निर्वाचित लोगों को भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं

संपादकीय
30 अप्रैल 2016
संसद की खबर है कि सांसदों ने एकमत से अपना वेतन दो गुना करने की सिफारिश की है। अगर वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री इस पर सहमत हो जाते हैं तो संसद के अगले सत्र में यह लागू हो सकता है। आज सांसदों को 50 हजार रूपए महीने तनख्वाह मिलती है, इसे दोगुनी करने का प्रस्ताव है, और संसदीय क्षेत्र का भत्ता 45 हजार रूपए महीने से बढ़ाकर 90 हजार रूपए महीने करने की सिफारिश भी की गई है। इससे पहले देश के अलग-अलग प्रदेशों में राज्य ने विधायकों की तनख्वाह बढ़ाई है, और छत्तीसगढ़ में इसे लेकर कांग्रेस के भीतर ही गुटबाजी का एक बखेड़ा खड़ा हुआ था। लोगों को यह लगता है कि सांसद या विधायक कोई नौकरी नहीं करते हैं, और उन्हें मिलने वाले भत्ते या वेतन को बाजार भाव के हिसाब से नहीं बढ़ाना चाहिए, और सांसद-विधायक सेवाभाव से काम करते रहें।
आज देश में लोगों के बीच यह भी एक भावना है कि सांसदों और विधायकों में से बहुत से लोग भ्रष्ट हैं, और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि वे निजी कमाई के लिए अगर भ्रष्टाचार नहीं करते, तो भी वे चुनाव का खर्च जुटाने के लिए भ्रष्ट होते ही हैं। इस देश ने कई तरह के स्टिंग ऑपरेशन देखे हैं जिनमें विधायक और सांसद सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते पकड़ाए हैं, सांसदों की सदस्यता खत्म की गई है, और अदालतों ने अपनी बेबसी दिखाई है कि संसद के भीतर के मामलों पर वे कार्रवाई नहीं कर सकतीं वरना सांसद-विधायक जेल में भी होते। लोगों का यह भी देखा हुआ है कि चुनावों में आयोग द्वारा तय की गई सीमा से कई गुना अधिक खर्च उम्मीदवार करते हैं, और जनता का एक हिस्सा भ्रष्टाचार को बड़ा पसंद करता है, धर्म और जाति के नेता उगाही करते हैं, और देश का मीडिया पेडन्यूज को लेकर काफी नंगा हो चुका है। ऐसे में एक बात और जुड़ जाती है कि सांसद या विधायक को अपने चुनाव क्षेत्र में जितना दौरा करना पड़ता है, और जितना सामाजिक शिष्टाचार निभाना पड़ता है, लोगों की आसमान छूती उम्मीदों के लिए कम्प्यूटर से लेकर फोटोकॉपी तक और कर्मचारियों से लेकर उनके फोन और पेट्रोल तक जितना खर्च करना पड़ता है, वह विधानसभा या संसद की तनख्वाह से कभी पूरा नहीं हो सकता।
ऐसे में इस देश को यह समझना चाहिए कि अपने घर-परिवार की जरूरतों को अनदेखा करके कोई जनता की सेवा नहीं कर सकते। देश में कुछ गिने-चुने बाबा आम्टे हो सकते हैं, कुछ गिनी-चुनी मदर टेरेसा हो सकती हैं, लेकिन अगर सांसद और विधायक ईमानदार चाहिए, और काबिल भी चाहिए, तो उसके लिए कुछ दाम चुकाना देश को मुफ्तखोरी के मुकाबले अधिक सस्ता पड़ेगा। हमारा यह मानना है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अगर जरूरत के लायक तनख्वाह और भत्ते मिलेंगे, तो चुनावी राजनीति में कुछ बेहतर लोग भी आ पाएंगे। अपने परिवार को अभाव में रखते हुए लोग पूरी जिंदगी जनसेवा नहीं कर सकते। इसलिए जनता को अपने बाकी खर्च की तरह विधायक और सांसद पर भी खर्च करना सीखना चाहिए। बड़े बुजुर्ग बोल गए हैं कि सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। पांच बरस में एक बार जिसे चुनना हो, और पांच बरस के बाद जिसके सामने इस काम के जारी रहने की कोई गारंटी न हो, उसे अपने वर्तमान और अपने भविष्य के लिए इतना भुगतान तो मिलना ही चाहिए कि वे घर की फिक्र से बेफिक्र रहकर जनता का काम कर सकें। हम इस सोच से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि सांसद और विधायक तो भ्रष्ट होते ही हैं इसलिए उन्हें अधिक तनख्वाह क्यों दी जाए? इस पैमाने पर तो फिर सरकारी अमले को भी तनख्वाह देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार की तोहमत लगती है। लोगों को भ्रष्ट होने से बचाना भी समाज का काम है, और हमारा यह मानना है कि थोड़े से महंगे सांसद या विधायक देश के लिए अधिक उत्पादक हो सकते हैं, बजाय इसके कि वे अपनी ही निजी उलझनों में फंसे रहें, और अपनी संसदीय जिम्मेदारी ठीक से न निभा सकें। निर्वाचित लोगों को बाजार के भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं है।

हिंसा करने की क्षमता को हक बना देना घातक

संपादकीय
29 अप्रैल 2016
गुजरात से खबर आ रही है कि वहां अगड़ी जातियों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाएगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में गुजरात में पार्टी ने यह फैसला लिया, और मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की मौजूदगी में यह घोषणा की गई। इसमें यह प्रावधान रखा जा रहा है कि अगड़ी जातियों के छह लाख से कम आय वाले परिवार के बच्चों को आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। गुजरात में पाटीदार समाज के आंदोलन के बाद यह फैसला लिया गया है, और यह समाज आर्थिक रूप से संपन्न माना जाता है लेकिन आरक्षण की मांग कर रहा है। पिछले दिनों जब पाटीदार समाज का आंदोलन हुआ तो इसमें शामिल होने के लिए बड़ी महंगी-महंगी विदेशी कारों में भी लोग पहुंचे थे। अब बताया जा रहा है कि इस ताजा आरक्षण के साथ गुजरात में आरक्षण 60 फीसदी तक पहुंच जाएगा। सरकार ने आज यह भी कहा है कि जरूरत पड़ी तो वह अपने फैसले के लिए कानूनी लड़ाई भी लडऩे को तैयार है। पहली नजर में ऐसा भी लगता है कि कानूनी लड़ाई तय दिख रही है, और यह फैसला शायद आरक्षण देने के बजाय आरक्षण देते हुए दिखने के लिए अधिक है।
आज देश भर में पिछड़े वर्ग में शामिल होने के लिए, या पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिलाने के लिए, जगह-जगह आंदोलन चल रहे हैं। हरियाणा का जाट आंदोलन, या राजस्थान का गुर्जर आंदोलन उसी तरह का रहा, और ये जातियां न तो सामाजिक रूप से उतनी पिछड़ी हुई हैं, और न ही आर्थिक रूप से गरीब हैं। लेकिन फिर भी आरक्षण का मतलब न केवल पढ़ाई में दाखिला होता है, नौकरी होती है, बल्कि राजनीतिक चुनावों के लिए सीट का आरक्षण भी होता है। इनमें से कौन सी बात को लेकर कौन सा आंदोलन चलता है यह अंदाज लगाना मुश्किल है, और यह भी अंदाज लगाना मुश्किल है कि क्या हरियाणा का जाट आंदोलन, हैदराबाद विश्वविद्यालय से देश भर में फैल रहे, और दिल्ली में इक_ा होने जा रहे दलित छात्रों के आंदोलन को वहां न पहुंचने देने के लिए अचानक छेड़ा गया आंदोलन था?
ऐसे तमाम सवालों के बीच हम एक बुनियादी सवाल पर आना चाहते हैं, देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण एक अच्छी बात हो सकती है, लेकिन 50 फीसदी से अधिक आरक्षण न करने की कानूनी शर्त को तोड़ते हुए यह कितना जरूरी है यह भी सोचा जाना चाहिए। क्या महज इसलिए कोई आरक्षण लागू किया जाए कि उसे मांग करने वाली जाति हिंसक और आक्रामक आंदोलन की ताकत रखती है, और रेलगाडिय़ों को जला रही है? फिर दूसरी बात हम दलित और आदिवासी आरक्षण के बारे में भी लगातार लिखते हैं कि इन तबकों के लिए निर्धारित आरक्षण के भीतर जब तक अधिक कमाई या अधिक ताकत के ओहदों वाले परिवारों को बाहर नहीं किया जाएगा, तब तक इन समाजों के सचमुच जरूरतमंद और सचमुच गरीब-कमजोर लोग आरक्षण के फायदे के मुकाबले में अपने समाज के ही ताकतवर लोगों के मुकाबले खड़े नहीं हो सकेंगे। सभी आरक्षित तबकों से मलाईदार सतह को अलग करना ही होगा, उसके बिना सचमुच कमजोर लोग तबके के भीतर मुकाबले के लायक बन ही नहीं पाते।
आज देश में मीडिया, और बाजार पर काबू रखने वाला एक संपन्न और सवर्ण तबका आरक्षण के खिलाफ अभियान चला रहा है, और आरक्षित तबकों का मखौल उड़ाते हुए उन्हें देश के लिए नुकसानदेह बता रहा है। ऐसे लोगों को इस नए गुजरात-हरियाणा के आरक्षण के चलते एक और मौका मिलेगा, नफरत को फैलाने का। आज केन्द्र और राज्य की सरकारों को यह चाहिए कि आर्थिक-सामाजिक रूप से सक्षम जातियों के आंदोलन के दबाव में आरक्षण का नाजायज विस्तार न करें। ऐसा करने का मतलब देश की बाकी जातियों को बढ़ावा देना होगा कि वे भी हिंसा शुरू करें, और उसी से उनकी बात सुनी जाएगी। और आंदोलन किस तरह के होते हैं यह हरियाणा में पिछले दिनों दिख ही चुका है जब सड़कों पर रोकी गई गाडिय़ों से औरतों और लड़कियों को उतारकर उनसे सामूहिक बलात्कार किए गए। हिंसा करने की क्षमता को हक बना देना देश के लिए बहुत ही घातक होगा।

लोक सुराज जैसे अभियान तो अच्छे हैं लेकिन रोज का सरकारी कामकाज भी सुधरे

संपादकीय
28 अप्रैल 2016
छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार आज से लोक सुराज अभियान शुरू कर चुकी है और गर्मी से तपते एक पूरे महीने मंत्री और अफसर गांव-गांव, शहर-शहर जाकर लोगों की दिक्कतें सुनेंगे। यह एक सालाना सिलसिला छत्तीसगढ़ में बरसों से चले आ रहा है, और जिस पखवाड़े या महीने गर्मी सबसे अधिक रहती है, उसी महीने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह यह कार्यक्रम तय किया है। हर बरस गर्मी में अफसर परिवार सहित बाहर घूमने के बजाय इस बड़े कार्यक्रम की तैयारी में लगे रहते हैं, और छोटी से लेकर बड़ी दिक्कतों तक को सुना जाता है, और शायद बहुत सी शिकायतों पर कार्रवाई भी होती होगी।
प्रदेश में मुख्यमंत्री और जिलों के अफसर लोगों की परेशानियों को सुनने के लिए जनदर्शन भी करते हैं, और हर हफ्ते आम लोगों को अपनी शिकायतों और मांग के साथ पहुंचने का मौका मिलता है। ऐसे तमाम कार्यक्रमों के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि ऐसे जनदर्शनों, या ऐसे ग्राम सुराज के इंतजार में शिकायतों और मांग के ग_े इक_े होते जाते हैं, और बाद में इनके निपटारे पर भी रोजाना के सरकारी काम के मुकाबले अधिक ध्यान दिया जाता होगा। लेकिन जनता ऐसे जनदर्शनों और सुराज अभियान में एक फीसदी ही पहुंच पाती होगी, उसका अधिकतर काम तो रोजाना के सरकारी दफ्तरों में फंसे रहता है, और जब तक जनता के कामकाज को नियमित सरकारी कामकाज के दौरान करने की संस्कृति विकसित नहीं होगी तब तक बात बनेगी नहीं। मुख्यमंत्री, मंत्री, या बड़े अधिकारियों के सामने आने वाली बड़ी भीड़ इस बात का सुबूत होती है कि सरकार में नियमित कामकाज ठीक से नहीं हो रहे हैं। इसलिए हम ऐसी भीड़ को सरकार की कामयाबी का सुबूत नहीं मानते, सरकार के लिए एक चुनौती मानते हैं कि साल भर में ढाई सौ दिन सरकारी दफ्तर लगने के बावजूद इस तरह के मौकों पर लोगों की भीड़ सरकार से अपने काम के लिए क्यों लगती है?
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सरकार का तीसरा कार्यकाल आधा गुजर चुका है। अगले चुनाव के पहले आधे कार्यकाल से भी कम का वक्त काम करने के लिए है। ऐसे में एक व्यवस्था उन्हें कम से कम अब तो लागू कर देने चाहिए कि हफ्ते का पहला दिन किसी भी तरह की बैठकों, या किसी भी तरह के दौरों से मुक्त रहे, और मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मुख्य सचिव से लेकर पटवारी तक, हर सोमवार अपने दफ्तर में सुबह से शाम तक मौजूद रहें। आज सरकार में इतने तरह की बैठकों और दौरों में, विधानसभा सत्रों और लोक सुराज जैसे अभियानों में, चुनाव की तैयारियों में सरकारी अमला लगे रहता है कि जनता को यह पता ही नहीं रहता कि किस कुर्सी पर भगवान कब विराजमान मिलेंगे। इसलिए सरकार को हफ्ते में एक दिन सुबह से शाम तक हर किसी की अपनी खुद की कुर्सी पर मौजूदगी की गारंटी करनी चाहिए, ताकि जनता उस एक दिन तो पहुंच सके।
यह बात सही है कि ऐसे अभियानों में जब गांव-गांव तक मंत्री और अफसर पहुंचेंगे, तो उन्हें जमीनी हकीकत का एक बेहतर अंदाज लगेगा। लेकिन फिर भी इन अभियानों में आए हुए कागजों पर कार्रवाई को अगर सरकार काफी मान लेगी, तो यह अपने आपको धोखा देने जैसा होगा। जनता के बीच जाना, एक हंडी से चावल के दाने को निकालकर देखने जैसा तो हो सकता है कि चावल पका है या नहीं, लेकिन यह चावल पकाने का विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए सरकार को अपने दफ्तरों और अपने अमले में कामकाज के हर दिन काम सुनिश्चित करना चाहिए, ऐसे कितने भी अभियान नियमित कामकाज का विकल्प नहीं हो सकते। कहने के लिए सरकार ने प्रशासनिक सुधार की कुछ कोशिशें की हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसी कम से कम दो कमेटियों की हमको याद है जिनमें कि रिटायर्ड आईएएस अफसरों को ही बिठाया गया है। अब जिन्होंने प्रशासन के मुखिया रहते हुए भी अपने लंबे कार्यकाल में सुधार नहीं किए, उनसे अब सुधार की उम्मीद करना ठीक नहीं है। सरकार को ऐसे सुधार के लिए बाहर के लोगों की जरूरत रहती है, और गैरसरकारी सोच का उपयोग जरूरी है। इन दो बातों को मिलाकर अगर सरकार काम करे, तो अगले ढाई बरस में भी इस सरकार का कार्यकाल जनता की तकलीफों को कुछ अधिक दूर तक दूर कर सकेगा।

क्या भारतीय ओलिंपिक संघ कैदी की पोशाक में गुडविल एम्बेसडरी करवाएगा?

