एक शहंशाह ने हजारों रूपए प्लेट की दाल को पद्मश्री देकर भूख का उड़ाया है मजाक

11 अप्रैल 2016

अभी जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पद्म सम्मान बांटे, तो इम्तियाज कुरैशी नाम के एक बुजुर्ग खानसामे को भी पद्मश्री मिला। कई दशकों से कुरैशी दिल्ली की शाही दावतों के लिए पकाते आ रहे हैं, और उनका नाम देश की राजधानी के एक सबसे महंगे रेस्त्रां के साथ जुड़ा हुआ है और वे कुछ खास तकनीक से धीमी आंच पर तरह-तरह की चीजें पकाने के लिए जाने जाते हैं। दिल्ली के आलीशान रेस्त्रां, बुखारा, में उनकी व्यंजन विधि से बनाई गई दाल-बुखारा दुनिया में सबसे मशहूर दाल में से एक मानी जाती है, और यह कुछ अरसा पहले डिब्बाबंद रसगुल्ले की तरह डिब्बे में पैक होकर दिल्ली के एयरपोर्ट पर भी बिकती थी। इम्तियाज कुरैशी को यह शोहरत भी हासिल है कि नेहरू और इंदिरा भी इनके पकाए खाने पर फिदा रहते थे।
किसी भी देश के राष्ट्रीय सम्मान उस देश की हकीकत, और उसकी सोच, इन दोनों का मिलाजुला हिसाब होना चाहिए। यह देश कुपोषण का शिकार है, भुखमरी का शिकार है, जो भूख से मर नहीं पाते, वे भी भूखे पेट सोने के लिए बेबस रहते हैं। ऐसे में इस देश में कई संगठन आए और गए जिन्होंने शादियों की दावत के बाद बचे हुए खाने को मांगकर, अपनी गाडिय़ों में भरकर उसे गरीब बस्तियों में ले जाकर गरीबों के बीच बांटा। अभी मुंबई में घर से दफ्तर टिफिन पहुंचाने वाले दुनिया के मशहूर डिब्बावालों ने भी गरीबों तक खाना पहुंचाने की एक पहल शुरू की है जिसके बारे में काफी कुछ छप भी चुका है। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में कई सामाजिक संगठन ऐसे हैं जो कि गरीबों के खानपान में मदद करने के लिए जाने जाते हैं।
अभी मुझे जितना याद पड़ता है, ऐसे किसी संगठन को देश का यह सरकारी-राजकीय सम्मान, पद्मश्री नहीं दिया गया है। और एक ऐसे रसोइये को यह सम्मान देना जिसके पकाए हुए, जिसके तरीके से पकाए हुए खाने के लिए कम से कम कुछ हजार रूपए लगते हों, उसे पद्मश्री देना देश की आज की सोच को बताता है।
हालांकि कुछ लोगों को यह आलोचना अटपटी लग सकती है क्योंकि भारत के ये राजकीय सम्मान तो शुरू होने से लेकर अब तक कई ऐसे कलाकारों, संगीतकारों, और जानकारों को दिए गए हैं जो कि शास्त्रीय विधाओं वाले रहे हैं। जिनके काम का आम लोगों से, आम जिंदगी से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा। वे शहंशाह अकबर के दरबार के चुनिंदा नवरत्नों की तरह के कलाकार थे जो कि चुनिंदा संपन्न या कि जानकार श्रोताओं के लिए, या रसिकों के लिए कला करते हैं। उनकी कला क्लासिकल कहलाती है, क्लास के लिए। देश मास (आम जनता) से भरा हुआ है। लेकिन कोई कला मासिकल नहीं कहलाती। ऐसे लोगों का काम बहुत ही गिने-चुने लोगों को सुख देने वाला रहता है, लेकिन वह राजकीय सम्मान का हकदार माना जाता है क्योंकि राजा का रसिक होना जरूरी होता है और पारखी होना दिखाने के लिए उसे ऐसे सम्मान देने ही पड़ते हैं।
दूसरी तरफ देश की आम जनता से जुड़ी हुई आदिवासी कलाओं, लोककलाओं का इस देश में बड़ा समृद्ध और संपन्न भंडार है। ये कलाएं किसी शास्त्रीय विधा की तरह व्याकरण के नियमों में बंधी हुई नहीं रहतीं, और इनमें श्रोता-दर्शक और कलाकार एक-दूसरे में घुलते-मिलते रहते हैं। ऐसी कलाओं का एक सामाजिक सरोकार भी होता है, और वे शास्त्रीय कलाओं की तरह नियमों में बंधने और बांधने के आतंक से घिरी हुई भी नहीं रहतीं। लोककलाएं जिंदगी का एक हिस्सा रहती हैं, और उनका योगदान रोज की जिंदगी में रहता है, काम के बाद, दिन पूरा हो जाने के बाद लोग नाच-गा लेते हैं, और वैसी कला मजदूरों के पसीनों से लेकर उनके मिट्टीसने बदन तक से संपन्न रहती हैं।
