मोदी और किसी की न सुनें, चेतन भगत की तो सुन लें...

संपादकीय
4 मार्च, 2016

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की जमानत पर रिहाई के बाद जेएनयू कैम्पस में उसका एक घंटे का भाषण जब देश के बहुत से समाचार चैनलों ने सबकुछ रोककर लगातार जीवन्त दिखाया, तो मीडिया के रूख से देश के माहौल का पता भी लगा, और इस भाषण को सुनने वालों को भी देश के माहौल का पता लगा। कल से न सिर्फ सोशल मीडिया पर, बल्कि पूरे देश के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी कन्हैया इस तरह से छाया हुआ है कि वह मोदी सरकार के खिलाफ एक चुनौती बनकर आया नौजवान है। हालांकि इस माहौल का हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि आज कोई चुनाव सामने नहीं है, और कन्हैया भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा होने के बावजूद अभी कोई राजनीतिक चुनाव प्रचार नहीं कर रहा है। लेकिन लोगों को यह याद रखने की जरूरत है कि इसी तरह एकदम फुटपाथ से उठकर अरविंद केजरीवाल नाम का एक नौजवान आया था, और दिल्ली की राजनीति पर छाया था। कुछ महीने पहले तक जो कुछ भी नहीं था, उसने दिल्ली से कांग्रेस और भाजपा दोनों को जिस कदर, जिस हद तक बेदखल और बेघर कर दिया, उसने भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास गढ़ा था। आज जेएनयू से एक नई लीडरशिप ऐसी सामने आई है जिसे लेकर मोदी के भक्त चेतन भगत जैसे घोर दक्षिणपंथी और हिन्दूवादी लेखक ने ट्विटर पर यह लिखा है-जब प्रधानमंत्री की मन की बात के मुकाबले जेएनयू के एक नौजवान छात्र की स्पीच की अधिक चर्चा हो रही हो, तो आपको यह पता लग जाता है कि पीएम का नौजवानों से संपर्क खत्म हो रहा है। भाजपा ने भारी रोजगार पैदा करने के लिए आर्थिक सुधारों का वायदा किया था, लेकिन वह भी यूपीए जैसी लुभावनी शैली पर उतर आई है। चुनावों के पहले ऐसे बेचैन नौजवानों की बेचैनी क्या असर लाएगी? हार्दिक पटेल, कन्हैया कुमार, नौजवान ऐसे नए नेता के लिए बेचैन हो रहे हैं जो उनसे जुड़ सके, उनसे बात कर सके, और उनके सवाल झेल सके। सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही?
भारत की राजनीति में छात्र आंदोलन का इतिहास नया नहीं है। इंदिरा गांधी के खिलाफ आपातकाल के पहले जिस तरह से देश के छात्र सामने आए थे, उसने आपातकाल का आतंक भी नकार दिया था। और इमरजेंसी के बाद जो चुनाव हुए थे, उनमें नेहरू की बेटी इंदिरा को खारिज करते हुए शरद यादव जैसे छात्र नेताओं ने जनता पार्टी की सरकार बनवाई थी। जेएनयू देश की राजनीतिक चेतना का एक केंद्र रहा है, और कल जेएनयू में एक नौजवान ने जिस तरह का माहौल खड़ा किया है, उसने एक किस्म से भारतीय लोकतंत्र की दीवारों पर एक चुनौती लिख दी है। अब जो लोग इसे न पढऩा चाहें, उनके भुगतान करने का समय आने वाले चुनाव रहेंगे। और जो लोग आज यह कह रहे हैं कि विश्वविद्यालयों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, केंद्रीय मंत्री वैंकैय्या नायडू जैसे लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि इसी जेएनयू में वामपंथियों के बाद सबसे बड़ा छात्र संगठन खुद भाजपा का है। एबीवीपी नाम के भाजपा के छात्र संगठन की लगातार सक्रियता को अनदेखा करके आज अगर भाजपा के कुछ नेता जेएनयू से राजनीति से बाहर करने की बात कह रहे हैं, तो वे एक कन्हैया को खारिज करने के लिए ऐसा कह रहे हैं, वरना जिस लोकतंत्र में 18 बरस की उम्र में वोट देने का हक है, वोट देने का जिम्मा है, उस लोकतंत्र में विवि के छात्रों को राजनीति से परे क्यों रखा जा सकता है, और कैसे रखा जा सकता है? 
आज केंद्र सरकार ने दिल्ली पुलिस का इस्तेमाल करते हुए जेएनयू के वामपंथी रूझान वाले छात्रों पर देशद्रोह के जो फर्जी केस बनाए हैं, और मीडिया के एक हिस्से के मार्फत जो गढ़े गए टेप फैलाए गए हैं, वह काम मोदी सरकार को भारी पडऩे वाला है। देश के छात्रों को इस तरह थोक में निशाने पर लेना ठीक नहीं है। अभी एक दलित छात्र की आत्महत्या को लेकर, दलित प्रताडऩा को लेकर हैदराबाद विवि उबल ही रहा है, और जेएनयू को देशद्रोही साबित करने की यह साजिश गढ़ी गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के सलाहकारों को और किसी की न सही, अपने ही परिवार के माने जाने वाले चेतन भगत की बात को तो सुन लेना चाहिए। 

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