प्रशांत किशोरों को लेकर जनमत पर कुछ सवाल

7 मार्च 2016
संपादकीय
पिछले कुछ दिनों से हवा में यह खबर है कि एक वक्त मोदी, और फिर नीतीश कुमार को चुनावी जीत दिलाकर अपनी राजनीतिक महारत साबित कर चुके प्रशांत किशोर अब राज्यों के चुनाव में कांगे्रस के रणनीतिकार बनने जा रहे हैं। उनका राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा है, सिवाय एक पेशेवर आदमी के जो कि उसे दिया गया चुनावी सर्वे, तैयारी, या प्रचार का जिम्मा निभाता है। और कांगे्रस के नेताओं के साथ अभी हुई प्रशांत किशोर की बैठक से ऐसा लगता है कि यह पार्टी शायद पहली बार अपने कुनबाई-करिश्मे के अतिआत्मविश्वास को कुछ किनारे पर रखकर चुनाव को चुनाव की तरह भी लड़ सकती है। हमको वैसे तो कांगे्रस या किसी और पार्टी की जीत या हार से कोई अधिक लेना-देना नहीं है, और हमारी सारी परवाह पार्टियों की रीति-नीति, और उनके सिद्धांतों को लेकर रहती है। लेकिन भारतीय राजनीति में पेशेवर चुनावी-रणनीतिकार आने से अब यह सोचने की जरूरत महसूस हो रही है कि क्या यह लोकतंत्र ऐसी पेशेवर तैयारी से किसी आकार में ढाला जा सकता है? क्या लोगों का रूझान पहाड़ी नदी को सरकारी नहर में तब्दील करने की तरह बदला जा सकता है? और अगर ऐसा किया जा सकता है तो फिर क्या इस लोकतंत्र में लोगों के वोट को सचमुच ही उतना वजनदार मानना ठीक है जितना कि चुनाव आयोग की वोटिंग मशीनें मानती हैं? 
अभी देश की हवा में जेएनयू से निकला यह नारा भी तैर रहा है कि कितने फीसदी लोगों ने किनको वोट दिया। जोश में थोड़ा सा फिसलकर जेएनयू छात्र नेता कन्हैया ने यह कह दिया कि 69 फीसदी लोगों ने मोदी के खिलाफ वोट दिया था। यह आंकड़ा गलत है क्योंकि मोदी के लिए चाहे 31 फीसदी लोगों ने ही वोट दिया, लेकिन घर बैठे लोगों के वोटों को मोदी के खिलाफ गिन लेना एक गलत गिनती है। ऐसी ही गिनती पर असर डालने के लिए प्रशांत किशोर जैसे लोग मोदी के गुजरात और नीतीश के बिहार में चुनाव-संचालन की अहमियत साबित कर चुके हैं। अब हमारा यह सोचना है कि देश में सबसे बड़ा फैसला तो घरघुस्सू मतदाता करते हैं जो वोट डालने वालों की गलत पसंद के मुकाबले भी अधिक गुनहगार होते हैं। दूसरी बात यह कि भारतीय लोकतंत्र में जात के नाम पर वोटों को बरगलाने की, धर्म के नाम पर लोगों भड़काने की, और नगद देकर वोट खरीदने की बात तो पहले से चली आ रही है। दिग्विजय सिंह जैसे लोग अपने खुद के चुनाव हारने के पहले यह दावा करते आए थे कि चुनाव सरकार के काम से नहीं, चुनाव के मैनेजमेंट से जीता जाता है। अब अगर कांगे्रस के लिए प्रशांत किशोर कोई ऐसा मैनेजमेंट कर सकते हैं जो कि इस टाईटैनिक को फिर से तैरा सके, तो फिर लोकतंत्र का मतलब क्या रह जाएगा? क्या भारत के चुनाव अमरीकी राष्ट्रपति के चुनावों की तरह के हो जाएंगे, जिनमें ड्रेस डिजाइनरों से लेकर एक-एक शब्द लिखने वालों तक, और मीडिया को मैनेज करने वालों तक का काम पेशेवर लोग भुगतान लेकर करते हैं? अगर ऐसा होता है, और ऐसे ही आसार दिख रहे हैं, तो भारतीय लोकतंत्र में जनमत नाम का शब्द इश्तहारों के झांसे में आने वाले ग्राहक नाम के शब्द में तब्दील कर देना चाहिए। प्रशांत किशोर जैसे लोग मार्केट सर्वे करने वाले, विज्ञापन बनाने वाले, और बिक्री बढ़ाने वाले बाजार के पेशेवरों का मिला-जुला पैकेज सरीखा साबित हो रहे हैं। तो क्या अब भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक सोच, राजनीतिक साख, और नेताओं की राजनीतिक छवि इसी तरह की रह गई है जिसे कि एक बाजार के ब्यूटी पार्लर में ले जाकर अधिक बिकाऊ बनाया जा सके? 
हम चुनावों में पेशेवर समझ, जनमनोविज्ञान के इस्तेमाल, और जनरूझान को मोडऩे की कोशिशों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन एक फिक्र यह है कि क्या लोकतंत्र में जनमत बस इतना ही गंभीर है कि उसे ऐसे क्रीम-पावडर से रिझाया जा सकता है?

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