अंबेडकर प्रतिमाओं पर मेले, और उनकी सोच ताक पर

संपादकीय
14 अप्रैल 2016
कई राज्यों में चुनावों के चलते हुए अभी अचानक कई तबकों की अहमियत राजनीति में एकदम से बढ़ गई है। कहीं मंदिर में बड़ी संख्या में मौतें हुईं, तो मोदी से लेकर राहुल तक सभी पहुंच गए। अभी अंबेडकर जयंती आई तो प्रधानमंत्री के लिए मध्यप्रदेश के महू में सरकारी आदेश से कॉलेजों के छात्र-छात्राओं को बुलवाया गया, और नागपुर की दीक्षाभूमि के समारोह के ठीक पहले राहुल-सोनिया की वहां पर सभा हुई। अंबेडकर को लेकर आज केन्द्र की भाजपा सरकार से लेकर भाजपा तक जितने जोश के साथ समारोह मनाने में लगे हुए हैं, उससे दलित खुश तो हो सकते थे, लेकिन अगर देश में उनकी हालत सचमुच बेहतर हुई रहती। लेकिन भाजपा के शासन वाले मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, और बाकी कई जगहों पर भी दलितों के साथ जो सुलूक हो रहा है, वह दलित तबकों के लिए किसी जश्न का मौका नहीं, फिक्र का मौका है।
दलित और आदिवासी कई मुद्दों में एक दूसरे के करीब रहने वाले तबके हैं, और सवर्ण हिन्दू समाज का बर्ताव इन दोनों तबकों के साथ कमोबेश एक ही तरह की हिकारत का रहता है। ऐसे में दलित और आदिवासी दोनों ही इस देश में गोमांस या बीफ को लेकर फैलाई जा रही एक दहशत को लेकर भी अपने आपको खतरे में महसूस करते हैं क्योंकि इन दोनों तबकों में परंपरागत रूप से, नियमित खानपान में गोमांस के इस्तेमाल का इतिहास रहा है, और तबसे रहा है जब हिन्दू धर्म बना भी नहीं था। देश के आदिवासी हिन्दुओं के बहुत पहले के हैं, और वे ही असली मूल निवासी हैं। उनकी खानपान की आदतों को हाल के बरसों में एक नई शुद्धतावादी हमलावर सनातनी सोच के चलते जिस तरह जुर्म करार दिया जा रहा है, उससे दलित और आदिवासी दोनों तबके फिक्रमंद हैं।
आज चुनावी राजनीति के चलते कोई पार्टी किसी दूसरी पार्टी को पीछे छोडऩे के लिए अगर अंबेडकर-प्रेम, भगतसिंह-प्रेम में लग जाती है, तो वैसे में उस पार्टी की बुनियादी सोच और उसके कामकाज के बारे में अधिक बारीकी से देखने की जरूरत रहती है। आज अंबेडकर की प्रतिमाओं पर मेले लगाना तो ठीक है, लेकिन अंबेडकर जिस समाज के जिन लोगों को इंसानी हक दिलाने के लिए लड़ते रहे, और जिनका सारा सामाजिक काम जिस दलित तबके को सवर्ण हिंसा से बचाने में लगे रहा, उस दलित तबके के खानपान से लेकर, समाज में उसके जिंदा रहने तक पर खतरा मंडरा रहा है। अभी दो-चार दिन पहले ही खबर थी कि उत्तर भारत में बलात्कार के बाद एक दलित महिला ने आत्महत्या कर ली, और अब उसके समाज के हजार परिवार इस्लाम को अपनाने जा रहे हैं। यह सिलसिला सामाजिक और राजनीतिक पाखंड पर एक सवाल खड़ा करता है। अंबेडकर के विचारों के ठीक खिलाफ काम करने वाले लोग आज अगर उनके नाम का झंडा लेकर चल रहे हैं, तो उनका सामना बहुत से सवालों के साथ किया जाना चाहिए।

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