...एक हाथ मनोज कुमार को सम्मान दिया, दूसरे हाथ लिया

संपादकीय
5 मार्च 2016  
पिछले कई दिनों से हिन्दुस्तान राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह की सुर्खियों में इस तरह घिरा हुआ था कि मानो लोग इन्हीं दो चीजों को पीसकर, पकाकर खा रहे हों, और पेट भर रहे हों। फिर दो दिन पहले जेल से छूटे जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया के घंटे भर के भाषण में दिल से निकली खरी-खरी बातों ने देश का मन इस तरह जीता, कि कन्हैया और जेएनयू के विरोधी सहम गए। सड़कों और सोशल मीडिया पर कन्हैया की जीभ काटने के फतवे देना एक अलग बात है, लेकिन सरकार के हाथ में कुछ और बातें भी होती हैं जिनका इस्तेमाल ध्यान बंटाने के लिए, लोगों को लुभाने के लिए, और सरकार की अपनी छवि की मरम्मत करने के लिए किया जा सकता है। ऐसा ही एक इस्तेमाल कल हुआ जब देशभक्ति की फिल्मों में भारत कुमार के रूप में शोहरत पाए हुए हिन्दी फिल्म अभिनेता मनोज कुमार को देश का सबसे बड़ा सरकारी फिल्म सम्मान, दादा साहब फाल्के अवॉर्ड देने की घोषणा हुई। फिल्मों में पूरी जिंदगी के योगदान पर दिया जाने वाला यह अवार्ड पिछली करीब आधी सदी में दर्जनों लोगों को मिल चुका है, लेकिन अभी यह कैसा विचित्र संयोग है कि कन्हैया को जमानत देते हुए, उसे देशभक्ति का सबक सिखाने के लिए हाईकोर्ट ने अपने लंबे फैसले की शुरुआत ही मनोज कुमार की फिल्म उपकार के गाने से की थी, और दो दिन के भीतर केन्द्र सरकार ने उन्हें यह सबसे बड़ा अवॉर्ड दिया है। 
एक के बाद एक बहुत सी फिल्मों में मनोज कुमार ने देशभक्ति के किरदार किए थे, और भगत सिंह से लेकर मौजूदा जमाने के सामाजिक क्रांतिकारी की भूमिका करते-करते उन्हें भारत कुमार ही कहा जाने लगा था। उन्हें फिल्म उद्योग के बहुत से पुरस्कार और सम्मान उनकी फिल्मों को लेकर मिलते रहे, और उन्होंने उनके लिए लिखी गई खास देशभक्ति की भूमिकाओं, देशभक्ति के गानों, देशभक्ति की कहानियों के बीच अपने को इस तरह रखा था कि वे देशभक्ति की प्रतिमा की तरह बन चुके थे। इसलिए आज यह बात केन्द्र सरकार के लिए सहूलियत की भी है कि उसका सबसे बड़ा फिल्म सम्मान मनोज कुमार को मिले। जैसा कि किसी भी आम बाजारू या कमाऊ फिल्म में होता है, लोगों की देशभक्ति सतह पर तैरते हुए दिखाई जाती है, और लोग देशभक्ति का यह अतिसरलीकरण ही देशभक्ति का अकेला तरीका मान बैठते हैं, और यहां तक कि एक जमानत के फैसले में ऐसी फिल्मों के गाने दर्शनशास्त्र की तरह लिखने लगते हैं। 
सरकारी सम्मानों के लिए हमारे मन में फूटी कौड़ी का भी कोई सम्मान नहीं है। और यह मनोज कुमार को मिले, जो कि एक बार चुनावी राजनीति में उतरकर शिवसेना में शामिल हो गए थे या किस वामपंथी को मिले, उससे हमारी सोच पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि देश का हर सरकारी सम्मान और पुरस्कार बंद कर देना चाहिए, और उसके पीछे हमारा यह तर्क रहते आया है कि जो सरकारें वोटों की मोहताज रहती हैं, वे किसी ईमानदारी के साथ कोई सम्मान या पुरस्कार नहीं बांट सकतीं। यही बात आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार को देश का सबसे बड़ा फिल्म सम्मान देने पर भी लागू होती है। कहने के लिए तो यह सम्मान तय करने के लिए एक निर्णायक मंडल है, लेकिन इसके नामों को देखें तो यह जाहिर है कि किस रूझान वाले लोग हैं। इसमें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, सलीम खान, नितिन मुकेश और अनूप जलोटा हैं, और इनमें से नितिन मुकेश के अलावा बाकी सारे लोग तो खुलकर भाजपा या मोदी, या हिन्दुत्व से जुड़े हुए लोग हैं। 
यह केन्द्र सरकार का अपने आपको देशभक्त बताने का ही एक फैसला है। हर सरकार को देशभक्त होना ही चाहिए, और हर नागरिक को भी। लेकिन देशभक्ति की जिस फिल्मी तस्वीर का प्रतिनिधित्व मनोज कुमार करते हैं, वह कोई गंभीर देशभक्ति न होकर फिल्मी अंदाज की एक देशभक्ति है, और इसीलिए हमको यह लगता है कि चाहे-अनचाहे केन्द्र सरकार एक हाथ यह सम्मान देते हुए, दूसरे हाथ खुद सम्मान ले रही है। 

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