संपादकीय
27 अप्रैल 2016
भारतीय ओलिंपिक संघ द्वारा फिल्म स्टार सलमान खान को अपना गुडविल एम्बेसडर नियुक्त किया गया है, और यह घोषणा सामने आते ही खेल से जुड़े कई लोगों ने इसका विरोध शुरू किया, और उस विरोध का विरोध करते हुए फिल्म उद्योग के कई लोग और फिल्म उद्योग के साथ उठने-बैठने वाले बड़े-बड़े कुछ नामी खिलाडिय़ों ने इसे एक सही फैसला बताते हुए कहा है कि फिल्मों में कामयाब सलमान को गुडविल एम्बेसडर बनाने में कोई बुराई नहीं है, और यह सही फैसला है। और लोगों के साथ-साथ सलमान के पिता, फिल्मों के एक वक्त के कामयाब लेखक सलीम खान भी अपने बेटे की हिमायत में उतर आए हैं, और उन्होंने आलोचना करने वाले मशहूर बुजुर्ग खिलाड़ी मिल्खा सिंह को सोशल मीडिया पर ही कड़ा जवाब दिया है कि मुम्बई फिल्म उद्योग की वजह से ही मिल्खा सिंह गुमनामी से बाहर, शोहरत में आ पाए हैं।
लेकिन अभी बहस इस बात पर आ टिकी है कि फिल्म उद्योग के एक कलाकार को ओलिंपिक के लिए गुडविल एम्बसेडर बनाना ठीक है या नहीं। हमारे हिसाब से बहस का मुद्दा बिल्कुल अलग ही होना चाहिए था, और उस हिसाब से सलमान को भारतीय ओलिंपिक संघ द्वारा मनोनीत करना पूरी तरह से नाजायज है। सलमान अभी हिरणों के शिकार का एक मामला तो झेल ही रहे हैं, अदालती कटघरे में खड़े हैं, और वहां पर उन्हें सजा का खतरा है ही, लेकिन इससे भी बड़ी दूसरी बात यह है कि मुंबई की सड़कों पर नशे की हालत में लोगों को कुचलने, और छोड़कर भाग जाने के मामले में सलमान खान को एक अदालत से सजा हो चुकी है, और ऊपर की अदालतों में अभी मामला बाकी है। ऐसे में सलमान को सरकार या किसी सार्वजनिक संगठन द्वारा गुडविल एम्बेसडर बनाने का मतलब उन गुनाहों को अनदेखा करना है जिसके लिए एक अदालत से सजा हुई, दूसरे से बरी हुए, और अब महाराष्ट्र सरकार सलमान को सजा दिलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट गई हुई है। अगर सजायाफ्ता या कटघरे में खड़े हुए लोगों को सार्वजनिक जीवन में इस तरह से महिमामंडित करना है, तो फिर सार्वजनिक जीवन में मूल्यों की कोई जरूरत ही नहीं है।
फिर भारतीय ओलिंपिक संघ के सामने सलमान के अलावा और कोई विकल्प न रहा हो, ऐसा भी नहीं है। अकेले मुंबई फिल्म उद्योग में बहुत से ऐसे दूसरे कलाकार हैं जो जुर्म और कोर्ट-कचहरी से दूर हैं, और खेलों से, फिटनेस से जुड़े हुए भी हैं। मिसाल के तौर पर शाहरूख खान हैं जो कि हॉकी पर बनी हुई एक अच्छी फिल्म के प्रमुख अभिनेता रहे, और खेलों पर बनने वाली दूसरी फिल्मों से भी कई बड़े मशहूर कलाकार जुड़े रहे हैं। प्रियंका चोपड़ा ने न सिर्फ ओलिंपिक विजेता मैरीकॉम की भूमिका की, बल्कि वे आज हॉलीवुड में भी मशहूर हो रही हैं। लेकिन हम कोई नाम सुझाना नहीं चाहते, महज इतना कहना चाहते हैं कि जुर्म से जुड़े हुए, कटघरों में खड़़े हुए लोगों से दूर रहना चाहिए। उन तमाम लोगों को भी बराबरी से जीने के अधिकार हैं, लेकिन जब किसी को किसी संगठन का, आयोजन का, या कार्यक्रम का, अभियान का चेहरा बनाकर पेश करना है, तो वैसे चेहरे के नीचे अदालती कटघरा न दिखता रहे, इसका ध्यान जरूर रखना चाहिए। एक समय सार्वजनिक जीवन के लोगों को इतनी शर्म भी रहती थी कि ऐसी नौबत में मिल रहे सम्मान को वे खुद रोककर रखते थे कि अभी उनके खिलाफ मामले-मुकदमे चल रहे हैं, और उन्हें फिलहाल यह मंजूर करना ठीक नहीं लगेगा। लेकिन आज वैसी शर्म खत्म हो गई है, मनोनीत करने वाले लोगों में भी, और मनोनीत होने वाले लोगों मेें भी कल के दिन अगर सलमान खान को इन दोनों चल रहे मामलों में सजा हो जाती है, तो क्या भारतीय ओलिंपिक संघ उनसे कैदी की पोशाक में गुडविल एम्बेसडरी करवाएगा?

फोन में पैनिक-बटन तो ठीक है, लेकिन इसका नाम कुछ और रखा जाए

संपादकीय
26 अप्रैल 2016
एक-एक कर दुनिया के कई देशों में मोबाइल फोन पर एक पैनिक-बटन जोड़ा जा रहा है जिससे किसी भी खतरे की नौबत आने पर महज एक बटन दबाकर पुलिस और घरवालों तक खबर भेजी जा सके, और इन दिनों आम हो चले फोन-लोकेशन की वजह से सबको फोन की जगह भी खबर के साथ मिल जाएगी। नए टेलीफोन ऐसी बटनों के साथ आ रहे हैं, और पुराने फोन पर भी कोई रास्ता निकालकर मौजूदा किसी बटन के साथ ऐसी सुविधा जोड़ी जा रही है। भारत में भी कुछ महीनों बाद सारे फोन ऐसे ही आने लगेंगे, क्योंकि जनवरी 2017 से यह शर्त सरकार लागू कर रही है, और बाजार उसके पहले ही यह कर चुका होगा।
टेक्नॉलॉजी अपने साथ कई तरह की सुविधाएं लाती हैं, और खतरों से बचने का रास्ता निकलता है। फोन पर ऐसी सुविधा की बात भारत में तब से हो रही है जबसे बलात्कार की कुछ घटनाओं के बाद देश विचलित हुआ, और नए कानून का बनना शुरू हुआ। लेकिन ऐसी नौबत के साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि पैनिक-बटन दबाते हुए किसी जिन्न या किसी ईश्वर की तरह मदद नहीं पहुंच जाएगी, वह समय तो लेगी ही, और तब तक जो खतरे में हैं, उन्हें अपने-आप ही नौबत से निपटना होगा। अब इस नई तकनीकी-सहूलियत का नाम पैनिक-बटन रखा गया है, और इस शब्द का मतलब होता है घबराहट, आतंक, दहशत में पडऩा। जबकि किसी भी मुसीबत में फंसे हुए लोगों को बाहर से मदद के पहले की सलाह में यही कहा जाता है कि पैनिक मत होओ। मतलब यह कि घबराओ मत, दहशत में मत पड़ो, आतंक के शिकार मत होओ, क्योंकि बाहरी मदद जब तक आएगी, तब तक तो खुद ही निपटना है। और दहशत में पड़े हुए लोग अपनी खुद की कोई मदद नहीं कर सकते।
भाषा का बड़ा असर होता है। भारत में ट्रकों और बसों के पीछे लिखा होता है- हॉर्न प्लीज। कुछ अलग-अलग इलाकों में इसके लिए आवाज दो, या भोंपू बजाओ भी लिखा जाता है। आज भारत में सड़कों पर जितना बुरा ध्वनि प्रदूषण है, उसे देखते हुए अब यह विचार चल रहा है कि हॉर्न प्लीज शब्द को लिखने पर रोक लगाई जाए, क्योंकि उस शब्द से लोग बिना जरूरत भी हॉर्न बजाते चलते हैं। भाषा का मकसद कुछ होता है, लेकिन उसका असर जरूरी नहीं है कि वहीं तक सीमित रहता हो। एक वक्त जिन्हें बलात्कार की शिकार लिखा जाता था, उनके लिए पिछले कुछ समय से रेप-विक्टिम के बजाय रेप-सर्वाइवर, यानी बलात्कार से उबरकर, जीतकर निकली, ऐसी शब्दावली इस्तेमाल हो रही है। इसका मकसद यह है कि बलात्कार का शिकार होने के बाद ऐसी लड़की या महिला बाकी जिंदगी ऐसी भाषा का शिकार भी न होती जाए।
इसके अलावा भी दुनिया के बोलचाल से धीरे-धीरे ऐसे शब्द खत्म किए जा रहे हैं जो कि अपमानजनक हैं, या कि लोगों का हौसला पस्त करते हैं। चमड़े और जूतों का काम करने वाले लोगों की जाति को चमार लिखा जाता था, और उनके पेशे को भी। लेकिन जैसे-जैसे समाज में जागरूकता आई, वैसे-वैसे लोगों को समझ आया कि यह भाषा जाति-व्यवस्था को बताने के साथ-साथ अपमान के हथियार की तरह भी इस्तेमाल हो रही है, तो उसे खत्म किया गया, और भारतीय कानून में इसके लिए सजा जोड़ी गई।
इसलिए भाषा सिर्फ एक शब्द नहीं होती है, उस शब्द के प्रचलित और गूढ़ दोनों किस्म के शब्दों के साथ जुड़ी हुई सामाजिक परिभाषाएं  भी देखी जाती हैं। इसीलिए एक वक्त गांधी ने दलितों के लिए जो शब्द, हरिजन, शुरू किया था, उसे दलित समुदाय ने खारिज कर दिया, और उसे अब सरकारी और अदालती कामकाज से पूरी तरह हटा दिया गया है। अब उसकी जगह अनुसूचित जाति ही लिखा जाता है। और सामाजिक लेखन में इस तबके के लिए दलित शब्द लिखा जाता है, और हो सकता है कि कुछ बरस बाद इस शब्द को भी खारिज कर दिया जाए।
शब्दों के साथ जुड़ी मानसिकता को ध्यान में रखना चाहिए। अभी तो पैनिक-बटन शुरू होने को है, इसके लिए कोई और शब्द छांटना चाहिए, क्योंकि ऐसा शब्द जो कि खुद ही दशहत सुझाए, वह हिम्मत नहीं दे सकता, हौसला पस्त ही कर सकता है।

समाज सुधारक की तरह काम करता सुप्रीम कोर्ट

संपादकीय
25 अप्रैल 2016
डांस बार मामले में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया है कि वह एक सप्ताह के अंदर बार के लाइसेंस जारी करे। कोर्ट ने अश्लीलता को लेकर सरकार द्वारा जताई गई चिंता पर कहा कि वह अश्लीलता रोकने का नियम बनाए, ना कि डांस बार खुलने से रोके। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि डांस करना एक पेशा है। अगर यह अश्लील है, तो फिर इसकी कानूनी अनुमति खत्म हो जाएगी। सरकार द्वारा लागू किए गए नियम निषेधात्मक नहीं हो सकते हैं। अदालत ने सख्ती दिखाते हुए सरकार से ताकीद की कि वह डांस बार को प्रतिबंधित करने की कोशिश ना करे। कोर्ट ने कहा कि डांस करके पैसा कमाना महिला का संवैधानिक हक है। डांस से पैसा कमाना, गलत तरीके से पैसा कमाने से बेहतर है। डांस करके पैसा कमाना भीख मांगने से बेहतर है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रूख साल भर से चले आ रहा है, और महाराष्ट्र में पिछली कांग्रेस-एनसीपी सरकार से लेकर मौजूदा भाजपा-शिवसेना सरकार तक, लगातार एक बहुत ही दकियानूसी और अमानवीय रूख सरकारें दिखा रही हैं, जिनमें डांस बार में काम करने वाली महिलाओं के लिए हिकारत अधिक है, या कि सुप्रीम कोर्ट के लिए, यह अंदाज लगा पाना बड़ा मुश्किल है। हम बरसों से इस मामले पर लिखते आ रहे हैं कि भारत में एक वयस्क मनोरंजन को रोकने के लिए सरकारें और राजनीतिक दल लगातार एक पाखंडी रूख दिखाते हैं और जनता के सामने एक बड़ी पवित्रतावादी नीति रखने की कोशिश करते हैं। दूसरी तरफ यह वही महाराष्ट्र और मुंबई है जहां पर लाखों महिलाएं रोज देह बेचने के काम में झोंकी गई हैं, और उस पर सरकार कभी कोई रोक नहीं लगा पाती, और यह भी नहीं दिखता कि किसी सरकार की उसमें कोई दिलचस्पी है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने दर्जनों बार यह रिपोर्ट दी है कि मुंबई के चकलाघरों में भारत और नेपाल से लाकर कम उम्र की नाबालिग बच्चियों को बेचा जाता है, उनसे चाकू की नोंक पर धंधा करवाया जाता है, लेकिन सरकार का कोई रूख उसे रोकते हुए सामने नहीं आया।
दूसरी तरफ महाराष्ट्र के डांस बार में जाने वाले, शराब पीने वाले, वयस्क लोगों के बीच अगर फिल्मी गानों पर कुछ युवतियां डांस करती हैं, तो उसे बंद करवाने के लिए सरकार महाराष्ट्र के कानून बदलने पर भी आमादा हो जाती हैं, और लगातार सुप्रीम कोर्ट से टकराव भी मोल लेती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आज जो बात कही है कि देह बेचने से बेहतर एक मनोरंजन बेचना है, हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम कई बरसों से यही बात लिखते आ रहे हैं। महाराष्ट्र में डांस बार बंद होन से दसियों हजार युवतियों को रोजी-रोटी का खतरा खड़ा हो गया, और ऐसा अंदाज है कि उनमें से हजारों को देह बेचने के लिए भी मजबूर होना पड़ा होगा। महाराष्ट्र सरकार का यह रूख देखकर महान लेखक सआदत हसन मंटो की कहानी याद आती है कि किस तरह पति को खोने के बाद एक महिला ने उसका तांगा चलाने के लिए म्युनिसिपल से लाइसेंस मांगा, तो म्युनिसिपल ने कहा कि महिला को तांगा चलाने का लाइसेंस नहीं दिया जा सकता, इस पर उस महिला ने देह बेचने के लिए चकले पर बैठने का लाइसेंस मांगा, तो वह उसे एक दिन में मिल गया।
हिन्दुस्तान में राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन एक बहुत ही खतरनाक दर्जे के पाखंड को बढ़ावा देते हैं, यहां पर बाल वेश्यावृत्ति के खिलाफ तो कोई आवाज नहीं उठती, लेकिन समलैंगिकता के खिलाफ, स्कूल-कॉलेज में सेक्स-शिक्षा के खिलाफ लोग झंडे-डंडे लेकर सड़कों पर उतर आते हैं। महाराष्ट्र में डांस बार बंद करवाने की मुजरिम सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली सरकार थी, जिसने महिलाओं के मनोरंजन के पेशे में रहने के कानूनी हक को कुचला, और उन्हें देह के धंधे में धकेलने का जुर्म किया। लेकिन कांग्रेस पार्टी की समझ इतनी कमजोर हो चुकी है कि इस महिला विरोधी फैसले को भी एक महिला की अगुवाई वाली पार्टी नहीं समझ पाई। और कांग्रेस के वैसे फैसले के बाद भाजपा से तो यह उम्मीद की ही जाती थी कि वह ऐसे पाखंड को जारी रखे, और महिलाओं को कुचलती रहे। आज इस बात को लेकर हमें हैरानी होती है कि सुप्रीम कोर्ट एक समाज सुधारक की तरह काम कर रहा है, और राजनीतिक दल एक दकियानूसी हिंसा पर उतारू हैं।

