यह हैवानियत नहीं इंसानियत ही है...


संपादकीय
29 मार्च 2016
मध्यप्रदेश के जबलपुर से एक रेलगाड़ी का एक ऐसा वीडियो आया है जिसमें डिब्बे की खिड़की से बाहर टांगकर एक बेबस नौजवान को पीटा जा रहा है। खबर है कि इसने साथ के किसी मुसाफिर की बोतल से पानी पी लिया था, और उस मुसाफिर ने अपने साथियों के साथ मिलकर इसे ऐसी सजा दी। खबर में यह भी है कि इसे 272 किमी तक ऐसे ही टांगकर रखा गया था। इस खबर को देखें तो लगता है कि अंधेरे में, या बंद कमरे में छुपकर जुर्म करने वालों से परे खुले में ऐसा भयानक अपराध करने वाले लोग बिल्कुल अलग किस्म के मुजरिम हैं। और इनकी क्या सजा हो सकती है, यह आने वाला वक्त बताएगा। 
कहीं पर दो-चार बरस के छोटे बच्चों से बलात्कार होता है, कहीं पर किसी बेबस अकेली महिला से एक दर्जन लोग बलात्कार करते हैं, और कहीं पर मानसिक रूप से विचलित किसी बच्चे या बच्ची से ज्यादती होती है। सड़कों पर देखें तो पुलिस की हिंसा बेहिसाब जारी है, और उसकी तस्वीरें अब वीडियो और टीवी की मेहरबानी से इस तरह सामने आने लगी हैं कि सरकार या अदालत को उसपर कार्रवाई करनी ही पड़ती है। ऐसी खबरों को लेकर यह चर्चा होती है कि यह अमानवीय काम हुआ है। हकीकत तो यह है कि यह सब मानवीय काम ही है। यह मानव के स्वभाव का एक हिस्सा है, और जब यह इतना हिंसक हो जाता है, इतना शर्मनाक हो जाता है कि इंसान अपने नाम के साथ उसे जुड़े देखना नहीं चाहते, तो उसे हैवानियत का काम, या अमानवीय काम बता दिया जाता है। 
जब तक इंसान यह मंजूर नहीं करेंगे कि ऐसे तमाम जुर्म, और ऐसी तमाम हिंसा उसकी ही अपनी सोच का एक हिस्सा है, तब तक उनके सुधरने का सिलसिला शुरू भी नहीं हो पाएगा। सुधार के लिए सबसे पहले जरूरत होती है खामी को परखने की, मानने की, और फिर सुधार की नीयत की। अगर कैंसर की शिनाख्त न हो, उसके इलाज की नीयत न हो, और इलाज की सहूलियत न हो, तो वह बढ़ते ही चलता है। इसलिए इंसानों को यह मानना ही पड़ेगा कि भयानक हिंसा भी उनके ही भीतर का एक हिस्सा है, और उससे उबरना उनके लिए एक चुनौती है। इसके बाद लोगों को अपने भीतर की हिंसा पर पार पाना आना चाहिए, तब कहीं जाकर नौबत सुधर पाएगी। 
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