असम आकर लौट गए ब्रिटिश राजघराने को लिखना चाहिए...

संपादकीय
17 अप्रैल 2016
जिस असम में ब्रिटिश राजकुमार और उनकी पत्नी ने दो दिन पहले पहुंचकर गेंडे और हाथी के बच्चों को दूध पिलाया, और लोकनृत्य देखा, वहां जंगल में बैठकर चाय पी, उन चाय बागानों की हकीकत बड़ी डरावनी है। और हो सकता है कि ब्रिटिश शाही घराने के इन मेहमानों को हिन्दुस्तानी चाय के पीछे की उस हकीकत की जानकारी भी न हो। वहां चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर भूख और बीमारी में मर रहे हैं। उनकी तस्वीरें इतनी भयानक हैं कि उनको छापते भी डर लगता है कि अखबार देखने वाले लोगों पर उसका कैसा असर होगा।
लेकिन दुनिया का रिवाज कुछ इसी तरह का है। दुनिया के संपन्न देश जिस फुटबॉल से खेलते हैं, जिन कपड़ों को पहनकर खेलते हैं, उनको तैयार करने वाले बांग्लादेश के बाल मजदूर जिंदा रहने जितनी मजदूरी भी नहीं पाते, और यह मुद्दा बरसों से विकसित और संपन्न देशों के सामने तैरते खड़ा है। संपन्न दुनिया सस्ती मजदूरी के लिए अपना बहुत सा काम गरीब देशों को देती है, और एक हकीकत यह भी है कि ऐसी मजदूरी के चलते हुए ही गरीब देशों में लोगों के पेट में कुछ जा पाता है। दूसरी तरफ संपन्न दुनिया प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को एक-एक कर बंद करती जा रही है, और उन कामों के लिए गरीब देशों को देखा जाता है, वहां पर वैसे कारखाने लगवाए जाते हैं, और वहां का पर्यावरण तबाह करने की कीमत पर विकसित देश अपने आपको साफ-सुथरा रखते हैं।
और दुनिया में पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए विकसित देशों को सामानों के अपने इस्तेमाल में जो कटौती लानी चाहिए, वह एक के बाद एक, बरसों से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी अमरीका की तरह के संपन्न, फिजूलखर्च, लेकिन ताकतवर देश मानते नहीं हैं, और उसके लिए तैयार नहीं होते हैं। धरती के साधनों के इस्तेमाल में हर इंसान के बराबरी के हक की बात होती है, लेकिन ताकतवर अपनी लाठी के दम पर जरूरत से अधिक, अनुपात से अधिक सामानों और साधनों को झपट लेते हैं, और धरती पर बोझ बढ़ाते चलते हैं, धरती को दुहते चलते हैं। ऐसा भी नहीं कि विकसित और संपन्न देशों के सामने ये मुद्दे नहीं रखे जाते। हर अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन, मौसम सम्मेलन में, समानांतर सम्मेलन चलते हैं जिनमें पर्यावरण आंदोलनकारी गरीब देशों के पक्ष में आवाज उठाते हैं और संपन्न देशों को अधिक बोझ उठाने के लिए कहते हैं, अधिक सामाजिक जवाबदेही निभाने के लिए कहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में सदियों से यह कहा जाता है कि समरथ को नहिं दोष गुसांई, या जिसकी लाठी उसकी भैंस। इसलिए लोगों की मांग सड़कों के बैनरों पर धरी रह जाती है, और ताकतवर देश इन सम्मेलनों में आकर अपनी मर्जी से लौट जाते हैं, बिना कोई जिम्मेदारी निभाए।
विकसित देशों के भीतर ऐसे सामाजिक आंदोलन चल रहे हैं जो कि वहां इस्तेमाल होने वाले सामानों के पीछे लगने वाली गरीब देशों की मजदूरी और मजदूरों की फिक्र करते हैं। असम की चाय पीकर लौटे ब्रिटिश राजघराने को कोई याद दिलाएगा कि असम में जनता की जिंदगी में लोकसंगीत और लोकनृत्य ही नहीं हैं, और चाय बागानों में भूख और बीमारी से मौत भी है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों को इन बातों को जोड़कर सामने रखना चाहिए, और हो सकता है कि असम का नमक खाकर लौटे ब्रिटिश राजकुमार अपने देश की जिम्मेदारी को कुछ समझ पाएं।

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