जजों की कमी का रोना रोते मुख्य न्यायाधीश का गला भरा

संपादकीय
24 अप्रैल 2016
देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश के एक संयुक्त सम्मेलन में आज सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर बहुत अफसोस जाहिर किया कि देश में जरूरत के मुताबिक अदालतों और जजों की बहुत कमी है, और सरकारें उन्हें बढ़ाने के लिए कुछ नहीं कर रही हैं। इस तकलीफ को कहते हुए उनका गला भर आया और कुछ पल के लिए वे कुछ बोल ही नहीं पाए। उन्होंने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह कहा कि मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रम और पूंजीनिवेश जुटाने की कोशिशें तो ठीक हैं, लेकिन जब तक अदालतों की क्षमता नहीं बढ़ाई जाएगी तब तक सरकार की ये योजनाएं कामयाब नहीं हो सकतीं। इस महत्वपूर्ण मौके पर देश के मुख्य न्यायाधीश की कही हुई इन बातों को प्रधानमंत्री सुनते चले गए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का सार्वजनिक रूप से तमाम लोगों के बीच यह कहना इसलिए अधिक मायने रखता है कि उन्होंने यह भी गिनाया कि किस तरह अदालतों की क्षमता बढ़ाने, और अदालतों को बढ़ाने की बात केन्द्र और राज्य के बीच एक-दूसरे की तरफ टाली या सरकाई जा रही हैं, और कोई हल नहीं निकल रहा है।
इस सम्मेलन में जो लोग बैठे हैं वे तमाम तो इतने ताकतवर लोग हैं कि वे अपने से जुड़े मामले अदालतों में जब तेज करवाना चाहें, तो तेज करवा लेते हैं, और जब धीमे करवाना चाहें, तो धीमे करवा लेते हैं। भारत में बहुत महंगे-महंगे वकील रखकर, कई तरह के सुबूत जुटाकर, कुछ तरह के सुबूत और गवाह खरीदकर, कई मामलों में जांच अधिकारी, वकील, और जज भी, खरीदकर लोग अपने मामलों को अपनी मर्जी की रफ्तार पर ले आते हैं। एक अदालत के बाद दूसरी अदालत में ताकतवर लोगों के मामले आमतौर पर पूरी जिंदगी चलते रहते हैं, और जब तक उन्हें अपने जुर्म की सजा मिलती है, तब तक वे वैसा ही जुर्म सैकड़ों बार और कर चुके रहते हैं। यही हाल सरकार के भीतर किसी की जांच और मुकदमे की इजाजत देने के पहले चलता है, यही हाल मुकदमा चलने तक अदालत में चलता है, और फिर यही हाल ऊपरी अदालतों तक जाकर निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करते हुए चलता है। चारा खाए हुए लोग संसद और विधानसभाओं का रियायती खाना खाते रहते हैं, और जिन भैंसों के हिस्से का चारा चोरी हुआ था, उनकी पीढिय़ां निकल जाती हैं।
लोकतंत्र में यह बात कही जाती है कि जो इंसाफ समय पर नहीं मिल पाया, देर से मिला, वह इंसाफ नहीं होता। यही वजह है कि आज भारत में आम बोलचाल की जुबान में लोग खाकी वर्दी और काले कोट से दूर रहने की दुआ देते हैं, और जिसे बद्दुआ देनी होती है, उसे कहते हैं कि वह पुलिस और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में पड़ा रहे। अदालत का नाम और काम तो इंसाफ से जुड़ा हुआ है, लेकिन उसकी तस्वीर लोगों के मन में बेइंसाफी की है। लोग यह मानकर चलते हैं, और अदालत जाने वाले अधिकतर लोगों का यह तजुर्बा भी रहता है कि अदालतों में मुजरिम ही मजे में रहते हैं, और बड़े आत्मविश्वास से वहां घूमते हैं। कोई शरीफ और बेकसूर तो अदालत पहुंचकर भी मुजरिम की तरह डरे-सहमे रहते हैं और जल्द से जल्द वहां से बाहर निकलना चाहते हैं। जमीन-जायदाद के मामलों में लोगों की पूरी पीढ़ी निकल जाती है, और फैसले नहीं हो पाते। अदालतों पर खर्च कम रखकर अगर लोकतांत्रिक देश की सरकार यह समझती है कि यह किफायत का काम है, तो उसे यह समझना चाहिए कि देश की जनता की पूरी जिंदगी अगर अदालतों में खत्म हो जाती है, तो वह देश की उत्पादकता का बहुत बड़ा नुकसान है, और यह इंसानियत के खिलाफ भी है। इसलिए अदालतों और जजों की संख्या भी बढ़ाने की जरूरत है, और अदालती कामकाज में धूर्तता और चतुराई से मामलों को लंबा खींचने की मौजूदा रियायत को खत्म करने की जरूरत भी है। यह दूसरी बात मुख्य न्यायाधीश को अदालती व्यवस्था के भीतर सुधारनी पड़ेगी। लेकिन कुल मिलाकर सरकारों और अदालतों को अपने रवैये में इंसानियत लानी पड़ेगी, तभी लोगों का भरोसा इंसाफ पर होगा।

दुनिया के लंबे वक्त के फैसले अगली पीढ़ी को गोद में बिठाकर लेने के फायदे बहुत

संपादकीय
23 अप्रैल 2016
वैसे तो कल ही हमने पृथ्वी दिवस पर धरती के बारे में लिखा है जिसमें पर्यावरण की फिक्र की है, और अपनी बात को हवा और पानी तक सीमित रखा है। लेकिन आज इस मुद्दे से जुड़ी हुई एक दूसरी खबर पर लिखना जरूरी है कि 170 देशों ने संयुक्त राष्ट्र में कल ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते पर दस्तखत किए हैं, और विकासशील और विकसित देशों को धरती के बढ़ते तापमान का मुकाबला करने के लिए एक साथ खड़ा किया है। भारत में भी दुनिया के भविष्य को प्रभावित करने वाले इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, और इसके साथ ही भारत ने कहा है कि औद्योगिक विकास पा चुके धनी देश जलवायु परिवर्तन से लडऩे का बोझ गरीब देशों के कंधे पर नहीं डाल सकते।
इस मौके पर एक दूसरी बात हुई जिस पर हम लिखना चाहते हैं, अमरीका के विदेश मंत्री जॉन कैरी ने इस पर दस्तखत करते हुए अपनी नातिन को गोद में बिठा रखा था, जो कि बारीकी से यह दस्तखत देख रही थी, और इसके बाद जब नाना ने उसे चूमा, तो वह आने वाली पीढिय़ों का ख्याल करके हो रहे इस समझौते का एक बड़ा प्रतीक था। एक समझौता दस्तखत से गुजरते हुए महज छोटी सी खबर बन पाता है, लेकिन इस तरह के प्रतीक किसी भी मौके को, किसी भी दस्तावेज को अधिक महत्वपूर्ण और अधिक असरदार बना देते हैं। लोगों की मानसिकता पर असर डालने के ऐसे कई काम सोच-समझकर भी होते हैं, और अनायास भी हो जाते हैं। लेकिन यह समझना पड़ेगा कि सार्वजनिक जीवन के अधिकतर कामों में ऐसे छोटे-छोटे प्रतीक एक सोच को सामने रखने में बड़े मददगार होते हैं। दुनिया के पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले देशों में अमरीका सबसे आगे है जहां का बाजार वहां के इंसानों को, वहां के जानवरों को अधिक से अधिक खपत की तरफ धकेलकर धरती को तबाह करने पर आमादा करता है, फिर भी आने वाली पीढ़ी से जुड़ी हुई अमरीकी विदेश मंत्री की यह तस्वीर भविष्य के प्रति जिम्मेदारी को खूबसूरती से दिखाती है। किसी समझदार ने बहुत पहले यह कहा था कि यह धरती हमें अपने पुरखों से मिली विरासत नहीं है, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढिय़ों की जायदाद है, जिसे हमने अपनी इस एक जिंदगी तक के लिए उधार पर लिया हुआ है।
सार्वजनिक जीवन में प्रतीकात्मक बातों का महत्व कम नहीं होता है। हम इस बात को इसलिए कह रहे हैं कि भारत जैसे देश में जहां रंग कुछ धर्मों के प्रतीक होते हैं, और सत्ता पर बैठे लोग कुछ रंगों से अपने लगाव का प्रदर्शन करके अपनी धार्मिक प्राथमिकताएं उजागर कर सकते हैं। इस देश में जहां लोगों को पीने का पानी नहीं हैं, और जहां जानवर बिना पानी मर रहे हैं, वहां पर सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री अपनी सेल्फी लेकर, या अपने रास्ते को पानी से धुलवाकर, या हेलीपैड पर दर्जनों टैंकर पानी छिड़कवाकर अपनी उस हैवानियत को जाहिर कर सकते हैं, जो है तो इंसानियत का एक हिस्सा ही, लेकिन जिसे इंसान अपना मानने से इंकार कर देते हैं।  जब जनता की दी हुई कुर्सियों पर बैठे हुए लोग अपनी निजी काली कमाई को बेशर्मी के साथ चारों तरफ दिखाते फिरते हैं, तो वह भी उनकी बेशर्मी और उनकी हिंसा का एक प्रतीक होता है, और जरूरत ऐसे जागरूक वोटरों की होती है जो कि ऐसे लोगों को वोट के दिन नोटा देकर आए।
भारत में सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोग अपनी गाडिय़ों में, अपने दफ्तरों में किसी धर्म या सम्प्रदाय, किसी गुरू या किसी आध्यात्मिक संगठन के प्रतीकों को दिखाकर भी लोकतंत्र का अपमान कर सकते हैं, और अपने फोन की घंटी की जगह किसी धर्म की प्रार्थना या आरती को डालकर भी ऐसा कर सकते हैं। हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन में लोगों को सकारात्मक प्रतीकों का बेहतरी के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, और अलोकतांत्रिक, हिंसक, अश्लील, अहंकारी प्रतीकों से बचना चाहिए। आने वाली पीढ़ी आज की फैसले लेने वाली पीढिय़ों को महज अपनी मौजूदगी से ही प्रभावित कर सकती है, पूरी दुनिया में लोगों को व्यापक महत्व के दीर्घकालीन फैसले लेते हुए अपनी अगली पीढिय़ों को गोद में बिठाकर तब तय करना चाहिए।

असुरक्षित धरती पर कोई सुरक्षित टापू संभव नहीं

संपादकीय
22 अप्रैल 2016
आज 22 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस मनाया जाता है, और धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए, धरती को बचाने के लिए दुनिया भर में कार्यक्रम होते हैं। लेकिन एक दिक्कत यह है कि पर्यावरण को कुछ शहरी या औद्योगिक चीजों से जोड़कर देखा जाता है, और उससे परे के खतरे अनदेखे रह जाते हैं। अभी दो दिन तक दिल्ली में सेंटर फॉर साईंस एंड एनवॉयरमेंट में वायु प्रदूषण पर एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम किया जिसमें कई देशों के जानकार शामिल हुए, और भारत के अलग-अलग हिस्सों में जनता के बीच काम करने वाले लोग भी शामिल हुए। इस संपादक को भी दो दिनों की इस बहस को सुनने का मौका मिला, और उससे तस्वीर का एक पहलू उभरकर सामने आया।
वायु प्रदूषण के भारत के आंकड़े यह बताते हैं कि जिन शहरों में प्रदूषण नापा जा रहा है, वह सिर्फ उन्हीं शहरों का न होकर, आसपास के कई गांवों को जोड़कर बने हुए एक बड़े इलाके का प्रदूषण रहता है, जो कि हवा के झोंकों से और दूर-दूर तक सफर करता है या फैलता है। गांवों का यह प्रदूषण मोटे तौर पर घरेलू चूल्हों से उपजता है जो कि एक तरफ तो हवा में धुआं छोड़ते हैं, दूसरी तरफ वे खाना पकाने वाली घरेलू महिला और उसी छोटे घर में रहने वाले बच्चों के फेंफड़ों को छलनी भी करते चलते हैं। भारत में दशकों से इस मुद्दे पर काम करने वाले एक अमरीकी वैज्ञानिक का यह निष्कर्ष है कि दुनिया में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले लकड़ी या कोयले के चूल्हे ऐसी अकेली सबसे बड़ी वजह हैं जिनसे कि इंसानों की सेहत को सबसे अधिक और सबसे बुरा नुकसान पहुंचता है। उनका मानना है कि धरती और हवा के प्रदूषण के साथ-साथ सेहत को होने वाला यह नुकसान सबसे अधिक महंगा है। लेकिन शहरी गाडिय़ों के प्रदूषण और कारखानों के प्रदूषण से परे इस घरेलू या ग्रामीण प्रदूषण की तरफ अधिक ध्यान नहीं जाता है।
गांवों से आने वाला प्रदूषण दो और वजहों से भी होता है, जंगल की आग, जो कि कई बार वनोपज इक_ा करने के लिए लोग लगा देते हैं, और दूसरी तरफ फसल के बाद खेतों में लगाई गई आग, या आग तापने के लिए फसल के बचे हुए हिस्से या पत्तों को जलाने से निकला हुआ धुआं। वैज्ञानिक परीक्षण बताते हैं कि किसी शहर को आसपास के दायरे से काटकर सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। सरहदें प्रदूषण के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं, इसलिए पर्यावरण को सुधारने के लिए, हवा को साफ रखने के लिए लोगों को आसपास के सौ-पचास किलोमीटर के दायरे को साथ-साथ सुधारने की योजना बनानी पड़ेगी, उसके बिना केवल शहर या औद्योगिक क्षेत्रों को सुधारने से कोई बात बनने वाली नहीं है।
यह बात कुछ उसी तरह की है जिस तरह धरती के नीचे के भूजल को किसी एक जगह नहीं बढ़ाया जा सकता है, या साफ नहीं किया जा सकता है। धरती के नीचे पानी इतनी दूर-दूर तक सफर करता है कि किसी एक जगह का प्रदूषण सौ-पचास किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है, और किसी एक जगह गहरे नलकूप से निकाला गया पानी आसपास के कई किलोमीटर के भूजल को खींच सकता है। इसके साथ-साथ एक यह संभावना भी बनती है कि धरती में आसमानी पानी को वापिस डालने की तरकीबें अगर बड़े पैमाने पर की जाएं, तो उससे दूर-दूर तक सैकड़ों किलोमीटर तक भी भूजल स्तर सुधर सकता है।
आज जो लोग महंगे और साफ-सुथरे दिखते इलाकों में बैठकर सोचते हैं कि उनकी सेहत को प्रदूषण से कोई खतरा नहीं है, उन्हें यह जानना चाहिए कि सेंटर फॉर साईंस एंड एनवॉयरमेंट ने अपनी दायर की हुई एक जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट के जज के सामने प्रदूषण नापने का मीटर लगा दिया था और दिन भर नाप-नापकर उन्हें थोड़ी-थोड़ी देर में यह बताया था कि दिल्ली के सबसे साफ इलाके की इस एयर कंडीशंड अदालत के भीतर भी कितना प्रदूषण है। इसलिए लोग चाहे कितने ही संपन्न या ताकतवर न हों, वे अपने लिए एक सुरक्षित हवा-पानी का टापू नहीं पा सकते। वे उतने ही सुरक्षित रह सकते हैं जितने कि उनके आसपास के शहर या गांव हैं। आज की यह पूरी बातचीत पृथ्वी दिवस पर सिर्फ हवा और पानी के दो मुद्दों को छू रही है, धरती को प्रभावित करने वाली बाकी बातों को एक साथ यहां पर लिखना मुमकिन नहीं है। लेकिन जब लोगों में जागरूकता आएगी तो वह सिर्फ हवा-पानी के लिए नहीं आएगी, वह जिंदगी और धरती की हर बात के लिए आएगी। फिलहाल आज जरूरत यह है कि अपने आपको अकेले सुरक्षित मान लेने और सोच लेने से परे इस वैज्ञानिक तथ्य को माना जाए कि असुरक्षित धरती पर कोई सुरक्षित टापू संभव नहीं है।

