दो चुनावों के बीच बरस का बिना दबाव वाला बजट, ढांचे बेहतर करने पर जोर

9 मार्च 2016
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के सोलहवें बरस में बारह बरस के मुख्यमंत्री का वित्तमंत्री की हैसियत से दसवां बजट चुनाव से परे का बिना दबाव वाला बजट है, और प्रदेश में वित्तीय अनुशासन अब भी देश के अधिकतर राज्यों के मुकाबले बेहतर रहने की तस्वीर पेश करता है। वैसे तो खबरों में आंकड़े पूरे आ जा रहे हैं लेकिन यह बात प्रभावशाली है कि बारह बरस की अपनी सरकार में राज्य ने प्रदेश पर से कर्ज को जीएसडीपी के 25 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी तक लाया गया है, और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बजट के साथ यह बताया कि यह पूरे देश में सबसे कम कर्ज भार वाला राज्य है। लेकिन किसी चुनावी बरस से परे का बीच के बरस का बजट होने के कारण इसे लुभावना बनाने का कोई दबाव सरकार के ऊपर नहीं था, और इसीलिए ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री, जो कि दस बरस से वित्तमंत्री भी हैं ने राज्य के मौजूदा ढांचे को और मजबूत बनाने का काम किया है।
राज्य सरकार के जानकार लोगों से इस बजट के पीछे की सोच को समझने से यह जानकारी मिलती है कि इसमें सबसे कमजोर और सूखे की तकलीफ झेल रहे किसानों की मदद के लिए कृषि और सिंचाई में तो भरपूर मद रखा गया है, लेकिन नई मुनादियों से बचा गया है। ऐसा समझ पड़ता है कि राज्य सरकार जनसुविधाओं और ढांचागत क्षमताओं को मजबूत बनाने में यह साल लगाना चाहती है, बजाय नई-नई योजनाओं को शुरू करके मौजूदा ढांचे को कमजोर छोड़ देने के। जानकार लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने स्कूल-कॉलेज से लेकर अस्पतालों तक, और आदिवासी आश्रमों तक के लिए मौजूदा ढांचे को अधिक मजबूत और अधिक सुविधासंपन्न, अधिक क्षमता के बनाने पर जोर दिया है। 
बजट को आमतौर पर टैक्स से जोड़कर देखा जाता है लेकिन राज्य सरकार के बजट में टैक्स का इतना बड़ा हिस्सा रहता नहीं है कि उसमें बड़ा फेरबदल किया जाए। छत्तीसगढ़ में मंदी की मार झेल रहे इस्पात उद्योग को इस बजट में टैक्स की कुछ छूट मिली है, लेकिन अधिकतर दूसरे दायरों में टैक्स ढांचे में कोई फेरबदल नहीं किया गया है। ऐसे में मौजूदा टैक्स वसूली और केंद्र सरकार से मिलने वाले आबंटन से ही राज्य का अगला बरस चलना है, बजाय किसी नई टैक्स-कमाई के।
मुख्यमंत्री की पेश की गई लंबी लिस्ट को अगर देखें तो हर विभाग के सैकड़ों मौजूदा केंद्रों पर बड़ा खर्च बजट में रखा गया है। सड़कों के ढांचे से लेकर स्कूल-कॉलेज की इमारतों और सभागृहों तक, बिजली के विस्तार और अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने तक बड़ी रकम खर्च होने जा रही है। लेकिन नए-नए स्कूल-कॉलेज, नए अस्पताल-हॉस्टल, नई-नई संस्थाओं की घोषणाओं को शायद अगले बजट तक टाल दिया गया है, क्योंकि सारे चुनाव निपट जाने के बाद अब विधानसभा स्तर पर, या जिला स्तर पर वोटरों को लुभाने और संतुष्ट करने की कोई तुरत जरूरत नहीं है। 
लेकिन एक बात जो हमें पिछले कई बजटों के बारे में लिखते हुए कही थी, हम उसे दुहराना चाहेंगे। राज्य में टैक्स चोरी से लेकर चिटफंड जैसे व्यापक आर्थिक अपराधों की भरमार है। सरकारी विभागों में बड़े पैमाने पर नियमित और संगठित भ्रष्टाचार है। खुद सरकार के कामकाज में जगह-जगह अधिकतर विभागों में साजिश से किए गए अपराध हैं। ऐसे में सरकार को एक मशीनरी ऐसी विकसित करनी चाहिए जो कि प्रदेश के सरकारी और गैरसरकारी आर्थिक अपराधों पर खुफिया नजर रख सके। आज सरकार के अपने भ्रष्टाचार विरोधी हाथ-पैर ऐसे हैं जो कि शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करते हैं, या कि किसी बहुत ही अधिक भ्रष्ट अफसर पर कभी-कभार अनुपातहीन संपत्ति का मामला बना देते हैं। लेकिन तकरीबन सभी भ्रष्टाचार जब हो चुके रहते हैं, उसके बाद ही सरकार की एजेंसियां उनमें से गिनती के कुछ मामलों को देख पाती हैं। हमारा मानना है कि जिस देश और प्रदेश में आतंक को लेकर, उग्रवादी हिंसा को लेकर खुफिया एजेंसियां काम करती हैं, वैसा ही काम राज्य सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए किया जाना चाहिए, और उससे समय रहते भ्रष्टाचार में गायब हो रही सरकारी रकम को बचाया जा सके। आर्थिक अपराध निगरानी ब्यूरो किस्म की एक ऐसी एजेंसी रहनी चाहिए जो कि अपराधों की जांच, और उनके मुकदमों के बजाय सिर्फ खुफिया निगरानी का काम करे, और जानकारी मिलने पर जांच एजेंसियों को खबर करे। यह एक नया काम होगा, लेकिन इससे सरकारी खर्च की चोरी और बर्बादी काफी घट सकती है।
मुख्यमंत्री ने वित्तमंत्री का जिम्मा बिना अधिक परेशान हुए, परेशान दिखे, जितनी आसानी के साथ इतने बरसों से निभाया है, और राज्य को आर्थिक रूप से जहां तक पहुंचाया है, वह तारीफ की बात है, और देश के बाकी बहुत से राज्यों में हालत पर काबू इतना अच्छा नहीं है। उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर काम पर जितना बड़ा खर्च किया जा रहा है, उसमें उतनी ही बड़ी चोरी और बर्बादी का जो खतरा है, उसे कैसे घटाया जाए।

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