महाराष्ट्र विधानसभा में बोई नफरत के कांटे श्रीनगर एनआईटी तक

संपादकीय
6 अप्रैल 2016

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में एनआईटी के छात्रों में तनाव फैला हुआ है। इसकी शुरुआत भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले दिनों हुए क्रिकेट मैच के दिन से शुरू हुई बताई जाती है। और अब वहां पर प्रदेश के बाहर से गए हुए और वहां पढ़ रहे छात्रों का एक जुलूस तिरंगा झंडा लेकर कॉलेज अहाते से बाहर निकल रहा था, और कश्मीर की पुलिस ने उन्हें इस तर्क के साथ रोकने की कोशिश की कि बाहर उनकी हिफाजत करना मुमकिन नहीं होगा। यह जवाबी कार्रवाई छात्र इसलिए कर रहे थे कि क्रिकेट मैच के बाद कॉलेज कैम्पस में कुछ छात्रों ने पाकिस्तान का झंडा लहराया था, और इसके जवाब में गैरकश्मीरी छात्र तिरंगे झंडे के साथ विरोध कर रहे थे। कॉलेज में कक्षाओं का बहिष्कार चल रहा है, और इम्तिहान ठप्प हो गए हैं। केन्द्र की भाजपा-अगुवाई वाली सरकार नाजुक कश्मीर में महबूबा-अगुवाई वाली सरकार में जूनियर भागीदार है, और केन्द्र-राज्य के ऐसे राजनीतिक गणित के चलते यह बात मोदी सरकार के लिए एक परेशानी की है।
कश्मीर में एनआईटी खासा पुराना कॉलेज है, और देश के बाकी एनआईटी की तरह, बाकी प्रमुख कॉलेजों की तरह यहां पर भी प्रदेश के बाहर के छात्र-छात्राओं का कोटा रहता है। इससे देश भर में राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है, क्योंकि सभी प्रदेशों और जाति-धर्मों के बच्चे साथ रहते हैं, साथ पढ़ते हैं। अब कश्मीर में दो दिन पहले ही परेशानी के बाद सरकार बनी है, और यह ताजा तनाव बढ़ गया है।
कश्मीर के लोगों के बीच पाकिस्तान के झंडे के कभी-कभी दिखने की बात नई नहीं है, और उसी एक बात को लेकर तनाव या टकराव अगर कॉलेज से शुरू हो रहा है, तो वह सड़कों के तनाव के मुकाबले कुछ अलग किस्म का है, और कुछ अधिक खतरनाक भी है। ऐसी नौबत से बचा जाना चाहिए। हम कॉलेज कैम्पस में राजनीतिक जागरूकता के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि हमने जेएनयू के मामले में छात्र-छात्राओं की राजनीतिक चेतना की तारीफ भी की है। लेकिन कश्मीर में अगर जान के खतरे की कीमत पर ऐसा टकराव होता है, तो पूरे देश में उसके बड़े बुरे नतीजे होंगे। नफरत की दुनिया देखती नहीं है, और हिंसा को बढ़ाते चलती है। कश्मीर में अगर किसी गैरकश्मीरी छात्र-छात्रा के साथ हिंसा हुई, तो देश भर में जगह-जगह कश्मीरी छात्र-छात्राओं के खिलाफ हिंसा हो सकती है, और यह नौबत बहुत खतरनाक होगी।
भारत पहले भी कई तरह के क्षेत्रीय, धार्मिक, और जातीय भेदभाव और टकराव के तनाव के बीच एक राष्ट्र बने हुए चल रहा है। कभी मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ दोनों ठाकरे हिंसक बातें करते हैं, तो कभी कर्नाटक जैसे विकसित राज्य में उत्तर-पूर्व के लोगों को मारा जाता है। देश की राजधानी दिल्ली में भी उत्तर-पूर्व के लोग आए दिन पीटे जाते हैं, और पिछले दिनों राजस्थान के एक हॉस्टल में कश्मीरी छात्रों पर जबर्दस्ती पुलिस कार्रवाई की गई थी। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि देश भर में साम्प्रदायिकता भड़काई जाएगी, और जाति या धर्म के आधार पर, धार्मिक आस्था के आधार पर लोगों को गद्दार और देशद्रोही करार दिया जाएगा, और उसका असर छात्र-छात्राओं पर नहीं पड़ेगा, तो ऐसा मुमकिन नहीं है। हम बार-बार इस जगह पर देश के इस खतरे के खिलाफ आगाह करते रहते हैं, और जिन प्रदेशों में ऐसे साम्प्रदायिक तनाव नहीं हैं, वे प्रदेश विकास देख भी रहे हैं। भारत में अगर आर्थिक विकास की जगह आक्रामक राष्ट्रीयता और कट्टर धर्मान्धता से फली-फूली नफरत को बढ़ावा दिया जाएगा, तो उसके नुकसान मौजूदा केन्द्र सरकार के कार्यकाल के खत्म होने के बरसों बाद तक होते रहेंगे।
कश्मीर में छात्रों के झंडों और पुलिस के डंडों के टकराव को अगर एक मामूली पुलिस समस्या मानकर छोड़ दिया जाएगा, तो इससे देश का बड़ा नुकसान होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश में नफरत घटाने की कोशिश करनी चाहिए, कश्मीर में यह टकराव मोदी की पार्टी के लिए एक अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकि देश भर में कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार को लेकर यह सवाल तो पूछा ही जा रहा था कि जिस तरह भाजपा के मंत्री-मुख्यमंत्री भारत माता की जय को लेकर देश में गद्दारी के सर्टिफिकेट बांट रहे हैं, क्या महबूबा मुफ्ती से भी भाजपा यह नारा लगवाकर उनको कोई सर्टिफिकेट देगी? हमारा यह मानना है कि राष्ट्रीयता के ये ताजा फतवे श्रीनगर की एनआईटी के ताजा तनाव के पीछे हैं, और केन्द्र और राज्य सरकार को, उनमें शामिल राजनीतिक दलों को नफरत घटाने की बात करनी चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि महाराष्ट्र की विधानसभा में नफरत बोई जाए, और उसके कांटे श्रीनगर की एनआईटी तक न पहुंचें।

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