लहू सने गौरवपथ

संपादकीय
21 अप्रैल 2016
केन्द्र सरकार के आंकड़े हैं कि देश में पिछले बरस हर दिन चार सौ मौतें सड़क हादसों में हुई हैं। छत्तीसगढ़ में हर दिन अब दर्जन मौतें सुनाई पड़ रही हैं जिनमें बिना हेलमेट के दुपहिया वाले हैं, बाराती गाडिय़ां हैं, और नशे में गाड़ी चलाते लोगों की बात सामने आती है। रईस लोगों की बिगड़ैल औलादें हैं जो कि महंगी और तेज रफ्तार गाडिय़ों को दौड़ाते दूसरों को भी मार रही हैं, और खुद भी मर रही हैं।
कुछ लोग बढ़ती सड़क मौतों के लिए सड़कों पर बढ़ती गाडिय़ों का तर्क देते हैं। लेकिन यह बिल्कुल गलत बात है। गाडिय़ों की भीड़ से रफ्तार घटती है और हादसे भी कम होते हैं। आज के हादसों के पीछे अंधाधुंध रफ्तार और नशे में गाड़ी चलाना सबसे बड़ी वजह हैं और इनको रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। यह सरकार के बस की बात भी है। आज छत्तीसगढ़ में बिना हेलमेट वाले दुपहिया चलाते लोगों से अकेली राजधानी में पुलिस एक-एक दिन में लाखों रूपए जुर्माना वसूल करती है। ऐसी कड़ी जांच पूरे राज्य में हो सकती है और नशे में मिले ड्राइवरों को गिरफ्तार करके जेल में डाला जा सकता है, उनके लायसेंस हमेशा के लिए रद्द किए जा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ दिक्कत यह है कि उसे राजनीतिक इंतजामों, गैरजरूरी आंदोलनों और मंत्री-अफसरों के घरेलू कामों में झोंक दिया जाता है। ट्रैफिक का इंतजाम भी सबसे पहले लालबत्ती काफिलों के लिए होता है, जुलूसों के लिए होता है, तब जनता की बारी आती है। जब पुलिस ट्रैफिक के बजाय सरकारी और राजनीतिक शादियों में पार्किंग करवाने में लग जाती है तब सड़कों का इंतजाम तो घट ही जाता है। ताकतवर ओहदों पर बैठे लोगों को अपने लिए पुलिस का बेजा इस्तेमाल बंद करना चाहिए।
अब बहुत से ऐसे उपकरण हैं जिनके इस्तेमाल से पुलिस गाडिय़ों की रफ्तार जांच सकती है। ड्राइवर नशे में हों तो उसका पता लगा सकती है। छत्तीसगढ़ में ऐसे उपकरण पुलिस के पास गिने-चुने हैं और उनके खराब पड़े होने की खबरें छपती रहती हैं। यह नौबत उस राज्य में शर्मनाक है जहां पर शहरों को सजाने के लिए हजारों करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। ऐसी सजावट किस काम की जहां सड़कों पर ऐसा इंसानी लहू बिखरा रहे? बेकसूर लोग मारे जाते रहें और पैसों की गुंडागर्दी बेकाबू रहे।
छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि कमउम्र जो बच्चे गाडिय़ां चलाते हैं, उन नाबालिगों के मां-बाप पर भी कार्रवाई करे और वैसी गाडिय़ों को भी जनजीवन के लिए खतरा मानकर जब्त करे। जिन लोगों के मन में दूसरों की जिंदगी के लिए सम्मान नहीं है, वे अपनी जिंदगी सड़कों से परे कहीं और खत्म करें, लेकिन बेकसूरों को न मारें।
सड़कों की बददिमागी संक्रामक होती है। सरकार को इसे खत्म करना चाहिए। इसके बिना छत्तीसगढ़ में सजते गौरवपथों का मतलब नहीं।

महाराष्ट्र के नेताओं के चुल्लू भर पानी में डूब मरने की जरूरत

संपादकीय
20 अप्रैल 2016
महाराष्ट्र में आत्महत्या करते हुए किसानों की मदद करने के बजाय वहां के नेता और मंत्री तरह-तरह की ओछी बातें इन किसानों के बारे में कर रहे हैं। खेतों को पानी देने के बजाय सरकार वहां क्रिकेट के मैदान सींचने के लिए लगी हुई है, और अदालत को दखल देकर निर्वाचित सरकार को बताना पड़ रहा है कि वह क्या करे, और क्या न करे। ऐसी शर्मनाक नौबत में मुंबई फिल्म उद्योग के एक चर्चित कलाकार, और खासकर नकारात्मक छवि वाले खलनायक की भूमिका करके कामयाब हुए नाना पाटेकर अपने दम पर किसानों को बचाने में लगे हुए हैं। वे अपने पैसे खर्च करके लोगों का हौसला बढ़ा रहे हैं, और जो किसान गुजर गए हैं उनके परिवारों की मदद कर रहे हैं।
यह नौबत देश की राजनीति के लिए धिक्कार है, और खासकर ऐसे महाराष्ट्र के लिए जहां पर तमाम बड़ी पार्टियों के नेता राजनीति के रास्ते अरबपति और खरबपति होते आए हैं, कुछ जेल पहुंच गए हैं, कुछ अदालती कटघरे में हैं, और कुछ अपनी चतुराई से बचे हुए हैं। फिर यह एक ऐसा प्रदेश है जिसने कि बड़ी आक्रामकता के साथ गोवंश की बिक्री पर रोक लगाई है, इससे जहां एक तरफ तो बूढ़े गाय-बैल के मांस से पोषण आहार पाने वाले गरीब मांसाहारी लोग कुपोषण की तरफ बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद भूखे-प्यासे मरने वाले किसान न खुद को बचा पा रहे हैं, न परिवार को, और बूढ़े जानवरों को खिलाने-पिलाने पर बेबस इसलिए हैं कि आंखों के सामने तो उनको मरते देख नहीं सकते, और अगर उन्हें बाहर छोड़ दिया, तो उन्हें ले जाते लोगों के साथ-साथ किसान भी जेल चले जाएंगे कि उन्होंने जानवरों को बेचा है।
गौमाता का आशीर्वाद उन्हें बचा नहीं पा रहा है, और सरकार उन्हें जिंदा रहने नहीं दे रही है। नतीजा यह है कि महाराष्ट्र सूखे, भूख, गरीबी, और खुदकुशी, इन सबका शिकार है, और देश का यह सबसे संपन्न राज्य देश के सबसे अधिक संख्या में खरबपतियों को लिए हुए चल रहा है। यह लोकतंत्र के लिए और राजनीतिक ताकतों के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है क्योंकि आज इन ताकतों को तो अपने शक्कर कारखानों के लिए भी भरपेट पानी हासिल है, और अपनी क्रिकेट के सजावटी मैदानों को सींचने के लिए भी।
आज हाल यह है कि फिल्मों का एक खलनायक लोगों की जिंदगी में नायक बनकर आया है, और जो नेता अपने-आपको नायक बताते थकते नहीं हैं, वे सारे नेता असल जिंदगी के खालिस और कामयाब खलनायक साबित हो चुके हैं।

मर्दों की सोच को बढ़ावा देते महिलाएं जाती हैं कायर और कमजोर को चूडिय़ां भेंट करने

संपादकीय
19 अप्रैल 2016
मध्यप्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार के मामले उठाते हुए कांगे्रस पार्टी की महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष की अगुवाई में कल हजारों महिलाओं ने भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के घर की तरफ कूच किया। और अभी आजकल में ही छत्तीसगढ़ में भी राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अफसरों को चूडिय़ां भेंट कीं। सभी जगह, जहां-जहां महिलाएं किसी आंदोलन में ऐसा करती हैं, वहां पर कुर्सी पर बैठे नेता या अफसर का अपमान हो, या न हो, खुद महिलाओं का तो बड़ा बुरा अपमान होता ही है। महिला आंदोलनकारियों को यह समझना चाहिए कि चूडिय़ां महिलाओं का प्रतीक होती हैं। और भारत के हिंदू समाज में महिलाएं अपने पति के प्रतीक के रूप में सुहागन बनकर चूडिय़ां पहनती हैं। धर्म से परे भी फैशन के तौर पर महिलाएं ही चूडिय़ों का इस्तेमाल करती हैं, आदमी नहीं करते। ऐसे में महिलाओं के प्रतीक का उपयोग एक कमजोरी की तरह दिखाते हुए जब सरकार को चूडिय़ां भेंट की जाती हैं, तो वह महिलाओं की नासमझी का काम भी होता है, और उससे पूरा महिला वर्ग एक कमजोर तबका दिखता है।
महिलाओं को पुरुषप्रधान समाज की भाषा में, कहावतों और मुहावरों में, प्रतीकों और गालियों में कमजोर और अपमान के ही लायक बताया जाता है। कानून और सामाजिक आंदोलन मिलकर भी पुरुषों की सोच को नहीं बदल पाए हैं, और इस सोच का दबदबा इतना है कि महिलाएं खुद अपने प्रतीकों का अपमान करने से नहीं चूकतीं। चूडिय़ों को कमजोरी के प्रतीक के रूप में भेंट करना महिलाओं के लिए एक गाली है और कांगे्रस की महिलाओं ने भोपाल में जो किया है, उन्हें अपनी ही पार्टी का यह इतिहास याद नहीं है कि इंदिरा गांधी चूडिय़ों के ऐसे इस्तेमाल के खिलाफ बहुत नाराज होती थीं।
समाज में बहुत से लोग अपने अपमान को समझ नहीं पाते। हिंदू धर्म की बहुत सी ऐसी आरतियां हैं जिन्हें गाने वाले धर्मालु लोग अपने-आपको पापी, निकृष्ट, अज्ञानी कहते हैं, और ईश्वर से अपने को पापमुक्त करने की प्रार्थना करते हैं। अब ईश्वर का सम्मान बढ़ाने के लिए लोग अपने-आपको बिना किसी वजह पापी कहें, बुरा कहें, अधम और नीच कहें, यह परले दर्जे की बेवकूफी है। इसी दर्जे की बेवकूफी किसी सरकार को कमजोर साबित करने के लिए चूडिय़ां भेंट करना है। महिलाओं को बोलचाल की भाषा में जो बेइंसाफी है, उसको खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए, न कि उसे बढ़ावा देना चाहिए। महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ाना देने के लिए आदमी ही काफी हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि गालियों के इस्तेमाल की शौकीन महिलाएं भी मां-बहन की ही गालियां देती हैं, और वे इस बात का अहसास नहीं कर पातीं कि मर्दों ने समाज की जुबान में ऐसी गालियां ही बनाई थीं जो महिला के खिलाफ हों, महिलाओं के जिक्र की हों।
आज भारत में एक मजबूत महिला आंदोलन जगह-जगह दिखता है। ऐसे लोगों को कांगे्रस और भाजपा की महिलाओं में यह जागरूकता लाने की जरूरत है कि चूडिय़ां कायरता या कमजोरी का प्रतीक नहीं हैं।

मीडिया के औजार भी हथियारों की मंडी में

18 अप्रैल 2016

एक बड़ी दिलचस्प खबर यह है कि फेसबुक के कर्मचारियों ने अपने मुखिया मार्क जुकरबर्ग से पूछा है कि वे अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनने की कोशिश कर रहे नफरतजीवी डोनाल्ड ट्रम्प को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए क्या कर सकते हैं? कर्मचारियों की तरफ से यह सवाल फेसबुक के एक भीतरी सर्वे में पूछा गया कि कंपनी के मुखिया से हफ्तावार सवाल-जवाब में क्या पूछा जाए?
मार्क जुकरबर्ग ने पहले डोनाल्ड ट्रम्प की आलोचना की थी कि वे लोगों के बीच दीवारें खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ उनकी कंपनी, फेसबुक, की यह नीति है कि वह लोगों के वोट देने की सोच को प्रभावित नहीं करती है। हालांकि फेसबुक ने एक वक्त यह प्रयोग कर देखा था कि क्या लोगों के वोटों का रूझान किसी तरफ मोड़ा जा सकता है?
और बात सिर्फ फेसबुक की नहीं है। दुनिया में आज मीडिया के इतने बड़े-बड़े कारोबार हो गए हैं कि वे जनमत को मोडऩे और तोडऩे की ताकत बढ़ाते चल रहे हैं। हिंदुस्तान में भी एक-एक अखबार के दर्जनों संस्करण आम बात हो गई है, और कई अखबार ऐसे हैं जो आधा-एक दर्जन राज्यों के दर्जनों शहरों से निकल रहे हैं, और करोड़ों पाठकों तक पहुंच रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में मीडिया एक स्वतंत्र कारोबार है और यहां पर ऐसी कोई रोक भी नहीं है कि एक मीडिया मालिक कितने राज्यों तक सीमित रहे, या कितनी भाषाओं से अधिक में उसके अखबार न निकलें, या अखबार के साथ-साथ टीवी और रेडियो पर भी उसका कब्जा न हो, या इन सबके अलावा शहरों के केबल टीवी नेटवर्क पर भी उनका मालिकाना हक न हो।
एक वक्त ऐसा था जब अमरीका में मीडिया पर एकाधिकार के खिलाफ ऐसे कानून थे जो मीडिया के एक सीमा से अधिक बड़े होने को रोकते थे, अब पता नहीं वहां भी ये कानून बाकी है या नहीं, लेकिन हिंदुस्तान में कभी ऐसे कानून के लिए कोई चर्चा भी नहीं हुई। और आज फेसबुक पर जो सवाल खड़ा है, वह यही पूछ रहा है कि इस अकेली सोशल मीडिया ताकत का इस्तेमाल असहमति के लिए, वोटरों को प्रभावित करने के लिए किया जाए, या नहीं।
इंटरनेट, कम्प्यूटर, फोन, और सोशल मीडिया ने मिलकर जनमत को प्रभावित करने की इतनी बड़ी ताकत हासिल कर ली है कि झूठ और अफवाह दुनिया के इतिहास में कभी इतने ताकतवर और असरदार नहीं थे जितने कि आज हैं। और अमरीका में जिस तरह रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति-प्रत्याशी बनने की कोशिश में लगे डोनाल्ड ट्रम्प साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा फैला रहे हैं, उस तरह की नफरत और हिंसा हिंदुस्तान में भी कुछ लोग फैला रहे हैं, और ऐसे लोग सोशल मीडिया पर अमनपसंद लोगों के मुकाबले हजार गुना अधिक सक्रिय हैं।
कम्प्यूटर तकनीक की मेहरबानी से लोग झूठी तस्वीरें और झूठे वीडियो भी गढ़ ले रहे हैं, और झूठे आंकड़ों के साथ नफरत फैलाना कई लोगों का सबसे पसंदीदा शगल हो गया है। भारत के सोशल मीडिया पर अगर देखें तो आधे लोग मोदी से नफरत करते उन्हें फेंकू लिखते हैं, और आधे लोग राहुल गांधी को पप्पू लिखकर उनकी अपरिपक्वता पर हमला करते हैं। इस बीच दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के लिए डॉगविजय सिंह से लेकर पिगविजय सिंह तक गालियां गढ़कर फैलाई जाती हैं।
लेकिन सोशल मीडिया तो एक अलग किस्म की आजादी वाला लोकतंत्र है जिसमें हर किस्म के जुर्म, हिंसा, और नफरत की जगह है, गुंजाइश है। लेकिन दूसरी तरफ अगर फेसबुक या ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के मालिक किसी विचारधारा के समर्थन या विरोध का फैसला ले लें, तो बिना घोषित किए हुए वे अपने कम्प्यूटरों में बहुत मामूली सी छेडख़ानी करके यह इंतजाम कर सकते हैं कि किसी विचारधारा की बातें हर किसी के सामने अधिक पहुंचें, और किसी दूसरी विचारधारा की बातें दबी-छुपी रह जाएं।
यह एक किस्म की ब्रेनवॉशिंग होगी जिसमें लोगों की सोच को मोड़ दिया जाए। पहले, बहुत पहले, जब कम्प्यूटर-इंटरनेट और सोशल मीडिया महज विज्ञान कथाओं की कल्पना थे, शायद कल्पना में भी नहीं थे, तब ऐसी विज्ञान कथाएं लिखी जा चुकी हैं जिनमें जनता की सोच को बदलने की साजिश और जुर्म की बातें थीं। आज अखबारों और टीवी वाले मीडिया की दखल और पहुंच इंटरनेट के डिजिटल मीडिया तक भी अच्छी खासी है, और हर किस्म के मीडिया पर एकाधिकार पर कोई रोक भी नहीं है।
मीडिया चाहे वह मूलधारा का मेनस्ट्रीम मीडिया हो, या कि सोशल मीडिया, जब वह बड़े आकार से बढ़कर बहुत बड़े आकार का हो जाता है, तो उसमें कारोबारी पूंजी भी बहुत अधिक से बढ़कर विकराल हो जाती है। और वैसे में कारोबारी प्राथमिकताओं के सामने किसी तरह के कोई लोकतांत्रिक, सामाजिक, या मानवीय सरोकारों की कोई गुंजाइश नहीं बचती है। ऐसे में अगर दुनिया के इतिहास में जगह-जगह तानाशाह बनने वाले लोगों की तरह अगर मीडिया मालिक, सोशल मीडिया मालिक, दुनिया के रूख को अपनी मर्जी का करना तय करे, तो संवाद और संचार के ये औजार दुनिया के सबसे घातक हथियार बन जाएंगे।
आज वैसे भी भारत जैसे देश में लोकतांत्रिक चुनाव कई किस्म के गैरलोकतांत्रिक प्रभावों के असर में है, और निष्पक्ष चुनाव, खरीदे जाने वाले एक सामान की तरह के रह गए हैं। अब अगर मीडिया-सोशल मीडिया के औजार भी हथियारों की मंडी में बिकने लगे हैं, तो लोकतंत्र सबसे ताकतवर खरीददार के पांव की जूती जैसा ही नहीं रह जाएगा?

