फिल्मी अंदाज के फौजी हमले बस्तर में बेकसूरों का क्या करेंगे?

संपादकीय
2 अप्रैल 2016  

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर में कल भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने राज्य पुलिस के साथ मिलकर एक फौजी अभ्यास किया कि अगर उन पर जमीनी हमला होता है, तो जरूरत पडऩे पर वे हवा से जमीन में किस तरह जवाबी गोलियां चलाएंगे। बस्तर की जमीन से दूर बसे हुए लोगों को ऐसा फौजी विकल्प बड़ा सुहाता है जिसमें बड़ी संख्या में सैनिक जाकर नक्सलियों को हर कीमत पर मारकर आ जाएं। लेकिन यह कीमत क्या है, इसका शहरियों को अंदाज नहीं है, और जंगलों में बसे आदिवासियों की जिंदगी इतनी कीमती नहीं है कि उनकी गिनती ऐसी फौजी कार्रवाई के सिलसिले में किसी कीमत की तरह गिनी जाए। नतीजा यह है कि लोग सोचते हैं कि नक्सली अगर वायुसेना के हेलीकॉप्टरों पर गोली चलाएंगे, तो जवाब में उन्हें गोली खानी पड़ेगी। 
बस्तर के नक्सली मोर्चे में बहुत से बड़े हमलों के वक्त यह बात सामने आई है कि नक्सली बड़ी संख्या में गांव के लोगों, औरत-बच्चों को सामने रखकर चलते हैं, ताकि पुलिस और सुरक्षा बल के जवान उन पर जवाबी हमला न कर सकें। ऐसी हालत में जब नक्सलियों को हेलीकॉप्टर से हवाई हमले का खतरा रहेगा तो वे बंदूकों की नोंक पर बेबस और बेकसूर आदिवासियों को साथ लेकर चलेंगे, और जहां डेरा डालेंगे, वहां भी साथ रखेंगे। इसलिए सरकारी वर्दियों को अपनी किसी भी कार्रवाई के पहले यह याद रखना चाहिए कि उससे मुजरिम नक्सलियों का चाहे जितना नुकसान हो, उससे बेकसूर आदिवासियों का कोई नुकसान तो नहीं होगा?
 अमरीकी फिल्मों में देख-देखकर लोगों को हवाई हमले बड़े असरदार लगते हैं, लेकिन शहरी लोगों को यह समझना चाहिए कि कल अगर उनकी छतों पर हवाई हमले होंगे, या उनकी सड़कों पर आसमान से गोलियां चलेंगी, तो उनकी क्या हालत रहेगी? आज बस्तर में बेकसूर आदिवासी वैसे भी पुलिस और सुरक्षा बलों के हाथों बलात्कार और हत्या झेल रहे हैं, और सरकार में बैठे हुए लोग यह मानते हैं कि अगर किसी बेकसूर, गैरनक्सली का भी फर्जी आत्मसमर्पण करवाया जा रहा है, तो उसमें आदिवासी का भला क्या नुकसान है। शहरी सोच यहां तक नहीं पहुंच पाती है कि किसी बेकसूर पर नक्सली होने की तोहमत लगाने वाले लोकतंत्र पर से उस बेकसूर आदिवासी की आस्था किस कदर खत्म होती है। जिन लोगों को यह लगता है कि गांव के गरीब आदिवासी की भी भला कोई इज्जत होती है, उनको यह मालूम रहना चाहिए कि शहरी ताकत की कुर्सियों से दूर, दूसरों का शोषण करने की क्षमता से दूर ये आदिवासी अधिक इज्जतदार हैं। लोगों को यह समझना पड़ेगा कि आदिवासी जंगल के जानवर नहीं हैं जिनको कि घेरकर लाकर थाने के किसी कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, और फिर नक्सली घोषित करके उन्हें कुछ रकम दी जा सकती है। राजधानियों में बैठे हुए ऐसे कितने लोग हैं जिन्हें नगद रकम मिले तो वे अपने आपको नक्सली घोषित करना चाहेंगे? 
हवाई हमले की बात एक सैनिक जरूरत हो सकती है, लेकिन बेकसूर आदिवासियों के ऊपर जितना खतरा इससे होगा, उसके बारे में पहले सोचना चाहिए, उसके बाद ऐसे किसी दुस्साहस की योजना बनानी चाहिए। हम इस बात को इसलिए लिख रहे हैं कि पुलिस और वायुसेना जवाबी कार्रवाई के नाम पर ऐसा करने के लिए तैयार खड़ी हैं, और इस जवाबी कार्रवाई को झेलने का कोई काम बस्तर के गरीब आदिवासियों ने नहीं किया है। इसलिए नक्सल मोर्चे पर बेकसूरों की मौत की कीमत पर कोई भी रणनीति नहीं बनानी चाहिए। बेकसूर आदिवासी वैसे भी एक तरफ नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं, दूसरी तरफ सुरक्षा बलों के हाथों मारे जा रहे हैं, और देश पर उनका हक भ्रष्ट लोकतंत्र के हाथों मारा जा रहा है।

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