मर्दों की सोच को बढ़ावा देते महिलाएं जाती हैं कायर और कमजोर को चूडिय़ां भेंट करने

संपादकीय
19 अप्रैल 2016
मध्यप्रदेश में महिलाओं पर अत्याचार के मामले उठाते हुए कांगे्रस पार्टी की महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष की अगुवाई में कल हजारों महिलाओं ने भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के घर की तरफ कूच किया। और अभी आजकल में ही छत्तीसगढ़ में भी राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अफसरों को चूडिय़ां भेंट कीं। सभी जगह, जहां-जहां महिलाएं किसी आंदोलन में ऐसा करती हैं, वहां पर कुर्सी पर बैठे नेता या अफसर का अपमान हो, या न हो, खुद महिलाओं का तो बड़ा बुरा अपमान होता ही है। महिला आंदोलनकारियों को यह समझना चाहिए कि चूडिय़ां महिलाओं का प्रतीक होती हैं। और भारत के हिंदू समाज में महिलाएं अपने पति के प्रतीक के रूप में सुहागन बनकर चूडिय़ां पहनती हैं। धर्म से परे भी फैशन के तौर पर महिलाएं ही चूडिय़ों का इस्तेमाल करती हैं, आदमी नहीं करते। ऐसे में महिलाओं के प्रतीक का उपयोग एक कमजोरी की तरह दिखाते हुए जब सरकार को चूडिय़ां भेंट की जाती हैं, तो वह महिलाओं की नासमझी का काम भी होता है, और उससे पूरा महिला वर्ग एक कमजोर तबका दिखता है।
महिलाओं को पुरुषप्रधान समाज की भाषा में, कहावतों और मुहावरों में, प्रतीकों और गालियों में कमजोर और अपमान के ही लायक बताया जाता है। कानून और सामाजिक आंदोलन मिलकर भी पुरुषों की सोच को नहीं बदल पाए हैं, और इस सोच का दबदबा इतना है कि महिलाएं खुद अपने प्रतीकों का अपमान करने से नहीं चूकतीं। चूडिय़ों को कमजोरी के प्रतीक के रूप में भेंट करना महिलाओं के लिए एक गाली है और कांगे्रस की महिलाओं ने भोपाल में जो किया है, उन्हें अपनी ही पार्टी का यह इतिहास याद नहीं है कि इंदिरा गांधी चूडिय़ों के ऐसे इस्तेमाल के खिलाफ बहुत नाराज होती थीं।
समाज में बहुत से लोग अपने अपमान को समझ नहीं पाते। हिंदू धर्म की बहुत सी ऐसी आरतियां हैं जिन्हें गाने वाले धर्मालु लोग अपने-आपको पापी, निकृष्ट, अज्ञानी कहते हैं, और ईश्वर से अपने को पापमुक्त करने की प्रार्थना करते हैं। अब ईश्वर का सम्मान बढ़ाने के लिए लोग अपने-आपको बिना किसी वजह पापी कहें, बुरा कहें, अधम और नीच कहें, यह परले दर्जे की बेवकूफी है। इसी दर्जे की बेवकूफी किसी सरकार को कमजोर साबित करने के लिए चूडिय़ां भेंट करना है। महिलाओं को बोलचाल की भाषा में जो बेइंसाफी है, उसको खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए, न कि उसे बढ़ावा देना चाहिए। महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ाना देने के लिए आदमी ही काफी हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि गालियों के इस्तेमाल की शौकीन महिलाएं भी मां-बहन की ही गालियां देती हैं, और वे इस बात का अहसास नहीं कर पातीं कि मर्दों ने समाज की जुबान में ऐसी गालियां ही बनाई थीं जो महिला के खिलाफ हों, महिलाओं के जिक्र की हों।
आज भारत में एक मजबूत महिला आंदोलन जगह-जगह दिखता है। ऐसे लोगों को कांगे्रस और भाजपा की महिलाओं में यह जागरूकता लाने की जरूरत है कि चूडिय़ां कायरता या कमजोरी का प्रतीक नहीं हैं।

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