राष्ट्रीय जनजाति आयोग बस्तर के बलात्कार की शिकायतें खुद सुन आया

संपादकीय
5 अप्रैल 2016

राष्ट्रीय जनजाति आयोग के अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव ने बस्तर के बीजापुर का दौरा करने के बाद, वहां महिलाओं से मुलाकात करने के बाद कहा कि जिन सात महिलाओं ने सुरक्षाबलों के जवानों द्वारा बलात्कार की शिकायत की थी, उन सभी ने यह बात दोहराई है। उन्होंने जिले की पुलिस द्वारा इस मामले की जांच का भी विरोध किया कि इससे निष्पक्ष जांच की संभावना नहीं रहती। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की टीम  बीजापुर जिले के बासागुड़ा में आदिवासी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले की जांच के लिए आई थी। आयोग के अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने माना कि महिलाओं के साथ मारपीट और यौन उत्पीडऩ की घटना हुई है। आयोग ने घटना की जांच सीआईडी से कराने की अनुशंसा की है। साथ ही साथ इस तरह की घटना को रोकने के लिए महिला पुलिस के साथ सर्चिंग का सुझाव दिया। आयोग के अध्यक्ष ने यह भी कहा कि कानून कहता है कि यदि रेप पीडि़त कहे कि उसके साथ रेप हुआ है तो उसे मानना चाहिए।  श्री उरांव ने कहा कि सातों महिलाओं ने रेप होने की बात कही है। विधानसभा में भी यह मामला उठा था। कांग्रेस सदस्यों ने इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी। गृहमंत्री अजय चंद्राकर ने एसपी से जांच कराने का आश्वासन दिया था, जिससे सदस्य संतुष्ट नहीं हुए और सदन से वॉकआउट कर दिया।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में देश के आधा दर्जन और राज्यों की तरह दशकों से नक्सलियों की मौजूदगी है, और उनकी बंदूकों-बमों के मुकाबले पुलिस और दूसरे सुरक्षाबलों के जवान भी वहां तैनात हैं। टकराव वाले किसी भी ऐसे इलाके में जब बरसों तक गोलीबारी चलती है, तो जिंदगी और मौत के नीचे किसी भी और बात का महत्व घट जाता है। बस्तर में भी इन दोनों तरफ से मानवाधिकार की हत्या के आंकड़े इंसानी हत्या के आंकड़ों के मुकाबले सैकड़ों गुना अधिक होंगे। दिक्कत यह है कि एक तरफ जब बस्तर के बेजुबान आदिवासियों की तरफ से कुछ लोग सुरक्षाबलों की ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उन्हें नक्सल समर्थक करार दे दिया जाता है। दूसरी तरफ जब लोग नक्सलियों की हिंसा के खिलाफ कोई कड़ी बात करते हैं, तो उन्हें सरकारी दलाल मान लिया जाता है। हमारे जैसे लोगों के साथ दिक्कत यह है कि हम समय-समय पर इन दोनों तोहमतों को झेलते रहते हैं।
लंबी लड़ाई वाले इलाकों में यह खतरा रहता है कि वहां के लोगों से किसी एक खेमे में शामिल होने की उम्मीद की जाती है, और वहां पर ईमानदार निष्पक्षता की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। लोगों को मालूम होगा कि जब किसी देश की फौज किसी दूसरे देश में जाकर कार्रवाई करती है, तो उस फौज के साथ चलने वाले मीडिया के लोग इम्बेडेड-जर्नलिस्ट कहलाते हैं, यानी साथ में जड़े हुए पत्रकार। आज बस्तर में भी पुलिस मीडिया से यही उम्मीद कर रही है कि वह एक राष्ट्रवादी ताकत की तरह पुलिस के साथ चले, साथ रहे, साथ दे। और जो लोग ऐसा नहीं करते हैं, वे बस्तर में न रहें। ऐसी नौबत का ही यह नतीजा है कि सुरक्षाबलों के लोग बलात्कार करते चलते हैं, और उनकी इन हरकतों को छुपाने-दबाने में इन सुरक्षाबलों के अफसर कुछ हद तक कामयाब हो जाते हैं। हम यहां पर बस्तर में काम कर रहे, और जोखिम के साथ जी रहे जवानों को याद दिलाना चाहेंगे कि उत्तर प्रदेश में अभी-अभी कल ही दर्जनों पुलिसवालों को एक मुठभेड़ हत्या के दशकों पुराने मामले में उम्रकैद की सजा हुई है। इसलिए वर्दीधारी लोग जुर्म करके भी हर बार बच नहीं सकते। हम बिना जांच किसी को मुजरिम नहीं ठहरा रहे, लेकिन यह जरूर याद दिला रहे हैं कि नक्सली तो अपने जुर्म के लिए किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारी होने के नाते सुरक्षाकर्मी तो अपनी खुद की हिफाजत के लिए किसी भी तरह के जुर्म से बचें। राज्य सरकार को बस्तर की पुलिस, वहां मौजूद सुरक्षाबलों की हरकतों के बारे में फिर से सोचना चाहिए, क्योंकि एक हद से अधिक बढऩे पर सरकार खुद इन बातों के लिए जिम्मेदारी मानी जाएगी, उस वक्त यह महज अनदेखी नहीं कहलाएगी।

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