समाज सुधारक की तरह काम करता सुप्रीम कोर्ट

संपादकीय
25 अप्रैल 2016
डांस बार मामले में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया है कि वह एक सप्ताह के अंदर बार के लाइसेंस जारी करे। कोर्ट ने अश्लीलता को लेकर सरकार द्वारा जताई गई चिंता पर कहा कि वह अश्लीलता रोकने का नियम बनाए, ना कि डांस बार खुलने से रोके। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि डांस करना एक पेशा है। अगर यह अश्लील है, तो फिर इसकी कानूनी अनुमति खत्म हो जाएगी। सरकार द्वारा लागू किए गए नियम निषेधात्मक नहीं हो सकते हैं। अदालत ने सख्ती दिखाते हुए सरकार से ताकीद की कि वह डांस बार को प्रतिबंधित करने की कोशिश ना करे। कोर्ट ने कहा कि डांस करके पैसा कमाना महिला का संवैधानिक हक है। डांस से पैसा कमाना, गलत तरीके से पैसा कमाने से बेहतर है। डांस करके पैसा कमाना भीख मांगने से बेहतर है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रूख साल भर से चले आ रहा है, और महाराष्ट्र में पिछली कांग्रेस-एनसीपी सरकार से लेकर मौजूदा भाजपा-शिवसेना सरकार तक, लगातार एक बहुत ही दकियानूसी और अमानवीय रूख सरकारें दिखा रही हैं, जिनमें डांस बार में काम करने वाली महिलाओं के लिए हिकारत अधिक है, या कि सुप्रीम कोर्ट के लिए, यह अंदाज लगा पाना बड़ा मुश्किल है। हम बरसों से इस मामले पर लिखते आ रहे हैं कि भारत में एक वयस्क मनोरंजन को रोकने के लिए सरकारें और राजनीतिक दल लगातार एक पाखंडी रूख दिखाते हैं और जनता के सामने एक बड़ी पवित्रतावादी नीति रखने की कोशिश करते हैं। दूसरी तरफ यह वही महाराष्ट्र और मुंबई है जहां पर लाखों महिलाएं रोज देह बेचने के काम में झोंकी गई हैं, और उस पर सरकार कभी कोई रोक नहीं लगा पाती, और यह भी नहीं दिखता कि किसी सरकार की उसमें कोई दिलचस्पी है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने दर्जनों बार यह रिपोर्ट दी है कि मुंबई के चकलाघरों में भारत और नेपाल से लाकर कम उम्र की नाबालिग बच्चियों को बेचा जाता है, उनसे चाकू की नोंक पर धंधा करवाया जाता है, लेकिन सरकार का कोई रूख उसे रोकते हुए सामने नहीं आया।
दूसरी तरफ महाराष्ट्र के डांस बार में जाने वाले, शराब पीने वाले, वयस्क लोगों के बीच अगर फिल्मी गानों पर कुछ युवतियां डांस करती हैं, तो उसे बंद करवाने के लिए सरकार महाराष्ट्र के कानून बदलने पर भी आमादा हो जाती हैं, और लगातार सुप्रीम कोर्ट से टकराव भी मोल लेती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आज जो बात कही है कि देह बेचने से बेहतर एक मनोरंजन बेचना है, हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम कई बरसों से यही बात लिखते आ रहे हैं। महाराष्ट्र में डांस बार बंद होन से दसियों हजार युवतियों को रोजी-रोटी का खतरा खड़ा हो गया, और ऐसा अंदाज है कि उनमें से हजारों को देह बेचने के लिए भी मजबूर होना पड़ा होगा। महाराष्ट्र सरकार का यह रूख देखकर महान लेखक सआदत हसन मंटो की कहानी याद आती है कि किस तरह पति को खोने के बाद एक महिला ने उसका तांगा चलाने के लिए म्युनिसिपल से लाइसेंस मांगा, तो म्युनिसिपल ने कहा कि महिला को तांगा चलाने का लाइसेंस नहीं दिया जा सकता, इस पर उस महिला ने देह बेचने के लिए चकले पर बैठने का लाइसेंस मांगा, तो वह उसे एक दिन में मिल गया।
हिन्दुस्तान में राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन एक बहुत ही खतरनाक दर्जे के पाखंड को बढ़ावा देते हैं, यहां पर बाल वेश्यावृत्ति के खिलाफ तो कोई आवाज नहीं उठती, लेकिन समलैंगिकता के खिलाफ, स्कूल-कॉलेज में सेक्स-शिक्षा के खिलाफ लोग झंडे-डंडे लेकर सड़कों पर उतर आते हैं। महाराष्ट्र में डांस बार बंद करवाने की मुजरिम सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली सरकार थी, जिसने महिलाओं के मनोरंजन के पेशे में रहने के कानूनी हक को कुचला, और उन्हें देह के धंधे में धकेलने का जुर्म किया। लेकिन कांग्रेस पार्टी की समझ इतनी कमजोर हो चुकी है कि इस महिला विरोधी फैसले को भी एक महिला की अगुवाई वाली पार्टी नहीं समझ पाई। और कांग्रेस के वैसे फैसले के बाद भाजपा से तो यह उम्मीद की ही जाती थी कि वह ऐसे पाखंड को जारी रखे, और महिलाओं को कुचलती रहे। आज इस बात को लेकर हमें हैरानी होती है कि सुप्रीम कोर्ट एक समाज सुधारक की तरह काम कर रहा है, और राजनीतिक दल एक दकियानूसी हिंसा पर उतारू हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें