दुनिया के लंबे वक्त के फैसले अगली पीढ़ी को गोद में बिठाकर लेने के फायदे बहुत

संपादकीय
23 अप्रैल 2016
वैसे तो कल ही हमने पृथ्वी दिवस पर धरती के बारे में लिखा है जिसमें पर्यावरण की फिक्र की है, और अपनी बात को हवा और पानी तक सीमित रखा है। लेकिन आज इस मुद्दे से जुड़ी हुई एक दूसरी खबर पर लिखना जरूरी है कि 170 देशों ने संयुक्त राष्ट्र में कल ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते पर दस्तखत किए हैं, और विकासशील और विकसित देशों को धरती के बढ़ते तापमान का मुकाबला करने के लिए एक साथ खड़ा किया है। भारत में भी दुनिया के भविष्य को प्रभावित करने वाले इस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, और इसके साथ ही भारत ने कहा है कि औद्योगिक विकास पा चुके धनी देश जलवायु परिवर्तन से लडऩे का बोझ गरीब देशों के कंधे पर नहीं डाल सकते।
इस मौके पर एक दूसरी बात हुई जिस पर हम लिखना चाहते हैं, अमरीका के विदेश मंत्री जॉन कैरी ने इस पर दस्तखत करते हुए अपनी नातिन को गोद में बिठा रखा था, जो कि बारीकी से यह दस्तखत देख रही थी, और इसके बाद जब नाना ने उसे चूमा, तो वह आने वाली पीढिय़ों का ख्याल करके हो रहे इस समझौते का एक बड़ा प्रतीक था। एक समझौता दस्तखत से गुजरते हुए महज छोटी सी खबर बन पाता है, लेकिन इस तरह के प्रतीक किसी भी मौके को, किसी भी दस्तावेज को अधिक महत्वपूर्ण और अधिक असरदार बना देते हैं। लोगों की मानसिकता पर असर डालने के ऐसे कई काम सोच-समझकर भी होते हैं, और अनायास भी हो जाते हैं। लेकिन यह समझना पड़ेगा कि सार्वजनिक जीवन के अधिकतर कामों में ऐसे छोटे-छोटे प्रतीक एक सोच को सामने रखने में बड़े मददगार होते हैं। दुनिया के पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले देशों में अमरीका सबसे आगे है जहां का बाजार वहां के इंसानों को, वहां के जानवरों को अधिक से अधिक खपत की तरफ धकेलकर धरती को तबाह करने पर आमादा करता है, फिर भी आने वाली पीढ़ी से जुड़ी हुई अमरीकी विदेश मंत्री की यह तस्वीर भविष्य के प्रति जिम्मेदारी को खूबसूरती से दिखाती है। किसी समझदार ने बहुत पहले यह कहा था कि यह धरती हमें अपने पुरखों से मिली विरासत नहीं है, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढिय़ों की जायदाद है, जिसे हमने अपनी इस एक जिंदगी तक के लिए उधार पर लिया हुआ है।
सार्वजनिक जीवन में प्रतीकात्मक बातों का महत्व कम नहीं होता है। हम इस बात को इसलिए कह रहे हैं कि भारत जैसे देश में जहां रंग कुछ धर्मों के प्रतीक होते हैं, और सत्ता पर बैठे लोग कुछ रंगों से अपने लगाव का प्रदर्शन करके अपनी धार्मिक प्राथमिकताएं उजागर कर सकते हैं। इस देश में जहां लोगों को पीने का पानी नहीं हैं, और जहां जानवर बिना पानी मर रहे हैं, वहां पर सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री अपनी सेल्फी लेकर, या अपने रास्ते को पानी से धुलवाकर, या हेलीपैड पर दर्जनों टैंकर पानी छिड़कवाकर अपनी उस हैवानियत को जाहिर कर सकते हैं, जो है तो इंसानियत का एक हिस्सा ही, लेकिन जिसे इंसान अपना मानने से इंकार कर देते हैं।  जब जनता की दी हुई कुर्सियों पर बैठे हुए लोग अपनी निजी काली कमाई को बेशर्मी के साथ चारों तरफ दिखाते फिरते हैं, तो वह भी उनकी बेशर्मी और उनकी हिंसा का एक प्रतीक होता है, और जरूरत ऐसे जागरूक वोटरों की होती है जो कि ऐसे लोगों को वोट के दिन नोटा देकर आए।
भारत में सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोग अपनी गाडिय़ों में, अपने दफ्तरों में किसी धर्म या सम्प्रदाय, किसी गुरू या किसी आध्यात्मिक संगठन के प्रतीकों को दिखाकर भी लोकतंत्र का अपमान कर सकते हैं, और अपने फोन की घंटी की जगह किसी धर्म की प्रार्थना या आरती को डालकर भी ऐसा कर सकते हैं। हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन में लोगों को सकारात्मक प्रतीकों का बेहतरी के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, और अलोकतांत्रिक, हिंसक, अश्लील, अहंकारी प्रतीकों से बचना चाहिए। आने वाली पीढ़ी आज की फैसले लेने वाली पीढिय़ों को महज अपनी मौजूदगी से ही प्रभावित कर सकती है, पूरी दुनिया में लोगों को व्यापक महत्व के दीर्घकालीन फैसले लेते हुए अपनी अगली पीढिय़ों को गोद में बिठाकर तब तय करना चाहिए।

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