पुलिस-राज बस्तर को लेकर राज्य सरकार को एक गंभीर आत्ममंथन की जरूरत

संपादकीय
27 मार्च 2016  

छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल एक और पत्रकार की गिरफ्तारी के बाद बस्तर पुलिस की नीयत कुछ और साफ हुई है कि असहमति को कुचलने के लिए उसके पास आज महज बंदूकें नहीं हैं, किसी के भी खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करवाना भी उसके बस में है, और उन मुकदमों पर जब चाहे तब गिरफ्तारी भी उसका एक हथियार है। कल जिस संवाददाता को गिरफ्तार किया गया है उसके कागजात बताते हैं कि उसके अखबार ने उसे पिछले बरस ही एक बरस के लिए नक्सल प्रभावित इलाके में तैनात किया था, और वहां वह उन पत्रकारों में से एक था जिससे कि पुलिस खफा है। अब पुलिस ऐसी हर गिरफ्तारी के साथ साबित करने पर उतारू है कि जिस तारीख को ऐसे संवाददाता को गिरफ्तार किया गया, उस तारीख पर वह संवाददाता नहीं था, या फिर उसके खिलाफ किसी और तरह का जुर्म दर्ज था। कल जिस संवाददाता को गिरफ्तार किया गया है, उसके खिलाफ एक परीक्षा केन्द्र में जाकर तस्वीरें लेने का जुर्म दर्ज है, और इस जुर्म में तो छत्तीसगढ़ के सैकड़ों संवाददाता-प्रेस फोटोग्राफर गिरफ्तार किए जा सकते हैं। 
छत्तीसगढ़ में यह एक बड़ी अजीब नौबत आकर खड़ी हो गई है कि जिस तरह गूगल पर जाकर एंटीनेशनल सर्च करने पर जेएनयू का नक्शा दिखने लगता है, उसी तरह जर्नलिस्ट की गिरफ्तारी सर्च करने पर छत्तीसगढ़ दिखने लगता है। राज्य सरकार अब तक इस नौबत की गंभीरता पर गंभीरता से कार्रवाई नहीं कर पा रही है, या नहीं कर रही है कि इस राज्य की सारी घरेलू उपलब्धियां बाकी दुनिया की नजरों से दूर खिसक जा रही हैं, और सिर्फ एक ऐसी तस्वीर लोगों को दिख रही है कि इस प्रदेश में पुलिस का राज है, लोकतंत्र खत्म हो चुका है, सरकार का नक्सल-मोर्चे के एक अफसर पर कोई काबू नहीं है, और राज्य के प्रशासन से परे बस्तर एक निलंबित लोकतंत्र से गुजर रहा है। आज दुनिया भर के लोकतंत्रवादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोग ईमानदारी से फिक्रमंद हैं कि एक निर्वाचित सरकार के राज में लोकतंत्र की ऐसी अनदेखी कैसे हो रही है, और यह कब तक जारी रहेगी। 
छत्तीसगढ़ के भीतर रहते हुए हमको सरकार से जो बातें सुनाई पड़ती हैं, उनके मुताबिक बस्तर के नक्सल मोर्चे पर पुलिस की कामयाबी के एवज में वहां की पुलिस को असहमति कुचलने के लिए खुली छूट दी गई है। सरकार में बैठे बहुत से बड़े लोगों का यह मानना है कि बस्तर पुलिस की कामयाबी से घबराए हुए नक्सली बदनाम करने की नीयत से पुलिस पर ज्यादती की तोहमत लगाने के लिए अपने समर्थकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ बस्तर में जी रहे, मीडिया और सामाजिक जीवन में काम कर रहे लोगों का यह मानना है कि पुलिस अपनी ज्यादतियों और अपने जुर्म को छुपाने के लिए लोगों की आवाज को कुचलने का काम कर रही है और एक के बाद एक पत्रकारों पर हो रही कार्रवाई तो उसका एक पहलू है, उसका दूसरा पहलू यह है कि ऐसी गिनी-चुनी गिरफ्तारियां बाकी सैकड़ों संवाददाताओं के लिए यह संदेश है कि वे पुलिस के तय किए हुए राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी दो तबकों में से किसी एक तबके को छांट लें। 
यह बहुत खतरनाक बात है कि लोकतंत्र में निर्वाचित ताकतें एक वर्दीधारी अफसर के हाथों में इतनी ताकत दे रही हैं कि वह पूरी दबंगई से यह तय करता है कि उसे किस मीडिया से बात करनी है, और किससे नहीं, किन संवाददाताओं को साथ लेकर हेलीकॉप्टर में घुमाना है, और किनका बहिष्कार करना है, बस्तर में कौन से सामाजिक आंदोलन को खड़ा करना है, और किसे कुचलना है। बस्तर के आईजी एस.आर.पी. कल्लुरी की ताकत किस्से-कहानियों जैसी हो गई है, और एक अफसर के ओहदे, उस ओहदे के अधिकार, इन सबसे परे उनके बारे में यही पता लगता है कि बस्तर पूरी तरह से उनके हवाले है, और उनके किसी फैसले, उनकी किसी कार्रवाई के खिलाफ राज्य पुलिस और राज्य का प्रशासन सुनने को तैयार नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी खतरनाक नौबत है। देश ने कई जगहों पर ऐसी अफसरी हुकूमत देखी है। पंजाब में केपीएस गिल से लेकर मुंबई में अब तक छप्पन के लिए कुख्यात अफसर को भी देखा है। लेकिन लोकतंत्र का इतिहास ऐसे अफसरों की मनमानी के साथ-साथ यह भी दर्ज करता है कि उनको बढ़ावा देने, या उनको बर्दाश्त करने वाली राजनीतिक ताकतें कौन थीं। छत्तीसगढ़ सरकार को इस नौबत के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए कि मीडिया और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कुचलना क्या उसके मकसद में शामिल है? क्या इससे उसे कुछ हासिल हो रहा है? क्या नक्सलियों को शिकस्त देने के लिए लोकतंत्र को शिकस्त देना जरूरी है? राज्य सरकार को एक गंभीर आत्ममंथन करने की जरूरत है। 

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