सुषमा की शॉल का मजाक नाजायज तो है, लेकिन...

संपादकीय
18 अप्रैल 2016
भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पहली बार ईरान की राजकीय यात्रा पर गई हैं, तो वहां के राष्ट्रपति हसन रूहानी के साथ मुलाकात के दौरान उनकी जो तस्वीर जारी हुई उसमें वे अपनी साड़ी के रंग की ही शॉल लपेटे हुए दिख रही हैं, और सिर पर पल्लू रखने की तरह उन्होंने शॉल को ओढ़ा हुआ है। वैसे तो यह तस्वीर दिल्ली के किसी कोने में भी दिख सकती थीं, फर्क सिर्फ यही है कि एक मुस्लिम और इस्लामी देश में जाने के बाद उन्होंने वहां की संस्कृति के मुताबिक शॉल ओढ़ी, तो सोशल मीडिया उबल पड़ा। लोगों को याद आया कि जब वे पाकिस्तान गई थीं, तो वहां नवाज शरीफ से मिलते हुए पाकिस्तान के हरे झंडे के सामने उनकी हरी साड़ी एकदम एक रंग की लग रही थी, और इसके बारे में दुनिया भर की बातें लिखी गईं, और संसद में उन्होंने यह बताया कि हफ्ते के जिस दिन की वह तस्वीर है, उस दिन वे हरे कपड़े ही पहनती हैं।
सुषमा स्वराज ने ईरान पहुंचकर न तो बुर्का पहना, और न ही सिर पर हिजाब डाला, उन्होंने सिर्फ सिर पर पल्ला रख लिया जो कि भारत के खासे बड़े हिस्से में एक आम बात है। जो लोग ईरान जाते हैं उन सभी लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे वहां की सांस्कृतिक भावना के अनुरूप अपनी पोशाक रखें। और यह बात सिर्फ ईरान के साथ नहीं है, और न ही यह बात सिर्फ सुषमा स्वराज के साथ है। इंदिरा गांधी अपने वक्त में जब एक-एक दिन में चार-चार राज्यों में जाती थीं, तो वे विमान से उतरते हुए ही हर राज्य की स्थानीय पोशाक में दिखती थीं। इसलिए भारत के विदेश मंत्री ने अगर ईरान जाकर वहां के रीति-रिवाजों के मुताबिक अपने कपड़ों का ख्याल रखा, तो उसमें किसी हाय-तौबा की गुंजाइश नहीं है।
लेकिन एक दूसरी बात यह है कि जब भाजपा के नेता ही, और भी कुछ पार्टियों के नेताओं की तरह, लगातार लोगों के हुलिए पर, उनके धर्म या उनके झंडे के रंग पर, उनकी दाढ़ी, टोपी या चोटी पर कहते आए हैं, तो फिर यह भारत की एक राजनीतिक और सांस्कृतिक संस्कृति हो जाती है कि लोग सुषमा के सिर ढांकने पर कुछ कहें। लोगों को याद होगा कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी को एक सार्वजनिक कार्यक्रम में जब कुछ मुस्लिमों ने एक मुस्लिम टोपी पहनानी चाही थी, तो उन्होंने उससे मना कर दिया था। लेकिन अभी कुछ हफ्ते पहले की बात है कि दाऊदी बोहरा सम्प्रदाय के प्रमुख मोदी से मिलने पहुंचे तो प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी तस्वीरों को सिलसिलेवार देखने से यह दिखा कि शुरू की तस्वीरों में मोदी शॉल नहीं ओढ़े हुए हैं, और सैयदना साहब शॉल ओढ़े हुए हैं। लेकिन दो-तीन तस्वीरों के बाद वही शॉल सैयदना साहब पर से हटी दिखती है, और वही मोदी के कंधों पर सजी दिखती है। इस दौरान इस प्रतिनिधि मंडल ने मोदी को और भी कई तोहफे दिए, लेकिन यह शॉल भीश् शायद कंधे बदलकर एक तोहफे की तरह मोदी तक पहुंची थी।
दरअसल सत्ता की जिम्मेदारियां लोगों की सोच को बदलती है, या उन्हें बेबस करती है। मोदी और सुषमा भी अगर विपक्ष में होते तो पोशाक या टोपी-शॉप को लेकर वे भी कुछ उसी तरह की बातें कहते, जिस तरह की बातें आज सोशल मीडिया पर लोग उनके बारे में कह रहे हैं। लोगों को यह भी याद होगा कि कई बरस पहले जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात तय सी दिख रही थी, तब संसद में सुषमा स्वराज ने कहा था कि जिस दिन सोनिया प्रधानमंत्री बनेंगी, उस दिन वे अपना सिर मुंडा लेंगी। यह बात न तो साधारण बात थी और न ही किसी अच्छी संस्कृति की बात थी। लेकिन उस दिन उनकी कही बात से देश में जिस तरह की संस्कृति को बढ़ावा मिला था, वही अब उनकी हरी साड़ी या उनकी शॉल को लेकर उनका मखौल बना रही है। इसलिए जो लोग सत्ता में रह चुके हैं, वे विपक्ष में जाने के बाद इन बातों को ध्यान रखें कि अजमेर आए हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बिरयानी खिलाना कोई जुर्म नहीं था, और ऐसी कई बिरयानियां प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी नवाज शरीफ को या पाकिस्तानी मंत्रियों को, या पाकिस्तान से आए हुए जांचदल को खिला चुके थे। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में ओछेपन से बचना चाहिए, क्योंकि ओछापन लौटकर आकर अपने पर ही वार करता है।

असम आकर लौट गए ब्रिटिश राजघराने को लिखना चाहिए...

संपादकीय
17 अप्रैल 2016
जिस असम में ब्रिटिश राजकुमार और उनकी पत्नी ने दो दिन पहले पहुंचकर गेंडे और हाथी के बच्चों को दूध पिलाया, और लोकनृत्य देखा, वहां जंगल में बैठकर चाय पी, उन चाय बागानों की हकीकत बड़ी डरावनी है। और हो सकता है कि ब्रिटिश शाही घराने के इन मेहमानों को हिन्दुस्तानी चाय के पीछे की उस हकीकत की जानकारी भी न हो। वहां चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर भूख और बीमारी में मर रहे हैं। उनकी तस्वीरें इतनी भयानक हैं कि उनको छापते भी डर लगता है कि अखबार देखने वाले लोगों पर उसका कैसा असर होगा।
लेकिन दुनिया का रिवाज कुछ इसी तरह का है। दुनिया के संपन्न देश जिस फुटबॉल से खेलते हैं, जिन कपड़ों को पहनकर खेलते हैं, उनको तैयार करने वाले बांग्लादेश के बाल मजदूर जिंदा रहने जितनी मजदूरी भी नहीं पाते, और यह मुद्दा बरसों से विकसित और संपन्न देशों के सामने तैरते खड़ा है। संपन्न दुनिया सस्ती मजदूरी के लिए अपना बहुत सा काम गरीब देशों को देती है, और एक हकीकत यह भी है कि ऐसी मजदूरी के चलते हुए ही गरीब देशों में लोगों के पेट में कुछ जा पाता है। दूसरी तरफ संपन्न दुनिया प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को एक-एक कर बंद करती जा रही है, और उन कामों के लिए गरीब देशों को देखा जाता है, वहां पर वैसे कारखाने लगवाए जाते हैं, और वहां का पर्यावरण तबाह करने की कीमत पर विकसित देश अपने आपको साफ-सुथरा रखते हैं।
और दुनिया में पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए विकसित देशों को सामानों के अपने इस्तेमाल में जो कटौती लानी चाहिए, वह एक के बाद एक, बरसों से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी अमरीका की तरह के संपन्न, फिजूलखर्च, लेकिन ताकतवर देश मानते नहीं हैं, और उसके लिए तैयार नहीं होते हैं। धरती के साधनों के इस्तेमाल में हर इंसान के बराबरी के हक की बात होती है, लेकिन ताकतवर अपनी लाठी के दम पर जरूरत से अधिक, अनुपात से अधिक सामानों और साधनों को झपट लेते हैं, और धरती पर बोझ बढ़ाते चलते हैं, धरती को दुहते चलते हैं। ऐसा भी नहीं कि विकसित और संपन्न देशों के सामने ये मुद्दे नहीं रखे जाते। हर अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन, मौसम सम्मेलन में, समानांतर सम्मेलन चलते हैं जिनमें पर्यावरण आंदोलनकारी गरीब देशों के पक्ष में आवाज उठाते हैं और संपन्न देशों को अधिक बोझ उठाने के लिए कहते हैं, अधिक सामाजिक जवाबदेही निभाने के लिए कहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में सदियों से यह कहा जाता है कि समरथ को नहिं दोष गुसांई, या जिसकी लाठी उसकी भैंस। इसलिए लोगों की मांग सड़कों के बैनरों पर धरी रह जाती है, और ताकतवर देश इन सम्मेलनों में आकर अपनी मर्जी से लौट जाते हैं, बिना कोई जिम्मेदारी निभाए।
विकसित देशों के भीतर ऐसे सामाजिक आंदोलन चल रहे हैं जो कि वहां इस्तेमाल होने वाले सामानों के पीछे लगने वाली गरीब देशों की मजदूरी और मजदूरों की फिक्र करते हैं। असम की चाय पीकर लौटे ब्रिटिश राजघराने को कोई याद दिलाएगा कि असम में जनता की जिंदगी में लोकसंगीत और लोकनृत्य ही नहीं हैं, और चाय बागानों में भूख और बीमारी से मौत भी है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों को इन बातों को जोड़कर सामने रखना चाहिए, और हो सकता है कि असम का नमक खाकर लौटे ब्रिटिश राजकुमार अपने देश की जिम्मेदारी को कुछ समझ पाएं।

मिट्टी के मोल पहुंचा प्याज किसान आत्महत्या न करे...

संपादकीय
16 अप्रैल 2016
मध्यप्रदेश से खबर है कि वहां की मंडियों में थोक में प्याज 20 पैसे किलो तक बिक रहा है। अपने सबसे नीचे स्तर पर भी यहां पर प्याज थोक में एक रूपए से पांच रूपए किलो तक बिकता था, और आज हाल यह है कि किसानों को मंडी तक प्याज लाने की लागत भी इस रेट पर नहीं निकल पा रही है। यह हाल सिर्फ प्याज को लेकर नहीं है, भारत की खेती के बहुत से दायरों में यही हाल है। और देश के लोगों की सोच ऐसी है कि जो चीजें बेकाबू हैं, उनके दाम चुकाते हुए लोगों के चेहरों पर शिकन नहीं पड़ती, लेकिन सब्जी उगाने वाले, या खेती करने वाले, या मेहनत-मजदूरी की रोजी लेने वाले लोगों का भाव बढऩे से मध्यम और उच्च वर्ग के तन-बदन में मानो आग लग जाती है। सोशल मीडिया पर लोग बड़ी तल्खी के साथ यह बात लिख रहे हैं कि जिस दिन देश का आखिरी किसान आत्महत्या कर लेगा, उस दिन बाकी देश भी भूख से मर चुका रहेगा।
लोग खेती पर सरकारी सब्सिडी की आलोचना करते हैं। लेकिन खेती का क्या कोई विकल्प है? अनाज और सब्जियों, दाल और फल को क्या कारखानों में उगाया जा सकता है? दुनिया के सबसे विकसित और सफल देशों में भी खेती पर बड़ी सब्सिडी जारी रहती है। लेकिन हम अंतहीन सब्सिडी की वकालत बिल्कुल नहीं कर रहे हैं। हमारा मानना है कि खेती को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बाकी चीजों के साथ जोड़कर किसान की जिंदगी को कामयाब बनाने की योजनाएं बनाना केन्द्र और राज्य सरकार का काम है।  न सिर्फ अनाज उगाने, बल्कि दूध, अंडे, शहद, मशरूम, जैसी सैकड़ों चीजें हैं जिनको किसानी के साथ अगर जोड़ा जाए, तो किसान आत्मनिर्भर हो सकते हैं। लेकिन सरकारी योजनाओं का ऐसा एकजुट होना मुमकिन नहीं हो पाता, और इसी के साथ-साथ किसान का महज किसानी से जिंदा रहना भी मुमकिन नहीं हो पाता है। देश के लोगों को तो किसान की उपज के लिए अधिक दाम देने के लिए तैयार रहना ही चाहिए, जिस तरह वे आयातित पेट्रोलियम के घटते-बढ़ते दामों के लिए तैयार रहते हैं, जैसे कि वे आसमान छूते हुए सोने-चांदी के दाम के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन साथ-साथ सरकारों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के गैर-किसानी उत्पादक पहलुओं को बढ़ावा देने का काम करना ही होगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बुनकरी से लेकर कुटीर उद्योग तक हजारों ऐसी स्थानीय संभावनाओं वाली बातें हैं, जिनको बढ़ावा देकर राज्य सरकारें लोगों की जिंदगी बेहतर और खुशहाल कर सकती हैं। सिर्फ धान जैसी गरीब फसल को उगाकर लोगों का जिंदा रहना मुश्किल है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां अधिकतर फसल सरकार अच्छे दामों पर खरीद लेती है, वहां किसान दूसरी फसल की तरफ जाने की सोच भी नहीं पाते। देश में बेहतर दाम वाली फसलों, आयात-विकल्पों, और गैरफसली उपजों के बारे में सोचने की जरूरत है और करने की भी। किसानों की आत्महत्या के बाद उनके परिवारों को आर्थिक मदद देना सबसे ही खराब विकल्प है।
हम छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो यहां भी कुछ ऐसे इलाके हैं जहां हाथकरघा इतना सफल है कि पूरे के पूरे गांव सूखे में भी भूखे नहीं रहते, और वहां से लोग निकलकर काम की तलाश में दूसरे प्रदेशों में भी नहीं जाते। अगर जिला पंचायतों को मजबूत बनाकर जिलों के स्तर पर किसानों की आत्मनिर्भरता के रास्ते ढूंढे जाएं, तो पूरा का पूरा राज्य कहीं का कहीं पहुंच सकता है।

