लोक सुराज जैसे अभियान तो अच्छे हैं लेकिन रोज का सरकारी कामकाज भी सुधरे

संपादकीय
28 अप्रैल 2016
छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार आज से लोक सुराज अभियान शुरू कर चुकी है और गर्मी से तपते एक पूरे महीने मंत्री और अफसर गांव-गांव, शहर-शहर जाकर लोगों की दिक्कतें सुनेंगे। यह एक सालाना सिलसिला छत्तीसगढ़ में बरसों से चले आ रहा है, और जिस पखवाड़े या महीने गर्मी सबसे अधिक रहती है, उसी महीने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह यह कार्यक्रम तय किया है। हर बरस गर्मी में अफसर परिवार सहित बाहर घूमने के बजाय इस बड़े कार्यक्रम की तैयारी में लगे रहते हैं, और छोटी से लेकर बड़ी दिक्कतों तक को सुना जाता है, और शायद बहुत सी शिकायतों पर कार्रवाई भी होती होगी।
प्रदेश में मुख्यमंत्री और जिलों के अफसर लोगों की परेशानियों को सुनने के लिए जनदर्शन भी करते हैं, और हर हफ्ते आम लोगों को अपनी शिकायतों और मांग के साथ पहुंचने का मौका मिलता है। ऐसे तमाम कार्यक्रमों के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि ऐसे जनदर्शनों, या ऐसे ग्राम सुराज के इंतजार में शिकायतों और मांग के ग_े इक_े होते जाते हैं, और बाद में इनके निपटारे पर भी रोजाना के सरकारी काम के मुकाबले अधिक ध्यान दिया जाता होगा। लेकिन जनता ऐसे जनदर्शनों और सुराज अभियान में एक फीसदी ही पहुंच पाती होगी, उसका अधिकतर काम तो रोजाना के सरकारी दफ्तरों में फंसे रहता है, और जब तक जनता के कामकाज को नियमित सरकारी कामकाज के दौरान करने की संस्कृति विकसित नहीं होगी तब तक बात बनेगी नहीं। मुख्यमंत्री, मंत्री, या बड़े अधिकारियों के सामने आने वाली बड़ी भीड़ इस बात का सुबूत होती है कि सरकार में नियमित कामकाज ठीक से नहीं हो रहे हैं। इसलिए हम ऐसी भीड़ को सरकार की कामयाबी का सुबूत नहीं मानते, सरकार के लिए एक चुनौती मानते हैं कि साल भर में ढाई सौ दिन सरकारी दफ्तर लगने के बावजूद इस तरह के मौकों पर लोगों की भीड़ सरकार से अपने काम के लिए क्यों लगती है?
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सरकार का तीसरा कार्यकाल आधा गुजर चुका है। अगले चुनाव के पहले आधे कार्यकाल से भी कम का वक्त काम करने के लिए है। ऐसे में एक व्यवस्था उन्हें कम से कम अब तो लागू कर देने चाहिए कि हफ्ते का पहला दिन किसी भी तरह की बैठकों, या किसी भी तरह के दौरों से मुक्त रहे, और मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मुख्य सचिव से लेकर पटवारी तक, हर सोमवार अपने दफ्तर में सुबह से शाम तक मौजूद रहें। आज सरकार में इतने तरह की बैठकों और दौरों में, विधानसभा सत्रों और लोक सुराज जैसे अभियानों में, चुनाव की तैयारियों में सरकारी अमला लगे रहता है कि जनता को यह पता ही नहीं रहता कि किस कुर्सी पर भगवान कब विराजमान मिलेंगे। इसलिए सरकार को हफ्ते में एक दिन सुबह से शाम तक हर किसी की अपनी खुद की कुर्सी पर मौजूदगी की गारंटी करनी चाहिए, ताकि जनता उस एक दिन तो पहुंच सके।
यह बात सही है कि ऐसे अभियानों में जब गांव-गांव तक मंत्री और अफसर पहुंचेंगे, तो उन्हें जमीनी हकीकत का एक बेहतर अंदाज लगेगा। लेकिन फिर भी इन अभियानों में आए हुए कागजों पर कार्रवाई को अगर सरकार काफी मान लेगी, तो यह अपने आपको धोखा देने जैसा होगा। जनता के बीच जाना, एक हंडी से चावल के दाने को निकालकर देखने जैसा तो हो सकता है कि चावल पका है या नहीं, लेकिन यह चावल पकाने का विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए सरकार को अपने दफ्तरों और अपने अमले में कामकाज के हर दिन काम सुनिश्चित करना चाहिए, ऐसे कितने भी अभियान नियमित कामकाज का विकल्प नहीं हो सकते। कहने के लिए सरकार ने प्रशासनिक सुधार की कुछ कोशिशें की हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसी कम से कम दो कमेटियों की हमको याद है जिनमें कि रिटायर्ड आईएएस अफसरों को ही बिठाया गया है। अब जिन्होंने प्रशासन के मुखिया रहते हुए भी अपने लंबे कार्यकाल में सुधार नहीं किए, उनसे अब सुधार की उम्मीद करना ठीक नहीं है। सरकार को ऐसे सुधार के लिए बाहर के लोगों की जरूरत रहती है, और गैरसरकारी सोच का उपयोग जरूरी है। इन दो बातों को मिलाकर अगर सरकार काम करे, तो अगले ढाई बरस में भी इस सरकार का कार्यकाल जनता की तकलीफों को कुछ अधिक दूर तक दूर कर सकेगा।

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