पर ऐसे फर्जी वीडियो फैलाए, उन पर अगर जज ने कुछ कहा होता तो बेहतर होता। जब जाहिर तौर पर जालसाजी करके छात्रों को बदनाम किया जा रहा है, उन्हें फंसाया जा रहा है, और देश में एक हिंसक राष्ट्रवाद को फैलाकर बेकसूर दिखते लोगों को देशद्रोही कहकर बदनामी की जा रही है, तो जज को अगर किसी को नसीहत देनी थी, तो ऐसे जालसाजों और षडय़ंत्रकारियों को देनी चाहिए थी। पहली नजर में जो कन्हैया बेकसूर दिखता है, जिसके खिलाफ कोई सुबूत नहीं है, जिसने खुलकर यह कहा है कि उसे भारत के संविधान पर भरोसा है, उसे जमानत देते हुए जज ने जिस तरह की देशभक्ति की शर्तें लादी हैं, वे तो किसी को कुसूरवार ठहराने के बाद ही लादी जा सकती हैं। 
हमारा मानना है कि इस फैसले की नाजायज बातों के खिलाफ वकीलों को बड़ी अदालत तक जाना चाहिए, और इन बातों को गैरजरूरी और गैरकानूनी करार करवाने की कोशिश करनी चाहिए। अदालत को यह हक नहीं है कि किसी भी नागरिक के कुसूरवार ठहराए जाने के पहले उसे कुसूरवार मानते हुए उसे कोई नसीहत दे। और हाईकोर्ट की इस जज के सामने तो कन्हैया पर लगाए गए आरोपों की सुनवाई भी नहीं चल रही है, यह सुनवाई तो नीचे की अदालत में चलेगी, और वह अदालत हाईकोर्ट जज की ऐसी बातों से प्रभावित भी हो सकती है। जजों को गैरजरूरी बोलने से बचना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि दिल्ली के कोई न कोई जागरूक वकील इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, और हाईकोर्ट जज को फटकार लगवाने की कोशिश करेंगे। 

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