बातचीत से लोकतंत्र न लौटे तो लोगों के भटकने का खतरा

संपादकीय
15 अप्रैल 2016
कश्मीर में अभी एक तनाव चल रहा है कि वहां एक फौजी द्वारा लड़की को छेडऩे का आरोप लगा, और बाद में शहर में तनाव फैल गया। पुलिस गोली से अब तक शायद चार लोग मारे जा चुके हैं, और तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा। उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्से की तरह कश्मीर में भी सेना को कई किस्म के मामले-मुकदमे से बचाने के लिए एक अलग कानून लागू है जिसके चलते उस पर बलात्कार के मुकदमे भी नहीं चल सकते। और जिन-जिन प्रदेशों में ऐसा कानून लागू है, वहां पर लगातार स्थानीय जनता की यह मांग रहती है कि इसे खत्म किया जाए क्योंकि इसके चलते हुए फौजियों के किए हुए जुर्म बढ़ते जाते हैं। पिछले दो दिनों से उत्तर-पूर्व का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर फैला हुआ है जिसमें एक दुकानदार युवती एक फौजी को पत्थरों और हाथों से पीट रही है, और उसका आरोप है कि फौजी उसकी दुकान में कपड़े खरीदने आया, और उसे छूने लगा। इसी वीडियो में उस फौजी का साथी भी उसे पीटते दिखता है, और मामले को ठंडा करने की कोशिश करता है। कश्मीर के हन्दवाड़ा में चल रहे तनाव के बीच पुलिस और फौज ने शिकायत करने वाली लड़की का एक वीडियो बयान जारी किया है जिसमें वह कहती सुनाई पड़ती है कि उसके साथ छेडख़ानी एक स्थानीय नौजवान ने की थी, जो कि उस पर फौजी से संबंध रखने का आरोप लगा रहा था।
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में पिछले कुछ महीनों में ऐसी कई शिकायतें आई हैं कि सुरक्षा बलों ने महिलाओं के साथ बलात्कार किया, और उनके शरीर के साथ खिलवाड़ किया। पिछले दिनों राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष अपनी टीम लेकर बस्तर आए, और शिकायत करने वाली महिलाओं से मिलकर उन्होंने लौटकर राजधानी में शासन और मीडिया को कहा कि महिलाओं ने बलात्कार की शिकायतें दुहराई हैं, और देश के कानून के मुताबिक उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। बस्तर में कश्मीर या उत्तर-पूर्व जैसा विशेष कानून लागू नहीं है जिसमें सुरक्षा बलों को मुकदमे से रियायत मिले, यह एक अलग बात है कि पुलिस या सुरक्षा बलों के खिलाफ न शिकायत आसान होती, न कार्रवाई आसान होती, और न ही इंसाफ आसान होता।
जिन इलाकों में भी सरकारी वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी बरसों तक तैनात रहते हैं वहां पर ऐसी शिकायतें खड़ी होती ही हैं। इसकी एक वजह यह है कि जहां लगातार बंदूकों का, या आतंकी, उग्रवादियों के हथियारों का राज चलता है, वहां पर नागरिक अधिकार, या मानव अधिकार हाशिए पर चले जाते हैं। दूसरी बात यह रहती है कि ऐसे इलाकों में आतंकियों, अलगाववादियों, या उग्रवादियों पर ये आरोप भी लगते हैं कि वे बंदूकों की नोंक पर ऐसी झूठी रिपोर्ट दर्ज करवाते हैं ताकि सुरक्षा बलों का मनोबल टूटे। लोकतंत्र में ये दोनों ही बातें मुमकिन हैं, और इन दोनों से बचने के रास्ते ढूंढने चाहिए। बलात्कार हुए हों, या बलात्कार की झूठी रिपोर्ट हुई हो, ये नौबत वहीं पर अधिक आती है जहां पर लोकतंत्र निलंबित सा रहता है, और बंदूकों के हवाले हिफाजत रहती है। इसलिए लोकतंत्र में देश या प्रदेश दोनों को ही तमाम किस्म के हथियारबंद आंदोलनों को टालने, दबाने, खत्म करने, या सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार अगर बंदूकों के हमलों के मुकाबले बंदूकों का इस्तेमाल करती है, तो उसे कोई नाजायज नहीं कह सकते। लेकिन इसे अगर टाला जा सके, तो उन इलाकों में लोकतंत्र की वापिसी हो सकती है, लोगों का भरोसा लोकतंत्र के राज पर लौट सकता है। इसलिए हमारा मानना है कि नक्सल हिंसा हो, या कश्मीर का अलगाववाद हो, या मणिपुर का उग्रवाद हो, हर किस्म के हथियारबंद आंदोलन से बातचीत से निपटने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि बातचीत से रास्ता अगर न निकले, तो ऐसे इलाकों के लोग लोकतंत्र से परे की ताकतों पर, और विकल्पों पर भरोसा करना शुरू कर देते हैं।

अंबेडकर प्रतिमाओं पर मेले, और उनकी सोच ताक पर

संपादकीय
14 अप्रैल 2016
कई राज्यों में चुनावों के चलते हुए अभी अचानक कई तबकों की अहमियत राजनीति में एकदम से बढ़ गई है। कहीं मंदिर में बड़ी संख्या में मौतें हुईं, तो मोदी से लेकर राहुल तक सभी पहुंच गए। अभी अंबेडकर जयंती आई तो प्रधानमंत्री के लिए मध्यप्रदेश के महू में सरकारी आदेश से कॉलेजों के छात्र-छात्राओं को बुलवाया गया, और नागपुर की दीक्षाभूमि के समारोह के ठीक पहले राहुल-सोनिया की वहां पर सभा हुई। अंबेडकर को लेकर आज केन्द्र की भाजपा सरकार से लेकर भाजपा तक जितने जोश के साथ समारोह मनाने में लगे हुए हैं, उससे दलित खुश तो हो सकते थे, लेकिन अगर देश में उनकी हालत सचमुच बेहतर हुई रहती। लेकिन भाजपा के शासन वाले मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, और बाकी कई जगहों पर भी दलितों के साथ जो सुलूक हो रहा है, वह दलित तबकों के लिए किसी जश्न का मौका नहीं, फिक्र का मौका है।
दलित और आदिवासी कई मुद्दों में एक दूसरे के करीब रहने वाले तबके हैं, और सवर्ण हिन्दू समाज का बर्ताव इन दोनों तबकों के साथ कमोबेश एक ही तरह की हिकारत का रहता है। ऐसे में दलित और आदिवासी दोनों ही इस देश में गोमांस या बीफ को लेकर फैलाई जा रही एक दहशत को लेकर भी अपने आपको खतरे में महसूस करते हैं क्योंकि इन दोनों तबकों में परंपरागत रूप से, नियमित खानपान में गोमांस के इस्तेमाल का इतिहास रहा है, और तबसे रहा है जब हिन्दू धर्म बना भी नहीं था। देश के आदिवासी हिन्दुओं के बहुत पहले के हैं, और वे ही असली मूल निवासी हैं। उनकी खानपान की आदतों को हाल के बरसों में एक नई शुद्धतावादी हमलावर सनातनी सोच के चलते जिस तरह जुर्म करार दिया जा रहा है, उससे दलित और आदिवासी दोनों तबके फिक्रमंद हैं।
आज चुनावी राजनीति के चलते कोई पार्टी किसी दूसरी पार्टी को पीछे छोडऩे के लिए अगर अंबेडकर-प्रेम, भगतसिंह-प्रेम में लग जाती है, तो वैसे में उस पार्टी की बुनियादी सोच और उसके कामकाज के बारे में अधिक बारीकी से देखने की जरूरत रहती है। आज अंबेडकर की प्रतिमाओं पर मेले लगाना तो ठीक है, लेकिन अंबेडकर जिस समाज के जिन लोगों को इंसानी हक दिलाने के लिए लड़ते रहे, और जिनका सारा सामाजिक काम जिस दलित तबके को सवर्ण हिंसा से बचाने में लगे रहा, उस दलित तबके के खानपान से लेकर, समाज में उसके जिंदा रहने तक पर खतरा मंडरा रहा है। अभी दो-चार दिन पहले ही खबर थी कि उत्तर भारत में बलात्कार के बाद एक दलित महिला ने आत्महत्या कर ली, और अब उसके समाज के हजार परिवार इस्लाम को अपनाने जा रहे हैं। यह सिलसिला सामाजिक और राजनीतिक पाखंड पर एक सवाल खड़ा करता है। अंबेडकर के विचारों के ठीक खिलाफ काम करने वाले लोग आज अगर उनके नाम का झंडा लेकर चल रहे हैं, तो उनका सामना बहुत से सवालों के साथ किया जाना चाहिए।

आखिरी सांस तक कोशिश तो जारी रखनी ही चाहिए

संपादकीय
13 अप्रैल 2016
जिंदगी कैसी दिलचस्प रहती है, और कैसे-कैसे करवट बदलती है यह देखना हो तो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को देखना चाहिए, और उन्होंने जिस भारतीय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा को एक डिनर पर बुलाया है उनको भी देखना चाहिए। प्रियंका चोपड़ा इन दिनों अमरीकी फिल्म-टीवी उद्योग में कई कामों में लगी हैं, और कुछ दूसरे फिल्म कलाकारों के साथ ओबामा ने प्रियंका को भी न्यौता भेजा है। अब इसमें चर्चा की बात यह है कि कल भारत के राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने के बाद प्रियंका ने एक सवाल के जवाब में कहा कि वे अभी हॉलीवुड में अपने सीरियलों में व्यस्त हैं और अभी यह तय नहीं है कि वे ओबामा की दावत में जा पाएंगी या नहीं। सच तो यह है कि जिस अमरीकी राष्ट्रपति की जिस दावत का न्यौता पाने के लिए लोग अपना दायां हाथ तक देने को तैयार हो जाएं, उसमें जाने के बारे में एक नौजवान भारतीय अभिनेत्री का ऐसा कहना, उसे मिले न्यौते के मुकाबले कई गुना अधिक महत्वपूर्ण है। 
दूसरी तरफ खुद बराक ओबामा को देखें, तो अमरीका के अश्वेत समुदाय का एक गरीब लड़का, जिसके मां-बाप अफ्रीका से अमरीका पहुंचे थे, वह आगे बढ़कर अमरीका का एक बेदाग राष्ट्रपति बनता है, यह अपने आपमें देखने लायक बात है। तीसरी बात यह कि असम में कल पहुंचे ब्रिटिश राजकुमार और राजकुमारी के सामने वहां का लोकनृत्य पेश करने वालों में तीन बरस का एक बच्चा भी था, और तीन बरस के उस बच्चे ने कीचड़सने अपने जूते से राजकुमारी के जूतों पर कीचड़ मल दिया। अब मजाक की बात यह है कि यह भारत को गुलाम बनाने के ब्रिटिश राजघराने के काम का हिसाब चुकता किया गया, और इस तरह यह बच्चा आजादी की पौन सदी बाद भी एक नया स्वतंत्रता सेनानी बन गया है। 
वक्त कई तरह की करवटें लेता है, जिंदगी के अलग-अलग पहलुओं में इतना कुछ होते रहता है कि उससे लोग फर्श से अर्श तक पहुंच जाते हैं, और कुछ गलत काम हों तो अर्श से फर्श पर पटक भी दिए जाते हैं। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ही लें, बचपन में चाय बेचने के उनके दावे पर हालांकि कुछ लोग शक करते हैं, लेकिन ऐसे शक की कोई बुनियाद न होकर उन लोगों की नापसंदगी इसमें अधिक है। और चाय बेचने वाला एक बच्चा आगे बढ़कर किस तरह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का, सबसे बड़ी चुनावी कामयाबी के साथ बनने वाला प्रधानमंत्री हो सकता है, यह अपने आपमें हैरान करने वाली बात है। इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यह है कि जो लोग जिंदगी से हताश और निराश होकर हथियार डाल देने की कगार पर हैं, उनको याद रखना चाहिए कि दुनिया का इतिहास ऐसे आखिरी पलों के पहले के हौसले से लिखा जाता है, हौसला छोडऩे से नहीं। इसलिए लोगों को याद रखना चाहिए कि जिंदगी में कभी भी, कुछ भी हो सकता है, वक्त करवट बदल सकता है, और नई संभावनाएं आ सकती हैं। इसलिए हर किसी को अपनी आखिरी सांस तक कोशिश तो जारी रखनी ही चाहिए।

मंदिर में आने पर महिलाओं को बलात्कार की धमकी!

संपादकीय
12 अप्रैल 2016
भारत के कई शंकराचार्यों में से एक, स्वरूपानंद सरस्वती ने एक बार फिर शिरडी के सांईबाबा पर हमला करते हुए कहा है कि महाराष्ट्र में सूखा इसलिए पड़ा है क्योंकि वहां सांईबाबा की पूजा हो रही है। इसके पहले भी वे सांईबाबा के मंदिर बनाने और पूजा करने को लेकर हफ्तों तक बयानबाजी करते रहे हैं, और ऐसा करने वालों को हिंदू मानने से भी उन्होंने इंकार कर दिया था। अभी उन्होंने एक ताजा बयान में बड़ी दिलचस्प बात कही है कि नासिक के शनि शिंगणापुर शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से बलात्कार बढ़ेंगे। यह बात कई लोगों को नागवार गुजर रही है और महिला अधिकारों की बात करने वाले लोग शंकराचार्य पर टूट पड़े हैं।
लेकिन हमें शंकराचार्य की बात में दम दिखता है। धर्म से जुड़े हुए लोग जिस तरह महिलाओं का शोषण करते हैं, और जिस तरह मंदिरों में देवदासियों की प्रथा चलती है, एक से बढ़कर एक बाबा और गुरू सेक्स में लगे हुए पकड़ाते हैं, स्वामियों के वीडियो इंटरनेट पर तैरते हैं, इन सबको देखकर यह बात तो जाहिर है कि अगर महिलाओं का धर्मस्थलों पर जाना बढ़ेगा तो धर्म पर काबिज पुरूषों के हाथों उनके साथ बलात्कार अधिक हो सकते हैं। लेकिन शंकराचार्य ने जिस दकियानूसी तरीके से यह बात कही है, उसे धिक्कारने की जरूरत है।
लोग स्वरूपानंद सरस्वती को मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुछ अधिक देखते हैं क्योंकि यहीं पर कांगे्रस के बहुत से नेता उनके भक्त और अनुयायी हैं, और बोलचाल की जुबान में उन्हें कांगे्रस शंकराचार्य कहा जाता है क्योंकि राजनीतिक मामलों में वे लगातार कांगे्रस की तरफ से और भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ते आए हैं। लेकिन आज इस पर लिखने का एक दूसरा मकसद है। जब महिलाओं के खिलाफ ऐसे भयानक दकियानूसी बयान देने वाले धर्मगुरू आते हैं, और राज्य सरकारें उनको राजकीय अतिथि का दर्जा देती हैं, तो यह समझने की जरूरत है कि जनता का पैसा ऐसी हिंसक और महिला विरोधी बातें करने वालों पर क्यों खर्च किया जाता है। इस बारे में सवाल उठाने चाहिए, और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में स्वरूपानंद सरस्वती को मानने वाले नेताओं से उनके इलाकों में महिलाओं को सवाल करना चाहिए कि क्या वे भी मंदिर में जाने वाली महिलाओं को बलात्कार की धमकी देंगे?
यह देश धर्म के हाथों तबाह हो रहा है। आस्थावान लोगों में से जो लोग शांत रहते हैं वे मानकर चलते हैं कि धर्म का असर अच्छा ही होता है। लेकिन जिन पर असर ऐसा अच्छा होता है वे घर बैठे रहते हैं, और धर्म के नाम पर हिंसक बातें करने वाले सड़कों पर हथियार लेकर, या लाऊडस्पीकर पर महिला विरोधी, साम्प्रदायिक, और भेदभाव की आग लगाने वाली बातें करते हैं। छत्तीसगढ़ में जब कभी ऐसे लोग आएं, तब इन लोगों को घेरकर सवाल किए जाने चाहिए कि महिलाओं को अगर मंदिर में जाने से बलात्कार का खतरा बढ़ेगा, तो फिर महिलाएं किसी धर्मगुरू के आश्रम, या उनके प्रवचन में भी क्यों आएं?

