सुषमा की शॉल का मजाक नाजायज तो है, लेकिन...

संपादकीय
18 अप्रैल 2016
भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पहली बार ईरान की राजकीय यात्रा पर गई हैं, तो वहां के राष्ट्रपति हसन रूहानी के साथ मुलाकात के दौरान उनकी जो तस्वीर जारी हुई उसमें वे अपनी साड़ी के रंग की ही शॉल लपेटे हुए दिख रही हैं, और सिर पर पल्लू रखने की तरह उन्होंने शॉल को ओढ़ा हुआ है। वैसे तो यह तस्वीर दिल्ली के किसी कोने में भी दिख सकती थीं, फर्क सिर्फ यही है कि एक मुस्लिम और इस्लामी देश में जाने के बाद उन्होंने वहां की संस्कृति के मुताबिक शॉल ओढ़ी, तो सोशल मीडिया उबल पड़ा। लोगों को याद आया कि जब वे पाकिस्तान गई थीं, तो वहां नवाज शरीफ से मिलते हुए पाकिस्तान के हरे झंडे के सामने उनकी हरी साड़ी एकदम एक रंग की लग रही थी, और इसके बारे में दुनिया भर की बातें लिखी गईं, और संसद में उन्होंने यह बताया कि हफ्ते के जिस दिन की वह तस्वीर है, उस दिन वे हरे कपड़े ही पहनती हैं।
सुषमा स्वराज ने ईरान पहुंचकर न तो बुर्का पहना, और न ही सिर पर हिजाब डाला, उन्होंने सिर्फ सिर पर पल्ला रख लिया जो कि भारत के खासे बड़े हिस्से में एक आम बात है। जो लोग ईरान जाते हैं उन सभी लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे वहां की सांस्कृतिक भावना के अनुरूप अपनी पोशाक रखें। और यह बात सिर्फ ईरान के साथ नहीं है, और न ही यह बात सिर्फ सुषमा स्वराज के साथ है। इंदिरा गांधी अपने वक्त में जब एक-एक दिन में चार-चार राज्यों में जाती थीं, तो वे विमान से उतरते हुए ही हर राज्य की स्थानीय पोशाक में दिखती थीं। इसलिए भारत के विदेश मंत्री ने अगर ईरान जाकर वहां के रीति-रिवाजों के मुताबिक अपने कपड़ों का ख्याल रखा, तो उसमें किसी हाय-तौबा की गुंजाइश नहीं है।
लेकिन एक दूसरी बात यह है कि जब भाजपा के नेता ही, और भी कुछ पार्टियों के नेताओं की तरह, लगातार लोगों के हुलिए पर, उनके धर्म या उनके झंडे के रंग पर, उनकी दाढ़ी, टोपी या चोटी पर कहते आए हैं, तो फिर यह भारत की एक राजनीतिक और सांस्कृतिक संस्कृति हो जाती है कि लोग सुषमा के सिर ढांकने पर कुछ कहें। लोगों को याद होगा कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी को एक सार्वजनिक कार्यक्रम में जब कुछ मुस्लिमों ने एक मुस्लिम टोपी पहनानी चाही थी, तो उन्होंने उससे मना कर दिया था। लेकिन अभी कुछ हफ्ते पहले की बात है कि दाऊदी बोहरा सम्प्रदाय के प्रमुख मोदी से मिलने पहुंचे तो प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी तस्वीरों को सिलसिलेवार देखने से यह दिखा कि शुरू की तस्वीरों में मोदी शॉल नहीं ओढ़े हुए हैं, और सैयदना साहब शॉल ओढ़े हुए हैं। लेकिन दो-तीन तस्वीरों के बाद वही शॉल सैयदना साहब पर से हटी दिखती है, और वही मोदी के कंधों पर सजी दिखती है। इस दौरान इस प्रतिनिधि मंडल ने मोदी को और भी कई तोहफे दिए, लेकिन यह शॉल भीश् शायद कंधे बदलकर एक तोहफे की तरह मोदी तक पहुंची थी।
दरअसल सत्ता की जिम्मेदारियां लोगों की सोच को बदलती है, या उन्हें बेबस करती है। मोदी और सुषमा भी अगर विपक्ष में होते तो पोशाक या टोपी-शॉप को लेकर वे भी कुछ उसी तरह की बातें कहते, जिस तरह की बातें आज सोशल मीडिया पर लोग उनके बारे में कह रहे हैं। लोगों को यह भी याद होगा कि कई बरस पहले जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात तय सी दिख रही थी, तब संसद में सुषमा स्वराज ने कहा था कि जिस दिन सोनिया प्रधानमंत्री बनेंगी, उस दिन वे अपना सिर मुंडा लेंगी। यह बात न तो साधारण बात थी और न ही किसी अच्छी संस्कृति की बात थी। लेकिन उस दिन उनकी कही बात से देश में जिस तरह की संस्कृति को बढ़ावा मिला था, वही अब उनकी हरी साड़ी या उनकी शॉल को लेकर उनका मखौल बना रही है। इसलिए जो लोग सत्ता में रह चुके हैं, वे विपक्ष में जाने के बाद इन बातों को ध्यान रखें कि अजमेर आए हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बिरयानी खिलाना कोई जुर्म नहीं था, और ऐसी कई बिरयानियां प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी नवाज शरीफ को या पाकिस्तानी मंत्रियों को, या पाकिस्तान से आए हुए जांचदल को खिला चुके थे। राजनीति और सार्वजनिक जीवन में ओछेपन से बचना चाहिए, क्योंकि ओछापन लौटकर आकर अपने पर ही वार करता है।

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