हमको भी समाजवादी-सुगंध मिल जाए, तो बात बन जाए

संपादकीय
16 मार्च 2016  

उत्तरप्रदेश के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनको पारिवारिक विरासत में मिली मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आने के बाद से अपने परिवार का और भी गैरसमाजवादी राजनीतिक विस्तार कर रहे हैं, और लखनऊ से लेकर दिल्ली तक पूरी पार्टी उनके घरबार की तरह ही चल रही है। लेकिन समाजवादी पार्टी होने का नाम सार्थक करने के लिए वे और उनके पिता कई तरह की हरकतें करते हैं। कभी वे अपने गांव के गरीबों को दिखाने के लिए करोड़ों के खर्च वाले फिल्म स्टार कार्यक्रम को करवाते हैं, तो कभी अपने गांव में अंतरराष्ट्रीय स्तर का हवाई अड्डा बनवाकर, राष्ट्रीय स्तर की सड़क बनवा लेते हैं, फिर चाहे सीएजी ऑडिट आपत्ति करता रहे। 
अब अखिलेश की ताजा करामात है समाजवादी इत्र जारी करना। उन्होंने अपनी सरकार के चार बरस पूरे होने पर समाजवादी-सुगंध नाम से परफ्यूम जारी किया और कहा- कई मौकों पर मैंने कहा है कि यूपी की नदिया समाजवादी हैं, हमारी नदिया किसी तरह का भेदभाव नहीं करती, किसी तरह समाजवादी-सुगंध सपा सरकार की एक कोशिश है। उन्होंने कहा कि ये इत्र पार्टी के लोगों और जनता को एक साथ जोड़ेगा और समाजवाद का मैसेज बड़े पैमाने पर फैलाएगा। ये चार अलग-अलग खुशबुओं वाले इत्र उत्तरप्रदेश के चार शहरों, काशी, कन्नौज, आगरा, और लखनऊ के नाम पर रखे गए हैं। अखिलेश का कहना है कि ये समानता, उन्नति, और कार्यकुशलता का संदेश देंगे, और समाजवाद को फैलाएंगे। 
अभी तक जो डरावनी विज्ञान कथाएं आती थीं, उनमें कई बार इस तरह के मामले लिखे जाते थे कि किसी खुशबू से, या किसी और तकनीक से लोगों का ब्रेनवॉश किया जाए। लेकिन ब्रेनवॉश करने का यह समाजवादी तरीका बहुत ही अनोखा और मौलिक है। आज तक किसी ने राजनीतिक दल की सोच की खुशबू वाले इत्र की कल्पना भी नहीं की होगी। और वैसे अखिलेश का यह काम बहुत गलत भी नहीं है, क्योंकि उनके परिवार, उनके पिता, उनके नेता लोगों की बातों से इतनी बदबू फैलती है, उनकी पार्टी और सरकार के कारनामों से इतनी बदबू फैलती है कि उसे आम फिनाइल से खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए ऐसा इत्र बहुत जरूरी है, तभी समाजवाद की खुशबू कायम रह सकेगी। अब यह खोज और शोध की बात है कि भारत में समाजवादी सोच के सबसे बड़े नेता रहे डॉ. राममनोहर लोहिया इन खुशबुओं का इस्तेमाल करते थे या नहीं? अखिलेश सरकार द्वारा बाजार में इनको उतारने के पहले भी लोहिया जरूर इनका इस्तेमाल करते रहे होंगे, तभी उनकी सोच समाजवादी हो पाई थी, और विकसित हो पाई थी। 
अब हो सकता है कि भारत में बाकी राजनीतिक दल भी अपनी-अपनी पसंद की खुशबुओं को बाजार में उतारें, और उनके इलाकों में होने वाले चुनावों के पहले लोगों को रिझाने की कोशिश करें। लेकिन बंगाल जैसे राज्य में एक दिक्कत हो सकती है कि सभी पार्टियां मछलियों की गंध के इत्र उतारना चाहें, या फिर यह भी हो सकता है कि वामपंथी पार्टियां गरीब मजदूरों के पसीने की गंध वाले इत्र लाएं। बंगाल में कांग्रेस हो सकता है कि आपातकाल में मारे गए लोगों के लहू की गंध का इत्र लाकर मतदाताओं को चेतावनी देना चाहे कि वोट न दिया तो...। पंजाब में हो सकता है कि अकाली दल तरह-तरह के नशों की गंध के इत्र लाए, हैदराबाद में ओवैसी बिरयानी के गंध का इत्र ला सकते हैं, और गोवा की पार्टियां नारियल या काजू से बनी देसी दारू की गंध अपने-अपने नाम करने के लिए चुनाव आयोग जा सकती हैं। 
दुनिया के बाकी देश भी अखिलेश यादव की सोच सीखने के लिए लखनऊ पहुंच सकते हैं। खासकर अमरीका में अभी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने की कोशिश में लगे डेविड ट्रंप अफगानिस्तान और इराक, सीरिया और फिलीस्तीन से मुस्लिमों का लहू लाकर उसके गंध का इत्र अपने धर्मान्ध समर्थकों के बीच बांट सकते हैं। और पाकिस्तान यह सोच सकता है कि शाहिद अफरीदी को, और भारत यह सोच सकता है कि कन्हैया को किस गंध का इत्र देकर फिर राष्ट्रभक्त बनाया जाए। 
फिलहाल हम उम्मीद करते हैं कि कोई लखनऊ से समाजवादी-सुगंध नाम के इत्र का बक्सा लाकर हमें भी भेंट करे, ताकि समाजवाद की कुछ सोच हममें भी विकसित हो सके। 

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