जजों की कमी का रोना रोते मुख्य न्यायाधीश का गला भरा

संपादकीय
24 अप्रैल 2016
देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश के एक संयुक्त सम्मेलन में आज सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर बहुत अफसोस जाहिर किया कि देश में जरूरत के मुताबिक अदालतों और जजों की बहुत कमी है, और सरकारें उन्हें बढ़ाने के लिए कुछ नहीं कर रही हैं। इस तकलीफ को कहते हुए उनका गला भर आया और कुछ पल के लिए वे कुछ बोल ही नहीं पाए। उन्होंने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में यह कहा कि मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रम और पूंजीनिवेश जुटाने की कोशिशें तो ठीक हैं, लेकिन जब तक अदालतों की क्षमता नहीं बढ़ाई जाएगी तब तक सरकार की ये योजनाएं कामयाब नहीं हो सकतीं। इस महत्वपूर्ण मौके पर देश के मुख्य न्यायाधीश की कही हुई इन बातों को प्रधानमंत्री सुनते चले गए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का सार्वजनिक रूप से तमाम लोगों के बीच यह कहना इसलिए अधिक मायने रखता है कि उन्होंने यह भी गिनाया कि किस तरह अदालतों की क्षमता बढ़ाने, और अदालतों को बढ़ाने की बात केन्द्र और राज्य के बीच एक-दूसरे की तरफ टाली या सरकाई जा रही हैं, और कोई हल नहीं निकल रहा है।
इस सम्मेलन में जो लोग बैठे हैं वे तमाम तो इतने ताकतवर लोग हैं कि वे अपने से जुड़े मामले अदालतों में जब तेज करवाना चाहें, तो तेज करवा लेते हैं, और जब धीमे करवाना चाहें, तो धीमे करवा लेते हैं। भारत में बहुत महंगे-महंगे वकील रखकर, कई तरह के सुबूत जुटाकर, कुछ तरह के सुबूत और गवाह खरीदकर, कई मामलों में जांच अधिकारी, वकील, और जज भी, खरीदकर लोग अपने मामलों को अपनी मर्जी की रफ्तार पर ले आते हैं। एक अदालत के बाद दूसरी अदालत में ताकतवर लोगों के मामले आमतौर पर पूरी जिंदगी चलते रहते हैं, और जब तक उन्हें अपने जुर्म की सजा मिलती है, तब तक वे वैसा ही जुर्म सैकड़ों बार और कर चुके रहते हैं। यही हाल सरकार के भीतर किसी की जांच और मुकदमे की इजाजत देने के पहले चलता है, यही हाल मुकदमा चलने तक अदालत में चलता है, और फिर यही हाल ऊपरी अदालतों तक जाकर निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करते हुए चलता है। चारा खाए हुए लोग संसद और विधानसभाओं का रियायती खाना खाते रहते हैं, और जिन भैंसों के हिस्से का चारा चोरी हुआ था, उनकी पीढिय़ां निकल जाती हैं।
लोकतंत्र में यह बात कही जाती है कि जो इंसाफ समय पर नहीं मिल पाया, देर से मिला, वह इंसाफ नहीं होता। यही वजह है कि आज भारत में आम बोलचाल की जुबान में लोग खाकी वर्दी और काले कोट से दूर रहने की दुआ देते हैं, और जिसे बद्दुआ देनी होती है, उसे कहते हैं कि वह पुलिस और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में पड़ा रहे। अदालत का नाम और काम तो इंसाफ से जुड़ा हुआ है, लेकिन उसकी तस्वीर लोगों के मन में बेइंसाफी की है। लोग यह मानकर चलते हैं, और अदालत जाने वाले अधिकतर लोगों का यह तजुर्बा भी रहता है कि अदालतों में मुजरिम ही मजे में रहते हैं, और बड़े आत्मविश्वास से वहां घूमते हैं। कोई शरीफ और बेकसूर तो अदालत पहुंचकर भी मुजरिम की तरह डरे-सहमे रहते हैं और जल्द से जल्द वहां से बाहर निकलना चाहते हैं। जमीन-जायदाद के मामलों में लोगों की पूरी पीढ़ी निकल जाती है, और फैसले नहीं हो पाते। अदालतों पर खर्च कम रखकर अगर लोकतांत्रिक देश की सरकार यह समझती है कि यह किफायत का काम है, तो उसे यह समझना चाहिए कि देश की जनता की पूरी जिंदगी अगर अदालतों में खत्म हो जाती है, तो वह देश की उत्पादकता का बहुत बड़ा नुकसान है, और यह इंसानियत के खिलाफ भी है। इसलिए अदालतों और जजों की संख्या भी बढ़ाने की जरूरत है, और अदालती कामकाज में धूर्तता और चतुराई से मामलों को लंबा खींचने की मौजूदा रियायत को खत्म करने की जरूरत भी है। यह दूसरी बात मुख्य न्यायाधीश को अदालती व्यवस्था के भीतर सुधारनी पड़ेगी। लेकिन कुल मिलाकर सरकारों और अदालतों को अपने रवैये में इंसानियत लानी पड़ेगी, तभी लोगों का भरोसा इंसाफ पर होगा।

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