एक शहंशाह ने हजारों रूपए प्लेट की दाल को पद्मश्री देकर भूख का उड़ाया है मजाक

11 अप्रैल 2016

अभी जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पद्म सम्मान बांटे, तो इम्तियाज कुरैशी नाम के एक बुजुर्ग खानसामे को भी पद्मश्री मिला। कई दशकों से कुरैशी दिल्ली की शाही दावतों के लिए पकाते आ रहे हैं, और उनका नाम देश की राजधानी के एक सबसे महंगे रेस्त्रां के साथ जुड़ा हुआ है और वे कुछ खास तकनीक से धीमी आंच पर तरह-तरह की चीजें पकाने के लिए जाने जाते हैं। दिल्ली के आलीशान रेस्त्रां, बुखारा, में उनकी व्यंजन विधि से बनाई गई दाल-बुखारा दुनिया में सबसे मशहूर दाल में से एक मानी जाती है, और यह कुछ अरसा पहले डिब्बाबंद रसगुल्ले की तरह डिब्बे में पैक होकर दिल्ली के एयरपोर्ट पर भी बिकती थी। इम्तियाज कुरैशी को यह शोहरत भी हासिल है कि नेहरू और इंदिरा भी इनके पकाए खाने पर फिदा रहते थे।
किसी भी देश के राष्ट्रीय सम्मान उस देश की हकीकत, और उसकी सोच, इन दोनों का मिलाजुला हिसाब होना चाहिए। यह देश कुपोषण का शिकार है, भुखमरी का शिकार है, जो भूख से मर नहीं पाते, वे भी भूखे पेट सोने के लिए बेबस रहते हैं। ऐसे में इस देश में कई संगठन आए और गए जिन्होंने शादियों की दावत के बाद बचे हुए खाने को मांगकर, अपनी गाडिय़ों में भरकर उसे गरीब बस्तियों में ले जाकर गरीबों के बीच बांटा। अभी मुंबई में घर से दफ्तर टिफिन पहुंचाने वाले दुनिया के मशहूर डिब्बावालों ने भी गरीबों तक खाना पहुंचाने की एक पहल शुरू की है जिसके बारे में काफी कुछ छप भी चुका है। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में कई सामाजिक संगठन ऐसे हैं जो कि गरीबों के खानपान में मदद करने के लिए जाने जाते हैं।
अभी मुझे जितना याद पड़ता है, ऐसे किसी संगठन को देश का यह सरकारी-राजकीय सम्मान, पद्मश्री नहीं दिया गया है। और एक ऐसे रसोइये को यह सम्मान देना जिसके पकाए हुए, जिसके तरीके से पकाए हुए खाने के लिए कम से कम कुछ हजार रूपए लगते हों, उसे पद्मश्री देना देश की आज की सोच को बताता है।
हालांकि कुछ लोगों को यह आलोचना अटपटी लग सकती है क्योंकि भारत के ये राजकीय सम्मान तो शुरू होने से लेकर अब तक कई ऐसे कलाकारों, संगीतकारों, और जानकारों को दिए गए हैं जो कि शास्त्रीय विधाओं वाले रहे हैं। जिनके काम का आम लोगों से, आम जिंदगी से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा। वे शहंशाह अकबर के दरबार के चुनिंदा नवरत्नों की तरह के कलाकार थे जो कि चुनिंदा संपन्न या कि जानकार श्रोताओं के लिए, या रसिकों के लिए कला करते हैं। उनकी कला क्लासिकल कहलाती है, क्लास के लिए। देश मास (आम जनता) से भरा हुआ है। लेकिन कोई कला मासिकल नहीं कहलाती। ऐसे लोगों का काम बहुत ही गिने-चुने लोगों को सुख देने वाला रहता है, लेकिन वह राजकीय सम्मान का हकदार माना जाता है क्योंकि राजा का रसिक होना जरूरी होता है और पारखी होना दिखाने के लिए उसे ऐसे सम्मान देने ही पड़ते हैं।
दूसरी तरफ देश की आम जनता से जुड़ी हुई आदिवासी कलाओं, लोककलाओं का इस देश में बड़ा समृद्ध और संपन्न भंडार है। ये कलाएं किसी शास्त्रीय विधा की तरह व्याकरण के नियमों में बंधी हुई नहीं रहतीं, और इनमें श्रोता-दर्शक और कलाकार एक-दूसरे में घुलते-मिलते रहते हैं। ऐसी कलाओं का एक सामाजिक सरोकार भी होता है, और वे शास्त्रीय कलाओं की तरह नियमों में बंधने और बांधने के आतंक से घिरी हुई भी नहीं रहतीं। लोककलाएं जिंदगी का एक हिस्सा रहती हैं, और उनका योगदान रोज की जिंदगी में रहता है, काम के बाद, दिन पूरा हो जाने के बाद लोग नाच-गा लेते हैं, और वैसी कला मजदूरों के पसीनों से लेकर उनके मिट्टीसने बदन तक से संपन्न रहती हैं।
इसी तरह गरीबों के खानपान और उनके कुपोषण से जूझने वाले लोग बहुत से हैं। बहुत से सामाजिक संगठन देश भर में यह काम कर रहे हैं, और वैसे संगठनों के, उनको शुरू करने वाले लोगों को ऐसे राजकीय सम्मान मिलना याद नहीं पड़ता।
आज देश के राष्ट्रपति से लेकर केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी तक, और देश भर के प्रदेशों में सत्ता पर काबिज अधिकतर लोगों तक की समझ एक संपन्न और ताकतवर तबके की समझ है। अगर यह समझ किसी विपन्न तबके की समझ होती, तो हजार रूपए प्लेट की दाल के लिए मशहूर खानसामे को देश का राजकीय सम्मान देने के पहले वह कुछ सोचती कि ऐसा खाना कितने एकनंबरी लोग खा सकते हैं? अमूमन कई हजार रूपए से एक वक्त का पेट भरने वाले लोग दोनंबरी से लेकर दसनंबरी तक हो सकते हैं, लेकिन एकनंबरी शायद ही हों। और जिस देश में आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो वहां पर ऐसी संपन्नता के प्रतीक खानसामे को राजकीय सम्मान से एक क्रांतिकारी शायर साहिर लुधियानवी की यह कविता याद पड़ती है- एक शहंशाह ने बनवाके हंसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक।
हम पहले भी इस बात को लगातार लिखते आए हैं कि सरकारों को सम्मान बांटने के शौक को छोडऩा चाहिए। एक वक्त राजा अपने दरबार में जिससे खुश होते थे, अपने गले की माला निकालकर उसे दे देते थे। आज भी उसी अंदाज में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मातहत इसी तरह से सम्मान बांटे जाते हैं। खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कुछ बरस पहले केन्द्र सरकार का हिस्सा रहते हुए एक पद्म सम्मान पाया था, और सत्तारूढ़ राजनीति से परे उनका कोई योगदान जिंदगी में कभी नहीं रहा। सत्ता की राजनीति, पार्टी के लिए चंदा जुटाने के लिए चर्चित, और अपने कुनबे को राजनीति में आगे बढ़ाने के लालची, यूपीए सरकार के हर भ्रष्ट फैसले के इर्द-गिर्द या उसके बीच रहने वाले प्रणब मुखर्जी को पद्म सम्मान देकर देश का खुद का कौन सा सम्मान बढ़ा?
सत्ता की सामाजिक समझ, और उसके सामाजिक सरोकार बहुत ही सीमित होते हैं। जैसे-जैसे गांधी की मौत पुरानी पड़ती जा रही है, वैसे-वैसे ये सरोकार और भी खत्म हो रहे हैं। अब कुपोषण से घिरे हुए गुजरात में हजारों करोड़ की सरदार-प्रतिमा बनाई जा रही है, जिसके लिए नारा यह लगा था कि उसे देश भर के किसानों से मांगकर लाए गए लोहे से बनाया जाएगा। इसी तरह गरीबों और दलितों की स्वघोषित मसीहा मायावती ने उस उत्तरप्रदेश में हजारों करोड़ से अपने जिंदा रहते अपने स्मारक बनवा दिए जहां लोग आज घास की रोटी बनाकर खाने को मजबूर हैं, बुंदेलखंड भूख से मर रहा है। देश में जगह-जगह सरकारों के सरोकार का यही हाल है। जिस महाराष्ट्र में शिवाजी की प्रतिमा के लिए हजारों करोड़ रूपए खर्च करना शुरू हो गया है, उस महाराष्ट्र में शिवाजी की हजारों संतानें खेतों में खुदकुशी कर चुकी हैं, और कुपोषण के शिकार आदिवासी बच्चे बड़ी संख्या में मर रहे हैं, और पूरे के पूरे इलाके सूखे की चपेट में हैं।
हजारों रूपए प्लेट की दाल को पद्मश्री ऐसी ही सोच की एक कड़ी है, और पूरे देश को राजकीय सम्मानों को धिक्कारना चाहिए, और लोकतांत्रिक लोगों को ऐसे सम्मान खारिज करने चाहिए, लेने नहीं चाहिए।

जलसंकट पर हिन्दुस्तान की नींद अब भी नहीं खुल रही

संपादकीय
11 अप्रैल 2016

महाराष्ट्र के लातूर जिले के आसपास पानी का बुरा हाल बरसों से चल रहा है, और कई जगहों पर रेलगाड़ी के टैंकरों से पानी पहुंचाते भी बरसों हो चुके हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में भी सरगुजा के कुछ गांवों की तस्वीरें आती हैं कि वहां लोग पत्थरों के बीच से झरते हुए पानी को लेने के लिए किस कदर गहरे उतरते हैं, या पहाड़ चढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ से लगे हुए मध्यप्रदेश के जिले डिंडौरी की तस्वीरें आई हैं कि कैसे गहरे पक्के कुएं की दीवारों पर से उतरकर बच्चे नीचे जाते हैं, और कटोरियों से बाल्टी भरकर पानी ऊपर भेजते हैं। महाराष्ट्र की महिलाओं का हाल भी मीडिया में सामने आया है कि किस तरह वे रात दो बजे से पानी की कतार में लग जाती हैं।
आज पूरे देश में कुछ हिस्सों में बाढ़ आती है, और उसकी तबाही में कई प्रदेशों के कई हिस्से डूब जाते हैं। ऐसे पानी को मोडऩे के लिए नदीजोड़ योजना की बात चल रही है, सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कई तरह के वायदे भी किए हैं, लेकिन वह कुछ सीमित नदियों के सीमित हिस्सों की बात है। उससे परे भी अगर देखें तो देश भर में नदियों तक पहुंचने वाले पानी का इक_ा होने वाला इलाका बहुत बड़ा रहता है। कैचमेंट एरिया कहा जाने वाला यह इलाका बहते हुए पानी को जब रोक नहीं पाता, तो वह पानी मिट्टी के साथ नदियों में पहुंचता है, और वहां गहराई को घटाते हुए, जलस्तर को बढ़ाते हुए बाढ़ ला देता है। और फिर यह पानी समंदर में जाकर मिलता है, जिसके दुबारा इस्तेमाल होने की संभावना खत्म हो जाती है।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने पहले कई मौकों पर यह लिखा है कि बारिश के पानी की एक-एक बूंद को धरती में सहेजने की कोशिश की जानी चाहिए। इसके लिए बड़े-बड़े ऐसे तालाब खोदे जाने चाहिए जहां पर कैचमेंट एरिया का पानी रोका जा सके, और फिर वह पानी जमीन के नीचे जाकर वहां के जलस्त्रोतों को बढ़ा सके। आज शहरों में या गांवों में भी जहां कहीं नलकूप खोदे गए हैं, हर बरस उनमें पानी नीचे जा रहा है, और भूजल स्तर गिरते चल रहा है। इसे बचाने का एकमात्र तरीका बारिश के पानी को धरती में भेजने का है, और इससे अधिक सस्ता कोई काम हो नहीं सकता। लेकिन चूंकि धरती का एक वोट भी नहीं है, इसलिए उसकी प्यास की आवाज उठाने वाले कोई लोग नहीं हैं। लोग अपने गांवों के आसपास तालाब खुदवाने की बात करते हैं, मौजूदा तालाबों को गहरा करने की बात करते हैं, लेकिन इंसानों और जानवरों के इस्तेमाल के ऐसे तालाबों से परे, महज धरती के इस्तेमाल के तालाब बड़ी संख्या में बनाने की जरूरत है। इसके लिए इंसानी मजदूरी का इस्तेमाल भी हो सकता है, या सरकार कम खर्च में मशीनों से भी काम करवा सकती है। इसके लिए आसपास गांवों का रहना भी जरूरी नहीं है, और कैचमेंट एरिया में जहां कहीं पानी को रोका जा सकता है, वहां बंजर जमीन देखकर ऐसे तालाब बड़ी संख्या में बनाने की जरूरत है ताकि जमीन के भीतर पानी जा सके, और नदियों में बाढ़ घट सके।
इस बारे में छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से आज तक कोई काम नहीं हुआ है। इमारतों की छत पर गिरने वाले बारिश के पानी के लिए तो रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की शर्त लगाई गई है, जो मोटे तौर पर कागजों पर चल रही है। लेकिन नदियों में जिन इलाकों से खूब पानी पहुंचता है, वहां पर तालाब बनाकर बहुत पानी रोका जा सकता है, और सरकार को इस बारे में तेजी से काम करना चाहिए। ऐसा काम सस्ता भी रहेगा, और भूजल स्तर ऊपर आने से पंपों में लगने वाली बिजली भी घटेगी, और गहरे नलकूप खोदना भी घटेगा। 

बड़ी भीड़ के हादसे रोकने शिक्षण-प्रशिक्षण जरूरी

संपादकीय
10 अप्रैल 2016

केरल के एक मंदिर में आतिशबाजी से हुए हादसे में सौ से अधिक लोग मारे गए हैं, और राहत-बचाव कार्य में नौसेना और वायुसेना को भी लगाया गया है। जिला प्रशासन की इजाजत के बिना वहां पर आतिशबाजी की गई थी, और जानकारों का कहना है कि दो गुटों में आतिशबाजी के मुकाबले के चलते हुए वहां आग लगी और इतने लोग मारे गए। भारत में धार्मिक कार्यक्रमों में और तीर्थस्थानों पर मौतों में कोई नई बात नहीं है। हर बरस एक से अधिक ऐसे हादसे होते हैं जिनमें सौ-दो सौ लोग मारे जाते हैं, लेकिन उनसे सबक नहीं लिया जाता। और भारत से परे सऊदी अरब में भी हज यात्रा के दौरान एक बार में हजार लोगों तक के मरने का हादसा हो चुका है जहां पर कि सरकार बहुत ही संपन्न हैं, और कड़ाई से कानून लागू करती है।
दरअसल राज्यों के भीतर भी जिलों पर यह जिम्मा आता है कि वे तीर्थस्थानों पर भीड़ को काबू करके रखें। यह काम आसान इसलिए नहीं होता है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक किसी एक खास दिन, या किसी एक खास महूरत पर पूजा के हिसाब से लोग टूट पड़ते हैं। ऐसे दिनों पर रेलवे स्टेशनों से लेकर नदी के किनारे या तालाबों पर लोग इतनी बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं कि उनके अनुपात में पुलिस का इंतजाम किया ही नहीं जा सकता। ऐसे में भारत के कुछ प्रबंध संस्थानों को भीड़-प्रबंध के कुछ हफ्तों या महीनों के कोर्स प्रशासन और पुलिस के लिए करना चाहिए जिसमें म्युनिसिपल या पंचायतों जैसी स्थानीय संस्थाओं को भी शामिल किया जाए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने चीन से एक संदेश भेजकर केरल के हादसे पर दुख तो जताया ही है, उन्हें छत्तीसगढ़ में भी मंदिरों में हिफाजत के निर्देश दिए हैं। छत्तीसगढ़ ऐसी पहल करने वाला राज्य हो सकता है अगर यहां के आईआईएम के साथ मिलकर एक ऐसा कोर्स बनाया जाए जिसे तीर्थ और मेले, राजनीतिक और सामाजिक भीड़ वाली परंपरागत जगहों के अधिकारियों और वहां के सामाजिक संगठनों के लोगों को प्रशिक्षित करने का काम किया जाए। यह भीड़-निर्मित आपदा रहती है, और इसके लिए खास किस्म की सूझ-समझ की जरूरत पड़ती है।
भारत जैसे विविधता वाले लोकतंत्र में ऐसी भीड़ चलती ही रहेगी, इससे कभी छुटकारा नहीं होगा, और इनके इंतजाम से हादसे भी घट सकेंगे और लोगों की सहूलियत भी बढ़ सकेगी।

