लड़कों के लिए चाह, और लड़कियों के लिए मरघट की राह वाला देश

8 मार्च 2016
संपादकीय
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर बहुत से सरकारी भाषण देश भर में चल रहे हैं, और भारत में देवी की पूजा करने वाली दो नवरात्रियों के अलावा महिला दिवस एक दिन और हो जाता है जब महिलाओं के बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जाती हैं, और उनको आगे बढ़ाने के बारे में कई तरह के वायदे किए जाते हैं। लेकिन हकीकत अगर देखें तो हर शहर में तकरीबन हर हफ्ते किसी भी उम्र की महिला के साथ बलात्कार हो रहा है। महिलाओं को नसीहत देने के मामले में हरियाणा के भाजपा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कुर्सी संभालने के कुछ दिन पहले ही कहा था कि जिन महिलाओं को रात में अकेले घर से निकलना ठीक लगता है वे नंगी क्यों नहीं घूमतीं। इसके बाद यह बात तो बहुत स्वाभाविक थी कि हरियाणा के जाट आंदोलन के दौरान सड़क रोकते लोगों को यह जायज लगा हो कि रात में सड़कों पर कार से जा रही महिलाओं को खेत में ले जाकर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाए। लेकिन हरियाणा से बहुत दूर, बंगाल में ममता बैनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद वहां हुए एक बलात्कार को सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दिया था, लेकिन उनकी पुलिस ने शिकायत को सही पाया, और शायद उस मामले में अदालत से सजा भी हो चुकी है। और यह बात महज नेताओं की नहीं है, देश की राजधानी दिल्ली ने भी महिलाओं के खिलाफ हिंसक बकवास करने वाला पुलिस कमिश्नर देखा है। बात-बात में देश की महिलाओं को कपड़े ठीक पहनने की नसीहत दी जाती है। लेकिन जिस देश में दो-चार बरस की बच्चियों से भी बलात्कार के बिना कोई सूरज नहीं ढलता, कोई सूरज नहीं उगता, वहां पर कपड़ों पर जिम्मेदारी को डाल देना हजारों बरस से चले आ रहे मर्दाना-जुर्म की एक कड़ी ही है। 
महिलाओं से बलात्कार से परे भी उनके साथ गजब-गजब के भेदभाव होते हैं। दो ही दिन पहले हमने मुंबई की एक खबर पर इसी जगह लिखा था कि किस तरह कैंसर की शिकार लड़कियों में से लड़कों के मुकाबले आधी संख्या को ही इलाज नसीब होता है, और बाकी लड़कियों को यह सोचकर मर जाने दिया जाता है कि लड़की को बचाकर क्या हासिल होगा। गरीबी एक वजह हो सकती है, लेकिन इन मामलों में जहां लड़कों और लड़कियों में फर्क किया जाता है, वहां गरीबी वजह नहीं होती, लड़कों के लिए चाह, और लड़कियों के लिए मरघट की राह वजह होती है। 
महिलाओं के साथ जुल्म और जुर्म इतने अधिक होने की एक वजह यह है कि सत्ता पर बैठे हुए नेता और अफसर, धर्म की ठेकेदारी करने वाले अलग-अलग रंगों के चोले वाले लोग, और जाति की नेतागिरी, खाप पंचायतों की अगुवाई करने वाले लोग जब कन्या भू्रण हत्या से लेकर ऑनर किलिंग तक करवाते हैं, जब लड़कियों के जींस पहनने और उनके मोबाइल फोन इस्तेमाल पर रोक लगाते हैं, तो समाज के उनके नीचे के सारे मर्द यह मान लेते हैं कि लड़कियों से हिंसा और बलात्कार जायज है। जब तक देश की अदालत महिलाओं के खिलाफ हिंसक बयान देने वालों को जेल भेजना शुरू नहीं करेगी, तब तक हिंसा रूक नहीं सकती। जहां देश की राजनीति, जाति-व्यवस्था, धर्म, और पुरुषप्रधान सोच सब कुछ मिलकर औरत के खिलाफ हथियार उठाए हुए हैं, वहां अदालत को खुद होकर कार्रवाई करनी पड़ेगी, और बकवासियों को हिंसा के जुर्म में जेल भेजना पड़ेगा, उससे कम में नौबत नहीं सुधर सकती। इस देश में आज माहौल ऐसा है कि लड़कियां और महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं, और मर्द के खाना खा लेने के बाद ही उसे खाने का हक है। इसके अलावा खाना कम पड़े तो उसे मार खाकर पेट भर लेने का हक है। ऐसे देश में आने वाली कई सदी तक महिलाओं की हालत बराबरी की आएगी, इसमें हमको शक है। 

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