मरने के लिए छोड़ दी जाती हैं कैंसर की शिकार बेटियां, और इलाज महज बेटों को नसीब!

6 मार्च 2016
संपादकीय

दो दिन बाद हिंदुस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने में लग जाएगा, और आज अभी जब हम यह लिख रहे हैं, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिल्ली में निर्वाचित महिलाओं के एक कार्यक्रम में बोल रहे हैं। उनके पहले कल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इसी कार्यक्रम में जाकर इस बात पर अफसोस जाहिर करके आ गए हैं कि भारत में अब तक महिला आरक्षण विधेयक पास नहीं हो सका है। यह एक अलग बात है कि पिछली आधी सदी में प्रणब मुखर्जी लगातार केंद्र सरकार की सत्ता, या कुछ अरसा विपक्ष में रहे हैं, और उनकी पार्टी ने कभी भी ईमानदारी से महिला आरक्षण लागू करवाने की कोशिश नहीं की। यही रूख प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा का रहा, और यही हाल पुरूष प्रधान पार्टियों के मालिक, लालू-मुलायमों का रहा जो कि खुलकर महिला आरक्षण के खिलाफ रहे। 
लेकिन महिला आरक्षण से परे एक दूसरी बात आज इस मुद्दे पर लिखने के लिए हमको मजबूर किया है। मुंबई की एक खबर है कि वहां कैंसर की एक सबसे बड़े अस्पताल, टाटा मेमोरियल में इलाज के आंकड़े बताते हैं कि कैंसर के शिकार बच्चे जो वहां पहुंचे, और जिनका इलाज मां-बाप ने करवाया, उनमें लड़कों के मुकाबले लड़कियों की गिनती आधी ही थी। जबकि छोटे बच्चों के कैंसर में लड़की और लड़के के अनुपात का कोई फर्क नहीं होता है, और इलाज के आंकड़ों का यह फर्क महज इसलिए है कि बहुत से गरीब मां-बाप लड़की को बिना इलाज मर जाने देते हैं, और लड़कों का इलाज करवाते हैं। लेकिन मुंबई के अखबार की इस रिपोर्ट में बहुत सी ऐसी बहादुर मांओं की कहानी है जिन्होंने पति को छोडऩे की कीमत पर भी अपनी बेटी का इलाज कराना जारी रखा है। 
अस्पताल की यह कहानी इतनी भयानक है कि उसके दर्द को, उसकी दहशत को वे लोग नहीं समझ सकते जो कि लड़के और लड़की दोनों का इलाज कराने की ताकत रखते हैं, या दोनों के साथ गरीबी में भी बराबरी का बर्ताव करते हैं। लेकिन हिंदुस्तान में लड़के और लड़की के हक और उनके मौकों की बराबरी को लेकर लगातार फिक्र और चर्चा की जरूरत है, जिसके बिना तस्वीर बदलने नहीं दिख रही है। 
दिल्ली के निर्वाचित महिलाओं के सम्मेलन में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दो दिन पहले  कहा कि भारत की आबादी का 50 फीसदी हिस्सा महिलाओं का है। लेकिन आज भी संसद में उन्हें 12 फीसदी से अधिक जगह नहीं मिल पाई है। लोकसभा से दो तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद भी यह विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो सका है। राष्ट्रपति ने कहा कि पंचायतों और स्थानीय निकायों में 12.70 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। वे काफी अच्छा काम कर रही हैं। कई राज्यों की पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दे दिया गया है और कई राज्य इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं। लेकिन देश की संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाया है।
लेकिन यह पूरा अफसोस राजनीति, संसद, और सरकार के इर्दगिर्द घूमता हुआ है। जिस समाज में ऐसी बेबसी हो कि कैंसर के शिकार बेटे का तो इलाज कराने की कोशिश की जाती है, लेकिन कैंसर की शिकार बेटी को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, और मां अगर इसकी कोशिश करती है, तो उसे भी बच्ची-बच्चों सहित घर से निकाल दिया जाता है, तो ऐसे देश में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के जुबानी जमा-खर्च का कोई खास मतलब नहीं है। लड़कियों को मरने के लिए छोड़ देने का एक मतलब यह भी है कि इस समाज में, इस देश में लड़कियों की, लड़कियों के लिए, संभावनाएं भी बहुत कम हैं। इसीलिए लड़कियां पैदा होने के पहले से मारी जाना शुरू होता है, जो कि मुंबई के कैंसर अस्पताल के आंकड़ों तक जारी रहता है, और आगे भी।

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