मिट्टी के मोल पहुंचा प्याज किसान आत्महत्या न करे...

संपादकीय
16 अप्रैल 2016
मध्यप्रदेश से खबर है कि वहां की मंडियों में थोक में प्याज 20 पैसे किलो तक बिक रहा है। अपने सबसे नीचे स्तर पर भी यहां पर प्याज थोक में एक रूपए से पांच रूपए किलो तक बिकता था, और आज हाल यह है कि किसानों को मंडी तक प्याज लाने की लागत भी इस रेट पर नहीं निकल पा रही है। यह हाल सिर्फ प्याज को लेकर नहीं है, भारत की खेती के बहुत से दायरों में यही हाल है। और देश के लोगों की सोच ऐसी है कि जो चीजें बेकाबू हैं, उनके दाम चुकाते हुए लोगों के चेहरों पर शिकन नहीं पड़ती, लेकिन सब्जी उगाने वाले, या खेती करने वाले, या मेहनत-मजदूरी की रोजी लेने वाले लोगों का भाव बढऩे से मध्यम और उच्च वर्ग के तन-बदन में मानो आग लग जाती है। सोशल मीडिया पर लोग बड़ी तल्खी के साथ यह बात लिख रहे हैं कि जिस दिन देश का आखिरी किसान आत्महत्या कर लेगा, उस दिन बाकी देश भी भूख से मर चुका रहेगा।
लोग खेती पर सरकारी सब्सिडी की आलोचना करते हैं। लेकिन खेती का क्या कोई विकल्प है? अनाज और सब्जियों, दाल और फल को क्या कारखानों में उगाया जा सकता है? दुनिया के सबसे विकसित और सफल देशों में भी खेती पर बड़ी सब्सिडी जारी रहती है। लेकिन हम अंतहीन सब्सिडी की वकालत बिल्कुल नहीं कर रहे हैं। हमारा मानना है कि खेती को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बाकी चीजों के साथ जोड़कर किसान की जिंदगी को कामयाब बनाने की योजनाएं बनाना केन्द्र और राज्य सरकार का काम है।  न सिर्फ अनाज उगाने, बल्कि दूध, अंडे, शहद, मशरूम, जैसी सैकड़ों चीजें हैं जिनको किसानी के साथ अगर जोड़ा जाए, तो किसान आत्मनिर्भर हो सकते हैं। लेकिन सरकारी योजनाओं का ऐसा एकजुट होना मुमकिन नहीं हो पाता, और इसी के साथ-साथ किसान का महज किसानी से जिंदा रहना भी मुमकिन नहीं हो पाता है। देश के लोगों को तो किसान की उपज के लिए अधिक दाम देने के लिए तैयार रहना ही चाहिए, जिस तरह वे आयातित पेट्रोलियम के घटते-बढ़ते दामों के लिए तैयार रहते हैं, जैसे कि वे आसमान छूते हुए सोने-चांदी के दाम के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन साथ-साथ सरकारों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के गैर-किसानी उत्पादक पहलुओं को बढ़ावा देने का काम करना ही होगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बुनकरी से लेकर कुटीर उद्योग तक हजारों ऐसी स्थानीय संभावनाओं वाली बातें हैं, जिनको बढ़ावा देकर राज्य सरकारें लोगों की जिंदगी बेहतर और खुशहाल कर सकती हैं। सिर्फ धान जैसी गरीब फसल को उगाकर लोगों का जिंदा रहना मुश्किल है, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां अधिकतर फसल सरकार अच्छे दामों पर खरीद लेती है, वहां किसान दूसरी फसल की तरफ जाने की सोच भी नहीं पाते। देश में बेहतर दाम वाली फसलों, आयात-विकल्पों, और गैरफसली उपजों के बारे में सोचने की जरूरत है और करने की भी। किसानों की आत्महत्या के बाद उनके परिवारों को आर्थिक मदद देना सबसे ही खराब विकल्प है।
हम छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो यहां भी कुछ ऐसे इलाके हैं जहां हाथकरघा इतना सफल है कि पूरे के पूरे गांव सूखे में भी भूखे नहीं रहते, और वहां से लोग निकलकर काम की तलाश में दूसरे प्रदेशों में भी नहीं जाते। अगर जिला पंचायतों को मजबूत बनाकर जिलों के स्तर पर किसानों की आत्मनिर्भरता के रास्ते ढूंढे जाएं, तो पूरा का पूरा राज्य कहीं का कहीं पहुंच सकता है।

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