जनता की नजरों में पुलिस की तस्वीर बदलना जरूरी

संपादकीय
3 अप्रैल 2016  

ब्रिटेन की एक खबर है कि किस तरह वहां गांव के बाहर खेल रहे बच्चों ने पहले कुछ संदिग्ध लोगों को दौड़कर खेतों में जाते देखा, और उसके बाद ऊपर आसमान में पुलिस के हेलीकॉप्टर को देखा। बच्चों को यह सूझा कि शायद पुलिस इन्हीं लोगों की तलाश कर रही है, तो दर्जन भर बच्चों ने खुली जगह पर एक तीर के निशान की शक्ल में लेटकर उसकी नोंक खेतों की तरफ बनाई और आसमान पर से पुलिस ने देखकर इस इशारे को समझ लिया, और भागते हुए मुजरिमों तक पहुंच गई। इसके कुछ हफ्ते पहले अमरीका से खबर आई थी कि वहां पुलिस कंट्रोल रूम को दो बरस की एक बच्ची की तरफ से फोन आया, और वह कुछ मदद मांग रही थी, जो कि फोन पर ठीक से समझ नहीं पड़ी। फोन नंबर का पता देखकर पुलिस की एक अफसर उस घर में पहुंची, तो दरवाजा खोलने वाले बुजुर्ग को यह पता नहीं था कि उनकी पोती (या नातिन) ने पुलिस को फोन किया है। इतने में वह बच्ची चलती वहां पहुंची और वह एक पैर में पतलून पहन चुकी थी, और दूसरा पैर पतलून में डाल नहीं पा रही थी, ऐसे में उस बच्ची को मां की दी हुई नसीहत याद थी कि किसी परेशानी में किस तरह फोन से पुलिस को कॉल करना है। इसके बाद वह महिला अफसर उस बच्ची को पतलून पहनाकर लौटी, और उसने अपना अनुभव सोशल मीडिया पर भी डाला कि किस तरह पतलून में घुस जाने के बाद उस बच्ची ने इस महिला अफसर को लिपटाकर धन्यवाद दिया।
पुलिस के संबंध अगर लोगों से अच्छे रहें, तो लोगों की मदद तो होती ही है, खुद पुलिस को अपने काम में एक ऐसी मदद मिलती है जो कि उसे अपने खुद के अमले से भी नहीं मिल पाती। अब पुलिस तो हर जगह पर तैनात हो नहीं सकती कि मुजरिम किस खेत में घुसे हैं, इस पर नजर रखी जा सके। बहुत से मामलों में पुलिस को लोगों की मदद ही काम आ सकती है। दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में पुलिस को मददगार माना जाता है लेकिन हिन्दुस्तान में पुलिस की तस्वीर बड़ी गड़बड़ है। यहां के बच्चे बचपन से ही दो तरह की बातें सुनते हुए बड़े होते हैं, एक तो यह कि सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आकर ले जाएगा, दूसरी बात यह कि जल्दी से दूध पी लो, नहीं तो पुलिस पकड़कर ले जाएगी। पुलिस की ऐसी तस्वीर बनाने में हिन्दुस्तानी लोग भी जिम्मेदार हैं, और खुद पुलिस भी। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से पल भर में ऐसे वीडियो छा जाते हैं जिनमें रायपुर की सड़कों पर एक निहत्थे बेकसूर आदमी को पीटने के लिए आधा दर्जन से अधिक हेलमेट लागू करवाती पुलिस लाठियां और लात चलाने लगती है। देश भर में जगह-जगह से ऐसी तस्वीरें और ऐसे वीडियो आते ही रहते हैं जो बताते हैं कि पुलिस से बड़ा अपराधी शायद ही कोई और हो। 
भारत में पुलिस के नजरिए में फर्क लाने की जरूरत है क्योंकि पुलिस हत्यारों की तरह काम करे, फर्जी मुठभेड़-हत्या करे, बलात्कार करे, शहरी सड़कों पर लोगों को बुरी तरह से पीटे, इन सबको देख-देखकर आज शायद ही किसी की नजरों में बाकी भली पुलिस की छवि भी अच्छी बचती होगी। ब्रिटेन में जब पुलिस की लाठी की लंबाई एक-दो इंच बढ़ाने की बात हुई, तो उसका भारी विरोध हुआ, लोगों का यह कहना था कि लाठी लंबी होने से पुलिस उसे जगह-जगह ठकठकाते हुए चलेगी, और वह एक हिंसक रूख दिखेगा। हिन्दुस्तान में एक निहत्थे पर दर्जन भर पुलिस वाले इस अंदाज में लाठियां बरसाते वीडियो-कैमरे में कैद होते हैं कि उन्होंने पीट-पीटकर मारने का ठेका लिया हो। 
पुलिस का यह नजरिया, और उसकी यह तस्वीर लोगों को खाकी वर्दी से दूर रहने की सलाह देते हैं। जब तक जनता और पुलिस के बीच ऐसी हिंसा कायम रहेगी, पुलिस को जनता से मदद नहीं मिल सकेगी। यह तस्वीर बदलनी चाहिए। 

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