जलसंकट पर हिन्दुस्तान की नींद अब भी नहीं खुल रही

संपादकीय
11 अप्रैल 2016

महाराष्ट्र के लातूर जिले के आसपास पानी का बुरा हाल बरसों से चल रहा है, और कई जगहों पर रेलगाड़ी के टैंकरों से पानी पहुंचाते भी बरसों हो चुके हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में भी सरगुजा के कुछ गांवों की तस्वीरें आती हैं कि वहां लोग पत्थरों के बीच से झरते हुए पानी को लेने के लिए किस कदर गहरे उतरते हैं, या पहाड़ चढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ से लगे हुए मध्यप्रदेश के जिले डिंडौरी की तस्वीरें आई हैं कि कैसे गहरे पक्के कुएं की दीवारों पर से उतरकर बच्चे नीचे जाते हैं, और कटोरियों से बाल्टी भरकर पानी ऊपर भेजते हैं। महाराष्ट्र की महिलाओं का हाल भी मीडिया में सामने आया है कि किस तरह वे रात दो बजे से पानी की कतार में लग जाती हैं।
आज पूरे देश में कुछ हिस्सों में बाढ़ आती है, और उसकी तबाही में कई प्रदेशों के कई हिस्से डूब जाते हैं। ऐसे पानी को मोडऩे के लिए नदीजोड़ योजना की बात चल रही है, सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कई तरह के वायदे भी किए हैं, लेकिन वह कुछ सीमित नदियों के सीमित हिस्सों की बात है। उससे परे भी अगर देखें तो देश भर में नदियों तक पहुंचने वाले पानी का इक_ा होने वाला इलाका बहुत बड़ा रहता है। कैचमेंट एरिया कहा जाने वाला यह इलाका बहते हुए पानी को जब रोक नहीं पाता, तो वह पानी मिट्टी के साथ नदियों में पहुंचता है, और वहां गहराई को घटाते हुए, जलस्तर को बढ़ाते हुए बाढ़ ला देता है। और फिर यह पानी समंदर में जाकर मिलता है, जिसके दुबारा इस्तेमाल होने की संभावना खत्म हो जाती है।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने पहले कई मौकों पर यह लिखा है कि बारिश के पानी की एक-एक बूंद को धरती में सहेजने की कोशिश की जानी चाहिए। इसके लिए बड़े-बड़े ऐसे तालाब खोदे जाने चाहिए जहां पर कैचमेंट एरिया का पानी रोका जा सके, और फिर वह पानी जमीन के नीचे जाकर वहां के जलस्त्रोतों को बढ़ा सके। आज शहरों में या गांवों में भी जहां कहीं नलकूप खोदे गए हैं, हर बरस उनमें पानी नीचे जा रहा है, और भूजल स्तर गिरते चल रहा है। इसे बचाने का एकमात्र तरीका बारिश के पानी को धरती में भेजने का है, और इससे अधिक सस्ता कोई काम हो नहीं सकता। लेकिन चूंकि धरती का एक वोट भी नहीं है, इसलिए उसकी प्यास की आवाज उठाने वाले कोई लोग नहीं हैं। लोग अपने गांवों के आसपास तालाब खुदवाने की बात करते हैं, मौजूदा तालाबों को गहरा करने की बात करते हैं, लेकिन इंसानों और जानवरों के इस्तेमाल के ऐसे तालाबों से परे, महज धरती के इस्तेमाल के तालाब बड़ी संख्या में बनाने की जरूरत है। इसके लिए इंसानी मजदूरी का इस्तेमाल भी हो सकता है, या सरकार कम खर्च में मशीनों से भी काम करवा सकती है। इसके लिए आसपास गांवों का रहना भी जरूरी नहीं है, और कैचमेंट एरिया में जहां कहीं पानी को रोका जा सकता है, वहां बंजर जमीन देखकर ऐसे तालाब बड़ी संख्या में बनाने की जरूरत है ताकि जमीन के भीतर पानी जा सके, और नदियों में बाढ़ घट सके।
इस बारे में छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से आज तक कोई काम नहीं हुआ है। इमारतों की छत पर गिरने वाले बारिश के पानी के लिए तो रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की शर्त लगाई गई है, जो मोटे तौर पर कागजों पर चल रही है। लेकिन नदियों में जिन इलाकों से खूब पानी पहुंचता है, वहां पर तालाब बनाकर बहुत पानी रोका जा सकता है, और सरकार को इस बारे में तेजी से काम करना चाहिए। ऐसा काम सस्ता भी रहेगा, और भूजल स्तर ऊपर आने से पंपों में लगने वाली बिजली भी घटेगी, और गहरे नलकूप खोदना भी घटेगा। 

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