देश के सारे चुनाव एक साथ करवाने की सोच फायदे की

संपादकीय
31 मार्च 2016  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच बताते हुए एक खबर आई है कि वे पैसा और समय बचाने के लिए संसद, विधानसभाओं, और म्युनिसिपल-पंचायतों के चुनाव एक साथ करवाना चाहते हैं। एक समय देश में कुछ चुनाव एक साथ होते भी थे, लेकिन राज्यों की विधानसभाओं को भंग करते-करते ये चुनाव अलग-अलग वक्त पर होने लगे, और अब कई राज्यों में तो हर एक डेढ़ बरस में कोई न कोई चुनाव होते हैं। छत्तीसगढ़ में चूंकि विधानसभा भंग होने की नौबत नहीं आई, इसलिए सन् 2000 में राज्य बनने से लेकर अभी तक चुनाव अपने समय पर हो रहे हैं, और एक-डेढ़ बरस में चुनाव निपट जाते हैं, और फिर राज्य सरकार, स्थानीय संस्थाओं को अगले तीन-चार बरस चुनावमुक्त मिलते हैं। 
प्रधानमंत्री की सोच अच्छी है, और उनके पहले भी कुछ लोग ऐसी राय दे चुके हैं, लेकिन तराजू के एक पलड़े में दो दर्जन मेंढकों को एक साथ तौलने की तरह का काम आसान नहीं होगा, और हो सकता है कि मुमकिन भी न हो। इसकी एक वजह यह है कि जब कभी लोकसभा चुनाव के साथ जोड़कर राज्य विधानसभा के चुनाव कराने की बात होगी तो कई ऐसे विधानसभाएं होंगी जिनका कार्यकाल पूरा होने के पहले ही वहां चुनाव कराने पड़ेंगे। ऐसे में वहां की सत्तारूढ़ पार्टी अपने कार्यकाल को घटाने के खिलाफ होगी। दूसरी बात यह भी है कि सांसदों और विधायकों की पेंशन भी सदन के कार्यकाल के साथ जुड़ी हुई होती है। अगर सदन पांच बरस पूरे नहीं कर पाया, तो सांसद-विधायक की पेंशन पर फर्क पड़ता है। 
लेकिन सारे राजनीतिक दलों को मिलकर इसका रास्ता निकालना चाहिए। और जिस तरह से कई राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, और कांग्रेस की सरकारें घटती जा रही हैं, कांग्रेस को इस पर शायद अधिक नुकसान न हो। लेकिन एक दूसरी बात यह है कि एक साथ चुनाव होने से पूरे देश में जिस नेता या पार्टी का माहौल रहेगा, उसकी हवा संसदीय सीट से लेकर वार्ड और पंचायत तक असर डालेगी। अब ऐसे में नरेन्द्र मोदी अकेले ऐसे नेता हैं जिनका असर देश भर में सबसे अधिक फैला हुआ, सबसे अधिक ताकत वाला दिखता है। हो सकता है कि एक साथ चुनाव की उनकी सोच के पीछे यह भी एक वजह हो, लेकिन हम एक साथ चुनाव के हिमायती इसलिए भी हैं क्योंकि इससे सरकारें जनता को लुभाने के अनावश्यक दबाव के बिना पांच बरस तक कड़े फैसले लेकर भी काम कर सकती हैं। 
राष्ट्रपति अगर ऐसे किसी मामले में दिलचस्पी लें, और पहल करें, तो शायद सभी पार्टियों को बिठाकर वे ऐसा करवा सकते हैं। राजनीतिक दल अपने नफे-नुकसान के चलते ऐसा करें इसमें शक है, लेकिन ऐसा होने पर देश का फायदा होगा, इसमें हमें कोई शक नहीं है। मोदी जैसे नेता तो आते-जाते रह सकते हैं, लेकिन देश में चुनाव व्यवस्था में अगर ऐसा बड़ा सुधार हो सकता है, तो उसकी कोशिश की जानी चाहिए।

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