हिंसा करने की क्षमता को हक बना देना घातक

संपादकीय
29 अप्रैल 2016
गुजरात से खबर आ रही है कि वहां अगड़ी जातियों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाएगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में गुजरात में पार्टी ने यह फैसला लिया, और मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की मौजूदगी में यह घोषणा की गई। इसमें यह प्रावधान रखा जा रहा है कि अगड़ी जातियों के छह लाख से कम आय वाले परिवार के बच्चों को आरक्षण का लाभ दिया जाएगा। गुजरात में पाटीदार समाज के आंदोलन के बाद यह फैसला लिया गया है, और यह समाज आर्थिक रूप से संपन्न माना जाता है लेकिन आरक्षण की मांग कर रहा है। पिछले दिनों जब पाटीदार समाज का आंदोलन हुआ तो इसमें शामिल होने के लिए बड़ी महंगी-महंगी विदेशी कारों में भी लोग पहुंचे थे। अब बताया जा रहा है कि इस ताजा आरक्षण के साथ गुजरात में आरक्षण 60 फीसदी तक पहुंच जाएगा। सरकार ने आज यह भी कहा है कि जरूरत पड़ी तो वह अपने फैसले के लिए कानूनी लड़ाई भी लडऩे को तैयार है। पहली नजर में ऐसा भी लगता है कि कानूनी लड़ाई तय दिख रही है, और यह फैसला शायद आरक्षण देने के बजाय आरक्षण देते हुए दिखने के लिए अधिक है।
आज देश भर में पिछड़े वर्ग में शामिल होने के लिए, या पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिलाने के लिए, जगह-जगह आंदोलन चल रहे हैं। हरियाणा का जाट आंदोलन, या राजस्थान का गुर्जर आंदोलन उसी तरह का रहा, और ये जातियां न तो सामाजिक रूप से उतनी पिछड़ी हुई हैं, और न ही आर्थिक रूप से गरीब हैं। लेकिन फिर भी आरक्षण का मतलब न केवल पढ़ाई में दाखिला होता है, नौकरी होती है, बल्कि राजनीतिक चुनावों के लिए सीट का आरक्षण भी होता है। इनमें से कौन सी बात को लेकर कौन सा आंदोलन चलता है यह अंदाज लगाना मुश्किल है, और यह भी अंदाज लगाना मुश्किल है कि क्या हरियाणा का जाट आंदोलन, हैदराबाद विश्वविद्यालय से देश भर में फैल रहे, और दिल्ली में इक_ा होने जा रहे दलित छात्रों के आंदोलन को वहां न पहुंचने देने के लिए अचानक छेड़ा गया आंदोलन था?
ऐसे तमाम सवालों के बीच हम एक बुनियादी सवाल पर आना चाहते हैं, देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण एक अच्छी बात हो सकती है, लेकिन 50 फीसदी से अधिक आरक्षण न करने की कानूनी शर्त को तोड़ते हुए यह कितना जरूरी है यह भी सोचा जाना चाहिए। क्या महज इसलिए कोई आरक्षण लागू किया जाए कि उसे मांग करने वाली जाति हिंसक और आक्रामक आंदोलन की ताकत रखती है, और रेलगाडिय़ों को जला रही है? फिर दूसरी बात हम दलित और आदिवासी आरक्षण के बारे में भी लगातार लिखते हैं कि इन तबकों के लिए निर्धारित आरक्षण के भीतर जब तक अधिक कमाई या अधिक ताकत के ओहदों वाले परिवारों को बाहर नहीं किया जाएगा, तब तक इन समाजों के सचमुच जरूरतमंद और सचमुच गरीब-कमजोर लोग आरक्षण के फायदे के मुकाबले में अपने समाज के ही ताकतवर लोगों के मुकाबले खड़े नहीं हो सकेंगे। सभी आरक्षित तबकों से मलाईदार सतह को अलग करना ही होगा, उसके बिना सचमुच कमजोर लोग तबके के भीतर मुकाबले के लायक बन ही नहीं पाते।
आज देश में मीडिया, और बाजार पर काबू रखने वाला एक संपन्न और सवर्ण तबका आरक्षण के खिलाफ अभियान चला रहा है, और आरक्षित तबकों का मखौल उड़ाते हुए उन्हें देश के लिए नुकसानदेह बता रहा है। ऐसे लोगों को इस नए गुजरात-हरियाणा के आरक्षण के चलते एक और मौका मिलेगा, नफरत को फैलाने का। आज केन्द्र और राज्य की सरकारों को यह चाहिए कि आर्थिक-सामाजिक रूप से सक्षम जातियों के आंदोलन के दबाव में आरक्षण का नाजायज विस्तार न करें। ऐसा करने का मतलब देश की बाकी जातियों को बढ़ावा देना होगा कि वे भी हिंसा शुरू करें, और उसी से उनकी बात सुनी जाएगी। और आंदोलन किस तरह के होते हैं यह हरियाणा में पिछले दिनों दिख ही चुका है जब सड़कों पर रोकी गई गाडिय़ों से औरतों और लड़कियों को उतारकर उनसे सामूहिक बलात्कार किए गए। हिंसा करने की क्षमता को हक बना देना देश के लिए बहुत ही घातक होगा।

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