बड़ी भीड़ के हादसे रोकने शिक्षण-प्रशिक्षण जरूरी

संपादकीय
10 अप्रैल 2016

केरल के एक मंदिर में आतिशबाजी से हुए हादसे में सौ से अधिक लोग मारे गए हैं, और राहत-बचाव कार्य में नौसेना और वायुसेना को भी लगाया गया है। जिला प्रशासन की इजाजत के बिना वहां पर आतिशबाजी की गई थी, और जानकारों का कहना है कि दो गुटों में आतिशबाजी के मुकाबले के चलते हुए वहां आग लगी और इतने लोग मारे गए। भारत में धार्मिक कार्यक्रमों में और तीर्थस्थानों पर मौतों में कोई नई बात नहीं है। हर बरस एक से अधिक ऐसे हादसे होते हैं जिनमें सौ-दो सौ लोग मारे जाते हैं, लेकिन उनसे सबक नहीं लिया जाता। और भारत से परे सऊदी अरब में भी हज यात्रा के दौरान एक बार में हजार लोगों तक के मरने का हादसा हो चुका है जहां पर कि सरकार बहुत ही संपन्न हैं, और कड़ाई से कानून लागू करती है।
दरअसल राज्यों के भीतर भी जिलों पर यह जिम्मा आता है कि वे तीर्थस्थानों पर भीड़ को काबू करके रखें। यह काम आसान इसलिए नहीं होता है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक किसी एक खास दिन, या किसी एक खास महूरत पर पूजा के हिसाब से लोग टूट पड़ते हैं। ऐसे दिनों पर रेलवे स्टेशनों से लेकर नदी के किनारे या तालाबों पर लोग इतनी बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं कि उनके अनुपात में पुलिस का इंतजाम किया ही नहीं जा सकता। ऐसे में भारत के कुछ प्रबंध संस्थानों को भीड़-प्रबंध के कुछ हफ्तों या महीनों के कोर्स प्रशासन और पुलिस के लिए करना चाहिए जिसमें म्युनिसिपल या पंचायतों जैसी स्थानीय संस्थाओं को भी शामिल किया जाए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने चीन से एक संदेश भेजकर केरल के हादसे पर दुख तो जताया ही है, उन्हें छत्तीसगढ़ में भी मंदिरों में हिफाजत के निर्देश दिए हैं। छत्तीसगढ़ ऐसी पहल करने वाला राज्य हो सकता है अगर यहां के आईआईएम के साथ मिलकर एक ऐसा कोर्स बनाया जाए जिसे तीर्थ और मेले, राजनीतिक और सामाजिक भीड़ वाली परंपरागत जगहों के अधिकारियों और वहां के सामाजिक संगठनों के लोगों को प्रशिक्षित करने का काम किया जाए। यह भीड़-निर्मित आपदा रहती है, और इसके लिए खास किस्म की सूझ-समझ की जरूरत पड़ती है।
भारत जैसे विविधता वाले लोकतंत्र में ऐसी भीड़ चलती ही रहेगी, इससे कभी छुटकारा नहीं होगा, और इनके इंतजाम से हादसे भी घट सकेंगे और लोगों की सहूलियत भी बढ़ सकेगी।

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