सोशल मीडिया पर लापरवाही या बदनीयत छुपाए नहीं छुपती...

21 मार्च 2016
संपादकीय

फेसबुक पर अभी एक ऐसे कमोड की तस्वीर किसी ने पोस्ट की है जिसके भीतर से रौशनी आते दिख रही है, और इस मजाकिया पोस्ट में लिखा गया है कि इसके इस्तेमाल पर यह कम्प्यूटर-नियंत्रित कमोड तुरंत ही पखाने का वैज्ञानिक विश्लेषण करके नतीजों को  उनके फेसबुक और ट्विटर पेज पर डाल देगा। और आज हकीकत कुछ इसी तरह की है कि लोग अपने पल-पल और अपनी रग-रग की खबरें फेसबुक पर डाल रहे हैं। इनमें से कुछ खबरें, कुछ तस्वीरें, और कुछ बातें तो बाकी लोगों के काम की हो सकती हैं, लेकिन लोग जब यह मानकर चलते हैं कि उनके बहुत करीबी लोग ही इन्हें देखेंगे, और देखकर मजा लेंगे, और बात आई-गई हो जाएगी, तो वैसा होता नहीं है। 
आज शादी-ब्याह की बातचीत हो, नौकरी पर रखना हो, किसी को कर्ज देना हो, या किसी सामाजिक संस्था की तरफ से स्कॉलरशिप देनी हो, इन तमाम बातों के लिए लोगों के मिजाज, उनके रूझान, उनके चाल-चलन, और उनकी संगत, इन सबका अंदाज लगाने के लिए लोग शुरुआत उनके फेसबुक पेज से ही करते हैं। किसी शादी के लिए रिश्ता आया, तो लोग फेसबुक पेज पर जाकर उसकी हर तस्वीर देख लेते हैं, दोस्तों की लिस्ट किस तरह की है, वह भी देख लेते हैं, और तस्वीरों पर दोस्तों के कमेंट कैसे रहते हैं, उनको भी बारीकी से पढ़ लेते हैं। और आज कम्प्यूटर-फोन में सहूलियत इतनी हो गई है कि लोग स्क्रीनशॉट लेकर रख लेते हैं, ताकि बाद में मिटाया  भी जाए, तो भी सुबूत बना रहे। यह सब तो असल और सच की बात है, लोग डिजिटल छेडख़ानी करके स्क्रीनशॉट में तरह-तरह के झूठ भी गढ़ देते हैं। 
बहुत से लोग सरकारी नौकरी करते हुए राजनीतिक और साम्प्रदायिक मुद्दों पर बहुत खतरनाक किस्म की बातें लिखते हैं, या दूसरों की लिखी हुई बातों को अपने पेज पर पोस्ट करते हैं। भारत में सरकारी सेवा-शर्तों में एक खतरनाक शर्त यह भी है कि किसी अधिकारी-कर्मचारी का आचरण उसकी नौकरी और कामकाज, पद की जिम्मेदारी की प्रतिष्ठा घटाने वाला न हो। छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय में सरकारी अफसरों के सोशल मीडिया पन्नों को लेकर विवाद छिड़ा भी है, लेकिन बात अधिक दूर तक नहीं गई है। लेकिन इन तमाम निजी खतरों से परे यह समझना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया की संभावनाएं क्या हैं, सोशल मीडिया पर मौजूदगी के साथ कौन सी सामाजिक जिम्मेदारी जुड़ी हुई है। 
अभी कोलकाता में हुए भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के दौरान स्टेडियम में भारतीय राष्ट्रगान गाने वाले अमिताभ बच्चन को लेकर सोशल मीडिया पर दसियों लाख लोगों ने ट्वीट किए और लिखा कि उन्होंने इसके लिए चार करोड़ रूपए लिए। दो दिन तक यही चलते रहा, इसके बाद सौरभ गांगुली ने यह साफ किया कि अमिताभ ने एक धेला भी नहीं लिया और अपने सफर का, अपने होटल का खर्च भी खुद उठाया। अब इन दो दिनों में जिन लोगों ने अमिताभ बच्चन पर हमले किए, और ओछी बातें लिखीं, उनकी इज्जत हमारी नजरों में वैसे भी घट गई। लेकिन आज हमसे भी अधिक चौकन्नी नजरों वाले लोग दुनिया में मौजूद हैं जो कि इंटरनेट पर लोगों की जांच-पड़ताल के काम में लगे रहते हैं। इसलिए लोगों को न सिर्फ अपनी निजी जिंदगी की बातों को पोस्ट करते हुए, बल्कि दूसरी खबरों को, दूसरे आरोपों को पोस्ट करते हुए भी यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे जिसकी इज्जत को तबाह करना चाहते हैं, या जिसकी इज्जत को बढ़ाना चाहते हैं, वह मकसद तो बातों के सच होने पर ही पूरा हो सकेगा, लेकिन वह मकसद पूरा नहीं भी होगा, तो भी झूठ पोस्ट करने से ऐसा करने वालों की इज्जत तो तबाह हो ही जाती है। लोग अपनी विश्वसनीयता खो बैठते हैं, और उसके साथ-साथ उस विचारधारा या मुद्दे की विश्वसनीयता भी खत्म हो जाती है जिसे कि वे बढ़ाना चाहते हैं। 

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