जितने भ्रष्ट पकड़ाते हैं, उनसे हजार गुना अनछुए रह जाते हैं

संपादकीय
9 अप्रैल 2016

छत्तीसगढ़ में आज सुबह से एंटीकरप्शन ब्यूरो के छापे कई शहरों में कई विभागों के अफसरों पर पड़ रहे हैं, और अभी तक मिली पहली जानकारी के मुताबिक एक अफसर के घर से तकिये के खोल में डालकर बाहर फेंके जाते 35 लाख रूपए नगद भी पकड़ा गए हैं। वैसे तो पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ के अफसरों पर पड़े छापे देखते हुए 35 लाख की यह रकम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन राज्य के लिए यह नौबत सोचने की बात जरूर है कि सरकार का भ्रष्टाचार विरोधी अमला हजार में से एक किसी पर ही छापा डाल पाता है, और बाकी लोगों के भ्रष्टाचार के बाद सरकारी खजाने में बचता क्या होगा?
एक तरफ तो हर बरस बजट किसी हिरण की तरह छलांग लगाते हुए आगे बढ़ता है, और दसियों हजार करोड़ रूपए एक-एक विभाग को मिलते हैं। फिर लोगों को लगता है कि जनता की दिक्कतें दूर क्यों नहीं हो रही हैं? राजधानी से परे, गौरवपथों से परे, बाकी जगह बदहाली क्यों हैं, क्यों मजदूरों को सैकड़ों करोड़ की मजदूरी देना बकाया है? जिन निर्माण विभागों के तहत काम होते हैं, वहां पर भ्रष्टाचार का रेट बच्चे-बच्चे को मालूम रहता है, किस कुर्सी की कितनी कमाई रहती है, वह दफ्तर के बाबू से लेकर ठेकेदार के मुंशी तक को पता रहता है। अफसरों के तबादलों में लेन-देन का रेट भी सबको पता रहता है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार को रोकने के लिए एक इतना छोटा अमला बनाया गया है जो कि हजार में से एक भ्रष्ट पर भी हाथ डालने की क्षमता नहीं रखता। इसलिए भ्रष्ट अफसरों पर होती ऐसी कार्रवाई को लेकर खुश होने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह समझने की जरूरत है कि जिस भ्रष्ट पर छापा पड़ रहा है, उसकी बराबरी के ओहदों पर कितने और लोग बाकी हैं जिन पर छापा नहीं पड़ा है।
छत्तीसगढ़ सरकार मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद भी भ्रष्टाचार से अलग नहीं हो पाई है। इस राज्य में नेता, अफसर, और ठेकेदार अरबपति होते जा रहे हैं, और मनरेगा जैसी मजदूरी में लगे हुए मजदूरों को महीनों से रोजी नहीं मिली है। लोगों के बीच नाराजगी का अंदाज सत्ता को अभी नहीं है, इसलिए कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी का कोई बेहतर और विश्वसनीय विकल्प चुनाव में सामने नहीं आ पा रहा है, और विपक्ष के भीतर आपसी खरीदी-बिक्री से तश्तरी पर रखकर सत्ता के हाथ में जीत दे दी जाती है। नतीजा यह है कि सत्ता और सत्तारूढ़ पार्टी को भ्रष्टाचार से थकी हुई जनता के दिल-दिमाग की हालत का अंदाज ही नहीं है।
हम पहले भी ऐसे कई मौकों पर यह लिखते आए हैं कि हजारों अफसरों के भ्रष्टाचार के बाद कुछ गिने-चुने पर कार्रवाई होने तक भ्रष्ट कमाई का एक फीसदी भी पकड़ में आने के लिए नहीं बचता। छत्तीसगढ़ को भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराध की रोकथाम के लिए एक निगरानी एजेंसी बनानी चाहिए जो खुफिया निगरानी से समय रहते भ्रष्टाचार की जानकारी सरकार को देकर उसे पहले ही रोके, और यह जानकारी बाद में एसीबी जैसी एजेंसी की छापामारी के लिए भी काम आ सकती है। लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार का भ्रष्टाचार रोकने का रिकॉर्ड एकदम ही कमजोर है, और हम देश के दूसरे राज्यों से यहां पर तुलना करना नहीं चाहते, क्योंकि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे कई राज्य अभी भी हैं जहां पर भ्रष्टाचार दिखाई नहीं पड़ता है। छत्तीसगढ़ सरकार को अपने बचे हुए कार्यकाल में अपना रिकॉर्ड दुरूस्त करना चाहिए।

भवन निर्माण कबाड़ निपटाने सरकार जनभागीदारी बढ़ाए

संपादकीय
8 अप्रैल 2016

केन्द्र सरकार ने देश में भवन निर्माण सामग्री के निपटारे के लिए कड़े नियम बनाए हैं। आज शहरों में हालत यह है कि सरकारी और निजी, सभी तरह के निर्माण जब टूटते हैं, या उनमें कोई मरम्मत होती है, तो ढेरों कांक्रीट और बाकी सामान निकलकर सड़कों के किनारे पड़े रहते हैं, और म्युनिसिपल उन्हें कचरे की तरह ढोने के लिए मजबूर होती है। फिर यह भी होता है कि शहर के बाहर ऐसे कचरे के लिए बनाए गए बड़े-बड़े मैदानों पर जब कांक्रीट-ईंट जैसे सामान भी जाकर मिल जाते हैं, तो उनका किसी तरह का निपटारा नहीं हो सकता। एक दूसरी बात यह कि निर्माण सामग्री का कचरा पैदा करने वाले लोग अगर नियमों के मुताबिक उसके निपटारे के लिए जिम्मेदार रहें, तो उसमें से बहुत सा सामान दुबारा भी इस्तेमाल हो सकता है, और ऐसा होने पर धरती पर रेत निकालने जैसे दूसरे काम घट भी सकते हैं। सामान की री-साइकिलिंग से नए सामान के इस्तेमाल में कमी आती है और धरती पर बोझ घटता है। लेकिन पर्यावरण को बचाने की ऐसी तरकीबें लोगों पर कुछ महंगी पड़ती हैं, क्योंकि उनको निर्माण-कबाड़ के निपटारे के लिए कुछ खर्च भी करना पड़ेगा। आज तो लोग एक ट्रक मलबा भी ले जाकर घूरे पर फेंक देते हैं, और म्युनिसिपल उसे अपने खर्च पर उठाने पर भी मजबूर रहती है, और बाहर ट्रेंचिंग ग्राऊंड पर जाकर वह हमेशा के लिए बोझ बन जाता है, उसका कचरे से कोई बिजली भी नहीं बन सकती, उसका कोई और इलाज भी नहीं हो सकता।
दरअसल पर्यावरण को बचाने और प्रदूषण को घटाने की सारी तरकीबें कारखानों से लेकर घरों तक शुरू में महंगी पड़ती हैं, और इसीलिए लोग उससे कतराते हैं, और सरकारें लोगों को नाराज करने से बचती हैं। यही वजह है कि कारखानों की चिमनियां काला धुआं उगलती दिखती हैं, और पर्यावरण के नियम कागजों में दबे रह जाते हैं। भारत में जहां पर कि सरकारी अमला सीमित है, वहां पर ऐसे नियम लागू करने के लिए एक जनभागीदारी विकसित की जानी चाहिए। आज जब लोग बात-बात पर फोन पर तस्वीरें खींचकर दुनिया भर में भेज देते हैं, तो राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं के अफसरों को ऐसे फोन नंबर और ऐसी वेबसाईटें बनानी चाहिए जिन पर लोग भवन निर्माण सामग्री के कचरे की तस्वीर भेज सकें, और सरकार पर से निगरानी का बोझ कुछ घटे। जो शहर अधिक विकसित हैं, वहीं पर ऐसा भवन-कबाड़ बढ़ता है, और वहां की संपन्नता इसके निपटारे की ताकत भी रखती है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इन नियमों को कड़ाई से लागू करे, और जनभागीदारी बढ़ाई जाए।

सरकारी खर्च पर धर्म को बढ़ावा लोकतंत्र-विरोधी

संपादकीय
7 अप्रैल 2016

महाराष्ट्र हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने वहां पर भाजपा-प्रशासित म्युनिसिपल द्वारा एड्स को रोकने के लिए करवाए जा रहे हनुमान-चालीसा पाठ को लेकर कड़ी फटकार लगाई है, और कहा है कि क्या भारत सिर्फ हिन्दुओं का है? धर्म को लेकर सरकार का इस्तेमाल भारत में कोई नई बात नहीं है, और नेहरू के बाद से देश की कई सरकारें, और कई प्रदेशों की सरकारें धर्म को सिर पर बिठाए चली आ रही हैं। पुराने लोगों को याद होगा कि जब पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से ब्राम्हणों के पैर धोने का काम किया तो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इससे असहमति जाहिर करते हुए नाराजगी जताई थी। लेकिन इंदिरा गांधी के आने के बाद धीरेन्द्र ब्रम्हचारी से लेकर देवरहा बाबा तक, और अनगिनत मंदिर-दरगाहों तक प्रधानमंत्री और सत्ता पर बैठे बाकी लोगों का जाना-आना लगे रहा। निजी आस्था को सार्वजनिक प्रदर्शन का सामान बनाया गया, और फिर उसे सरकारी खर्च से किए जाने लगा।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम हज यात्रा के लिए केन्द्र सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी सहित किसी भी धर्म पर होने वाले सरकारी खर्च के खिलाफ लिखते आए हैं। सरकारी बंगलों पर सरकारी खर्च से रमजान के दौरान होने वाली इफ्तार दावतों के खिलाफ भी हमने लिखा है। लेकिन वोटों की राजनीति में जनता को बहलाए रखने के लिए राजनीतिक दल और नेता धर्म से बेहतर और कोई तरीका नहीं जानते, और ऐसे बहलाने के लिए सरकारी फिजूलखर्च से बेहतर भला और कौन सा तरीका हो सकता है? लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश में जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री निवास में एक मंदिर बनवाया, बल्कि मुख्यमंत्री दफ्तर की सरकारी मेज पर किसी हिन्दू देवी-देवता की प्रतिमा भी फूलों से लदी हुई सजा दी थी। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग धर्म के दबदबे, और उनके लोगों की बहुतायत को देखते हुए यह सिलसिला चलते रहता है। इसलिए अब जब नागपुर में एड्स की जागरूकता के लिए, या एड्स की रोकथाम के लिए जब एक विशाल सार्वजनिक कार्यक्रम में हनुमान चालीसा का पाठ करवाया जा रहा है, तो अदालत चाहे इस पर नाराजगी जाहिर करे, राजनीतिक दलों में वामपंथियों को छोड़कर भला और किसका यह नैतिक अधिकार बचा हुआ है कि वे विरोध कर सकें?
राजनीति और धर्म का घालमेल अपने आपमें जानलेवा है, और जब इसमें सरकारी खर्च की सुविधा और जुट जाती है तो फिर भला क्या बचता है। लेकिन अदालतों का सकारात्मक आलोचना का यह रूख ही देश को बचा सकता है। एक धर्म पर सरकारी खर्च की देखादेखी से फिर दूसरे धर्मों की उम्मीदें जागेंगी, और कुपोषण के शिकार इस देश में भूखे बच्चों के दूध को प्रतिमाओं पर बहाया जाएगा। सरकार को हर धर्म से दूर रहना चाहिए, बजाय इसके कि वह हर धर्म को खुश रखने को खर्च करके अपने आपको धर्मनिरपेक्ष साबित करे। सब पर खर्च करके धर्मनिरपेक्ष साबित करने के बजाय किसी भी धर्म पर कुछ भी खर्च किए बिना धर्मनिरपेक्ष साबित करना बेहतर है, और वही सही है। फिर इन दिनों तो देश में जिस तरह से सत्तारूढ़ पार्टी अपनी पसंद के धर्म को खुलकर बढ़ावा दे रही है, और उस रंग को ओढ़कर सरकारी खर्च पर आस्था का प्रदर्शन कर रही है, वह लोकतंत्र के बिल्कुल ही खिलाफ है। 

महाराष्ट्र विधानसभा में बोई नफरत के कांटे श्रीनगर एनआईटी तक

संपादकीय
6 अप्रैल 2016

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में एनआईटी के छात्रों में तनाव फैला हुआ है। इसकी शुरुआत भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले दिनों हुए क्रिकेट मैच के दिन से शुरू हुई बताई जाती है। और अब वहां पर प्रदेश के बाहर से गए हुए और वहां पढ़ रहे छात्रों का एक जुलूस तिरंगा झंडा लेकर कॉलेज अहाते से बाहर निकल रहा था, और कश्मीर की पुलिस ने उन्हें इस तर्क के साथ रोकने की कोशिश की कि बाहर उनकी हिफाजत करना मुमकिन नहीं होगा। यह जवाबी कार्रवाई छात्र इसलिए कर रहे थे कि क्रिकेट मैच के बाद कॉलेज कैम्पस में कुछ छात्रों ने पाकिस्तान का झंडा लहराया था, और इसके जवाब में गैरकश्मीरी छात्र तिरंगे झंडे के साथ विरोध कर रहे थे। कॉलेज में कक्षाओं का बहिष्कार चल रहा है, और इम्तिहान ठप्प हो गए हैं। केन्द्र की भाजपा-अगुवाई वाली सरकार नाजुक कश्मीर में महबूबा-अगुवाई वाली सरकार में जूनियर भागीदार है, और केन्द्र-राज्य के ऐसे राजनीतिक गणित के चलते यह बात मोदी सरकार के लिए एक परेशानी की है।
कश्मीर में एनआईटी खासा पुराना कॉलेज है, और देश के बाकी एनआईटी की तरह, बाकी प्रमुख कॉलेजों की तरह यहां पर भी प्रदेश के बाहर के छात्र-छात्राओं का कोटा रहता है। इससे देश भर में राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है, क्योंकि सभी प्रदेशों और जाति-धर्मों के बच्चे साथ रहते हैं, साथ पढ़ते हैं। अब कश्मीर में दो दिन पहले ही परेशानी के बाद सरकार बनी है, और यह ताजा तनाव बढ़ गया है।
कश्मीर के लोगों के बीच पाकिस्तान के झंडे के कभी-कभी दिखने की बात नई नहीं है, और उसी एक बात को लेकर तनाव या टकराव अगर कॉलेज से शुरू हो रहा है, तो वह सड़कों के तनाव के मुकाबले कुछ अलग किस्म का है, और कुछ अधिक खतरनाक भी है। ऐसी नौबत से बचा जाना चाहिए। हम कॉलेज कैम्पस में राजनीतिक जागरूकता के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि हमने जेएनयू के मामले में छात्र-छात्राओं की राजनीतिक चेतना की तारीफ भी की है। लेकिन कश्मीर में अगर जान के खतरे की कीमत पर ऐसा टकराव होता है, तो पूरे देश में उसके बड़े बुरे नतीजे होंगे। नफरत की दुनिया देखती नहीं है, और हिंसा को बढ़ाते चलती है। कश्मीर में अगर किसी गैरकश्मीरी छात्र-छात्रा के साथ हिंसा हुई, तो देश भर में जगह-जगह कश्मीरी छात्र-छात्राओं के खिलाफ हिंसा हो सकती है, और यह नौबत बहुत खतरनाक होगी।
भारत पहले भी कई तरह के क्षेत्रीय, धार्मिक, और जातीय भेदभाव और टकराव के तनाव के बीच एक राष्ट्र बने हुए चल रहा है। कभी मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ दोनों ठाकरे हिंसक बातें करते हैं, तो कभी कर्नाटक जैसे विकसित राज्य में उत्तर-पूर्व के लोगों को मारा जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में भी उत्तर-पूर्व के लोग आए दिन पीटे जाते हैं, और पिछले दिनों राजस्थान के एक हॉस्टल में कश्मीरी छात्रों पर जबर्दस्ती पुलिस कार्रवाई की गई थी। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि देश भर में साम्प्रदायिकता भड़काई जाएगी, और जाति या धर्म के आधार पर, धार्मिक आस्था के आधार पर लोगों को गद्दार और देशद्रोही करार दिया जाएगा, और उसका असर छात्र-छात्राओं पर नहीं पड़ेगा, तो ऐसा मुमकिन नहीं है। हम बार-बार इस जगह पर देश के इस खतरे के खिलाफ आगाह करते रहते हैं, और जिन प्रदेशों में ऐसे साम्प्रदायिक तनाव नहीं हैं, वे प्रदेश विकास देख भी रहे हैं। भारत में अगर आर्थिक विकास की जगह आक्रामक राष्ट्रीयता और कट्टर धर्मान्धता से फली-फूली नफरत को बढ़ावा दिया जाएगा, तो उसके नुकसान मौजूदा केन्द्र सरकार के कार्यकाल के खत्म होने के बरसों बाद तक होते रहेंगे।
कश्मीर में छात्रों के झंडों और पुलिस के डंडों के टकराव को अगर एक मामूली पुलिस समस्या मानकर छोड़ दिया जाएगा, तो इससे देश का बड़ा नुकसान होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश में नफरत घटाने की कोशिश करनी चाहिए, कश्मीर में यह टकराव मोदी की पार्टी के लिए एक अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकि देश भर में कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार को लेकर यह सवाल तो पूछा ही जा रहा था कि जिस तरह भाजपा के मंत्री-मुख्यमंत्री भारत माता की जय को लेकर देश में गद्दारी के सर्टिफिकेट बांट रहे हैं, क्या महबूबा मुफ्ती से भी भाजपा यह नारा लगवाकर उनको कोई सर्टिफिकेट देगी? हमारा यह मानना है कि राष्ट्रीयता के ये ताजा फतवे श्रीनगर की एनआईटी के ताजा तनाव के पीछे हैं, और केन्द्र और राज्य सरकार को, उनमें शामिल राजनीतिक दलों को नफरत घटाने की बात करनी चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि महाराष्ट्र की विधानसभा में नफरत बोई जाए, और उसके कांटे श्रीनगर की एनआईटी तक न पहुंचें।