बातचीत से लोकतंत्र न लौटे तो लोगों के भटकने का खतरा

संपादकीय
15 अप्रैल 2016
कश्मीर में अभी एक तनाव चल रहा है कि वहां एक फौजी द्वारा लड़की को छेडऩे का आरोप लगा, और बाद में शहर में तनाव फैल गया। पुलिस गोली से अब तक शायद चार लोग मारे जा चुके हैं, और तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा। उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्से की तरह कश्मीर में भी सेना को कई किस्म के मामले-मुकदमे से बचाने के लिए एक अलग कानून लागू है जिसके चलते उस पर बलात्कार के मुकदमे भी नहीं चल सकते। और जिन-जिन प्रदेशों में ऐसा कानून लागू है, वहां पर लगातार स्थानीय जनता की यह मांग रहती है कि इसे खत्म किया जाए क्योंकि इसके चलते हुए फौजियों के किए हुए जुर्म बढ़ते जाते हैं। पिछले दो दिनों से उत्तर-पूर्व का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर फैला हुआ है जिसमें एक दुकानदार युवती एक फौजी को पत्थरों और हाथों से पीट रही है, और उसका आरोप है कि फौजी उसकी दुकान में कपड़े खरीदने आया, और उसे छूने लगा। इसी वीडियो में उस फौजी का साथी भी उसे पीटते दिखता है, और मामले को ठंडा करने की कोशिश करता है। कश्मीर के हन्दवाड़ा में चल रहे तनाव के बीच पुलिस और फौज ने शिकायत करने वाली लड़की का एक वीडियो बयान जारी किया है जिसमें वह कहती सुनाई पड़ती है कि उसके साथ छेडख़ानी एक स्थानीय नौजवान ने की थी, जो कि उस पर फौजी से संबंध रखने का आरोप लगा रहा था।
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में पिछले कुछ महीनों में ऐसी कई शिकायतें आई हैं कि सुरक्षा बलों ने महिलाओं के साथ बलात्कार किया, और उनके शरीर के साथ खिलवाड़ किया। पिछले दिनों राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष अपनी टीम लेकर बस्तर आए, और शिकायत करने वाली महिलाओं से मिलकर उन्होंने लौटकर राजधानी में शासन और मीडिया को कहा कि महिलाओं ने बलात्कार की शिकायतें दुहराई हैं, और देश के कानून के मुताबिक उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। बस्तर में कश्मीर या उत्तर-पूर्व जैसा विशेष कानून लागू नहीं है जिसमें सुरक्षा बलों को मुकदमे से रियायत मिले, यह एक अलग बात है कि पुलिस या सुरक्षा बलों के खिलाफ न शिकायत आसान होती, न कार्रवाई आसान होती, और न ही इंसाफ आसान होता।
जिन इलाकों में भी सरकारी वर्दीधारी सुरक्षाकर्मी बरसों तक तैनात रहते हैं वहां पर ऐसी शिकायतें खड़ी होती ही हैं। इसकी एक वजह यह है कि जहां लगातार बंदूकों का, या आतंकी, उग्रवादियों के हथियारों का राज चलता है, वहां पर नागरिक अधिकार, या मानव अधिकार हाशिए पर चले जाते हैं। दूसरी बात यह रहती है कि ऐसे इलाकों में आतंकियों, अलगाववादियों, या उग्रवादियों पर ये आरोप भी लगते हैं कि वे बंदूकों की नोंक पर ऐसी झूठी रिपोर्ट दर्ज करवाते हैं ताकि सुरक्षा बलों का मनोबल टूटे। लोकतंत्र में ये दोनों ही बातें मुमकिन हैं, और इन दोनों से बचने के रास्ते ढूंढने चाहिए। बलात्कार हुए हों, या बलात्कार की झूठी रिपोर्ट हुई हो, ये नौबत वहीं पर अधिक आती है जहां पर लोकतंत्र निलंबित सा रहता है, और बंदूकों के हवाले हिफाजत रहती है। इसलिए लोकतंत्र में देश या प्रदेश दोनों को ही तमाम किस्म के हथियारबंद आंदोलनों को टालने, दबाने, खत्म करने, या सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार अगर बंदूकों के हमलों के मुकाबले बंदूकों का इस्तेमाल करती है, तो उसे कोई नाजायज नहीं कह सकते। लेकिन इसे अगर टाला जा सके, तो उन इलाकों में लोकतंत्र की वापिसी हो सकती है, लोगों का भरोसा लोकतंत्र के राज पर लौट सकता है। इसलिए हमारा मानना है कि नक्सल हिंसा हो, या कश्मीर का अलगाववाद हो, या मणिपुर का उग्रवाद हो, हर किस्म के हथियारबंद आंदोलन से बातचीत से निपटने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि बातचीत से रास्ता अगर न निकले, तो ऐसे इलाकों के लोग लोकतंत्र से परे की ताकतों पर, और विकल्पों पर भरोसा करना शुरू कर देते हैं।

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