इसी तरह गरीबों के खानपान और उनके कुपोषण से जूझने वाले लोग बहुत से हैं। बहुत से सामाजिक संगठन देश भर में यह काम कर रहे हैं, और वैसे संगठनों के, उनको शुरू करने वाले लोगों को ऐसे राजकीय सम्मान मिलना याद नहीं पड़ता।
आज देश के राष्ट्रपति से लेकर केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी तक, और देश भर के प्रदेशों में सत्ता पर काबिज अधिकतर लोगों तक की समझ एक संपन्न और ताकतवर तबके की समझ है। अगर यह समझ किसी विपन्न तबके की समझ होती, तो हजार रूपए प्लेट की दाल के लिए मशहूर खानसामे को देश का राजकीय सम्मान देने के पहले वह कुछ सोचती कि ऐसा खाना कितने एकनंबरी लोग खा सकते हैं? अमूमन कई हजार रूपए से एक वक्त का पेट भरने वाले लोग दोनंबरी से लेकर दसनंबरी तक हो सकते हैं, लेकिन एकनंबरी शायद ही हों। और जिस देश में आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो वहां पर ऐसी संपन्नता के प्रतीक खानसामे को राजकीय सम्मान से एक क्रांतिकारी शायर साहिर लुधियानवी की यह कविता याद पड़ती है- एक शहंशाह ने बनवाके हंसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक।
हम पहले भी इस बात को लगातार लिखते आए हैं कि सरकारों को सम्मान बांटने के शौक को छोडऩा चाहिए। एक वक्त राजा अपने दरबार में जिससे खुश होते थे, अपने गले की माला निकालकर उसे दे देते थे। आज भी उसी अंदाज में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मातहत इसी तरह से सम्मान बांटे जाते हैं। खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कुछ बरस पहले केन्द्र सरकार का हिस्सा रहते हुए एक पद्म सम्मान पाया था, और सत्तारूढ़ राजनीति से परे उनका कोई योगदान जिंदगी में कभी नहीं रहा। सत्ता की राजनीति, पार्टी के लिए चंदा जुटाने के लिए चर्चित, और अपने कुनबे को राजनीति में आगे बढ़ाने के लालची, यूपीए सरकार के हर भ्रष्ट फैसले के इर्द-गिर्द या उसके बीच रहने वाले प्रणब मुखर्जी को पद्म सम्मान देकर देश का खुद का कौन सा सम्मान बढ़ा?
सत्ता की सामाजिक समझ, और उसके सामाजिक सरोकार बहुत ही सीमित होते हैं। जैसे-जैसे गांधी की मौत पुरानी पड़ती जा रही है, वैसे-वैसे ये सरोकार और भी खत्म हो रहे हैं। अब कुपोषण से घिरे हुए गुजरात में हजारों करोड़ की सरदार-प्रतिमा बनाई जा रही है, जिसके लिए नारा यह लगा था कि उसे देश भर के किसानों से मांगकर लाए गए लोहे से बनाया जाएगा। इसी तरह गरीबों और दलितों की स्वघोषित मसीहा मायावती ने उस उत्तरप्रदेश में हजारों करोड़ से अपने जिंदा रहते अपने स्मारक बनवा दिए जहां लोग आज घास की रोटी बनाकर खाने को मजबूर हैं, बुंदेलखंड भूख से मर रहा है। देश में जगह-जगह सरकारों के सरोकार का यही हाल है। जिस महाराष्ट्र में शिवाजी की प्रतिमा के लिए हजारों करोड़ रूपए खर्च करना शुरू हो गया है, उस महाराष्ट्र में शिवाजी की हजारों संतानें खेतों में खुदकुशी कर चुकी हैं, और कुपोषण के शिकार आदिवासी बच्चे बड़ी संख्या में मर रहे हैं, और पूरे के पूरे इलाके सूखे की चपेट में हैं।
हजारों रूपए प्लेट की दाल को पद्मश्री ऐसी ही सोच की एक कड़ी है, और पूरे देश को राजकीय सम्मानों को धिक्कारना चाहिए, और लोकतांत्रिक लोगों को ऐसे सम्मान खारिज करने चाहिए, लेने नहीं चाहिए।

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